अरुण पुरी
हर पार्टी को अपने भूभाग का विस्तार या बचाव करने का हक है. यह हरेक राजनैतिक संस्था के जैविक साज-शृंगार का हिस्सा है और शिवसेना इसका अव्वल उदाहरण थी. इसकी स्थापना 1966 में अदम्य बाल ठाकरे ने की, जो कार्टूनिस्ट से मराठी क्षेत्रीयतावाद में घुले-मिले कट्टर हिंदू राष्ट्रवाद के तेज-तर्रार पैरोकार बनकर उभरे. तब से इसकी प्रासंगिकता महाराष्ट्र की राजनीति में लगातार बढ़ती गई. पिछले दिनों के घटनाक्रम के दौरान जो कुछ सामने आया और जिसकी परिणति 29 जून को फेसबुक लाइव पर उद्धव ठाकरे के इस्तीफे में हुई, उसने अब पार्टी के अस्तित्व के लिए ही खतरा पैदा कर दिया है. मगर सेना के इस संकट की जड़ें अतीत में हैं.
मुंबई लंबे समय से पार्टी का गढ़ था, जहां उसने देश के सबसे अमीर नगर निगम पर कब्जा कर लिया. राज्य में ज्यादा व्यापक आधार कायम करने की खातिर 1989 में शिवसेना ने उन दिनों उभरती हिंदुत्व पार्टी, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), से हाथ मिलाया. छह साल बाद 1995 में यह गठजोड़ पहली बार सत्ता में आया, पर अक्तूबर 1999 तक ही हुकूमत कर सका और फिर अगले डेढ़ दशक के लिए विपक्ष की भूमिका निभाने के लिए धकिया दिया गया.
2014 में इसने फिर सत्ता हासिल की, जिसमें देवेंद्र फडणवीस की अगुआई में भाजपा प्रभावी भूमिका में थी. सब कुछ सुचारू ढंग से चल रहा था, पर तभी तक जब 2019 में गठबंधन ने फिर बहुमत हासिल किया. मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर खुलेआम फूहड़ कहा-सुनी और भद्दे ढंग से बनाई गई योजना के तहत कुल जमा 78 घंटे चली भाजपा की समानांतर सरकार के बाद शिवसेना ने एनसीपी और कांग्रेस के साथ एक नामुमकिन-सा चुनाव-बाद गठबंधन, महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (एमवीए), बनाकर पलट वार किया.
हिंदुत्व के एक ही थान से निकली सेना और भाजपा की फूट से ऐसी राजनैतिक जटिलताएं पैदा होनी ही थीं जिनसे एमवीए को अंतत: नुक्सान पहुंचता. मृदुभाषी उद्धव को यह श्रेय देना होगा कि बेमेल प्रतीत होने वाले गठजोड़ के शिखर पर हुकूमत करते हुए भी उन्होंने ढाई साल तक भाजपा को पास फटकने तक नहीं दिया. मगर शिवसेना के भीतर निजी और विचारधारा दोनों स्तरों पर उद्धव के कटते जाने को लेकर अलगाव का एहसास बढ़ रहा था. ठाणे के दबंग नेता एकनाथ शिंदे ने इन्हीं दरारों का फायदा उठाया.
वे महत्वाकांक्षा से प्रेरित रहे हो सकते हैं, खासकर जब उन्होंने पाया कि उद्धव की तरफ से अपने 32 वर्षीय बेटे आदित्य ठाकरे की तरफदारी किए जाने के कारण उनका व्यक्तिगत विकास अवरुद्ध हो गया है. मगर पार्टी के भीतर से नेतृत्व को उखाड़ फेंकने के शानदार कृत्य की अगुआई करते हुए शिंदे ने विचारधारा की आड़ का इस्तेमाल किया और एमवीए को ''नापाक गठबंधन’’ करार देते हुए शिवसेना के हिंदुत्व की जड़ें खोद दीं.
एमवीए सरकार का रिकॉर्ड तब तक अच्छे और बुरे दोनों पैबंदों से भरा था. मुंबई में वह सब कुछ था जिससे कोविड-19 की लहरों के दौरान वह दुनिया के सबसे मुसीबतजदा मुकामों में से एक बन सकता था, पर उद्धव ने आत्मविश्वास और दक्षता से काम किया—महामारी प्रबंधन के मुंबई मॉडल की दुनिया भर में सराहना हुई, भले ही ग्रामीण इलाकों की अनदेखी की गई हो. उद्धव की सरकार के दो मंत्रियों—अनिल देशमुख और नवाब मलिक, दोनों ही एनसीपी के—पर कथित संदिग्ध वित्तीय लेन-देन के आरोप लगे, पर उद्धव उनके साथ डटकर खड़े रहे और इसे विरोधियों के खिलाफ केंद्र का जाना-बूझा अभियान बताया.
