इंडिया टुडे एजुकेशन कॉन्क्लेव
आदित्य मोहन विग
नई दिल्ली के ओबेरॉय होटल में 28 जून को इंडिया टुडे एजुकेशन कॉनक्लेव का आयोजन एक गहमागहमी भरी घटना थी, जिसमें कई बड़े शिक्षाशास्त्रियों, स्कूल और कॉलेजों के प्रशासकों, एडुटेक आंत्रेप्रेन्योर और राजनीतिकों ने हिस्सा लिया. 2022 इंडिया टुडे-एमडीआरए बेस्ट कॉलेज सर्वे में शीर्ष रैंक हासिल करने वाले कॉलेजों के लिए अवॉर्ड समारोह के साथ कॉनक्लेव में शिक्षा से जुड़े विषयों पर चर्चा भी की गई. इन विषयों में मिली-जुली कक्षाएं और ऑनलाइन शिक्षा से लेकर एडुटेक हब के रूप में भारत का भविष्य, डिजिटल शिक्षा का टिकाऊपन और खुद करके सीखने का महत्व शामिल थे.
आयोजन में मुख्य संबोधन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का था. गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की सुलभता की अहमियत बताते हुए प्रधान ने अपने मंत्रालय के समक्ष मौजूद बड़ी चुनौतियों का वर्णन किया, जिनमें आपूर्ति और मांग के बीच बड़ी खाई का होना भी है. उन्होंने कहा, ''हमारी (कुल छात्र) आबादी करीब 52.3 करोड़ है. अगर मैं (सभी नामांकित छात्रों) को जोड़ लूं, जिनमें आंगनवाड़ियों, स्कूलों, उच्च शिक्षा संस्थानों और कौशल शिक्षा के छात्र शामिल हैं, तो यह संख्या करीब 32 करोड़ होगी. इसका मतलब है कि 20 करोड़ छात्र शिक्षा के नेटवर्क से बाहर हैं.’’ फिर उन्होंने शिक्षा का एक अंतर्निहित विषय उठाया—भाषा का सवाल.
उन्होंने कहा, ''हम मानते हैं कि भारत में रोजगार पाने की योग्यता बड़ी चुनौती है. रोजगार पाने की योग्यता के लिए आपको अंग्रेजी सीखनी पड़ती है. लेकिन अगर मैं बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं का विश्लेषण करूं तो तीन या चार देश हैं जो अपना आरऐंडडी, रिसर्च, आला दर्जे की नौकरियों के काम अंग्रेजी में नहीं कर रहे हैं. चीन है. जापान है. वे संचार के माध्यम के लिए अंग्रेजी पर निर्भर नहीं हैं. हां, अंग्रेजी वैश्विकभाषा, व्यवसाय की, व्यापार की भाषा है.
लेकिन मैं अगर दुनिया भर की बड़ी भाषाओं का विश्लेषण करूं तो शीर्ष 10 में से दो भारत की हैं... अगर हमें बढ़ना है, तो हमें स्थानीय भाषाओं के बारे में सोचना होगा.’’ मंत्री के संबोधन के बाद इंडिया टुडे ग्रुप के एडिटोरियल डायरेक्टर (पब्लिशिंग) राज चेंगप्पा के साथ सवाल-जवाब का सिलसिला चला. शिक्षा के लिए बजटीय आवंटन—जो अब भी जीडीपी की महज करीब तीन फीसद है—के बारे में मंत्री सहमत थे कि भारत के अकादमिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए भारी धनराशि की जरूरत होगी, लेकिन उन्होंने निवेश की चर्चा की और कहा, ''सरकार ने एनईपी के लिए 1 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश किया है. राज्य सरकारें भी खर्च कर रही हैं.
निजी संस्थाएं भी खर्च कर रही हैं. परोपकारी निवेश आ रहा है.’’ प्रधान ने यह भी बताया, ''हमने उच्च शिक्षा आयोग विधेयक का दस्तावेज तैयार कर लिया है. जल्द ही हम इसे मंत्रिमंडल में ले जाएंगे. उम्मीद है कि संसद के अगले सत्र में हम यह विधेयक रखेंगे.’’ जब एडुटेक क्षेत्र के लिए नियम-कायदों के बारे में पूछा गया, तो वे उत्साही होने और नियम आधारित व्यवस्था के पक्ष में दलील देने के बीच की लकीर पर चलने लगे. बोले, ''हम पाबंदी लगाने