मगर जो बात अंतत: शिंदे के पक्ष में गई, वह यह कि महामारी के बीच निजी अस्वस्थता से परेशान उद्धव ने अपने विधायकों और पार्टीजनों से मिलना बंद कर दिया और विरले ही राज्य के दौरे पर निकले. वे मुख्यमंत्री आवास के भीतर से ही राज्य का कामकाज चलाते रहे. शिंदे ने उन पर कृपापात्रों की चौकड़ी के जरिए काम करने का आरोप लगाया, जिसमें आदित्य भी शामिल थे, जिन्होंने अपने पर्यटन और पर्यावरण मामलों के महकमों के दायरे से बाहर भी फैसले लिए.
हफ्ते भर तक महाराष्ट्र के युद्ध का मैदान उसकी सीमाओं के आगे गुवाहाटी तक खींचा गया, जिसके अन्य पड़ाव गुजरात और गोवा थे. जब सुप्रीम कोर्ट ने सदन में शक्ति परीक्षण का रास्ता साफ कर दिया, तो उद्धव ने अंतत: हार मानकर इस्तीफा दे दिया—वे जानते थे कि संख्याबल बुरी तरह एमवीए के खिलाफ था. कानूनी सवालों का उलझा हुआ जाल, जो उद्धव सरकार का आखिरी सहारा मालूम देता था, मोटे तौर पर सैद्धांतिक महत्व का बनकर रह गया—हालांकि सेना के 16 विधायकों की अयोग्यता का मसला, जिसे चुनौती दी गई है और जिस पर 11 जुलाई को शीर्ष अदालत को फैसला देना है, अब भी भविष्य के लिए कुछ बेहद अहम नजीर कायम कर सकता है.
इस बीच कहानी में हैरतअंगेज मोड़ तब आया जब शतरंज की एक नई बिसात बिछा दी गई. ठीक उस वक्त जब सामान्यत: यह मान लिया गया था कि फडणवीस मुख्यमंत्री बनकर लौटेंगे, भाजपा ने शिंदे को इस कुर्सी पर बिठा दिया. भाजपा की रणनीति के कई कारण बताए जा रहे हैं, जिनमें सबसे अव्वल यह है कि उद्धव अभी भले बाहर हों, पर वे लंबे समय तक निश्चित ही धराशायी नहीं रहने वाले हैं.
एमवीए को धराशायी कर देने के बाद भाजपा के लिए 2024 से पहले सेना की राजनैतिक जमीन हथियाने का दरवाजा भी खुल गया है. अगली देखने लायक लड़ाई स्थानीय निकायों के अहम चुनाव होंगे, जिनमें धन-संपन्न बृहनमुंबई नगर निगम, उसके ठाणे और पुणे के समकक्ष, और अन्य दर्जन भर निकाय हैं. राज्य स्तर की टूट रिसकर नगरपालिक स्तर तक कैसे जाएगी, यह फिलहाल कोई नहीं जानता.
हमारी आवरण कथा में सीनियर एडिटर किरण डी. तारे शिंदे के विद्रोह और उत्थान की दिलचस्प राजनैतिक नेपथ्यकथा—तात्कालिक और अप्रत्यक्ष दोनों—की पड़ताल कर रहे हैं. हमने जो देखा वह महाराष्ट्र के राजनैतिक इतिहास के विकास का नाटकीय क्षण है. इसके अस्तित्व के 56 साल में ज्यादातर ठाकरे परिवार ही राज्य की राजनीति के केंद्र में रहा.
इस बार पैदलों की एक फौज के दूसरे पाले में चले जाने से राजा ने मात खाई और अपनी प्रासंगिकता के लिए जूझ रहा है. इसलिए आने वाली सरकार का रंग-रूप इस पर निर्भर कर सकता है कि शिवसेना के भीतर घटनाएं यहां से किस तरफ जाती हैं. सत्ता सबसे अच्छा गोंद है पर हाल की घटनाओं ने दिखा दिया कि महत्वाकांक्षा इस सब पर पानी फेर सकती है. अब देखना यह है कि अगुआई कर रही शिंदे की सेना और भाजपा की यह नई साझेदारी क्या गुल खिलाती है.

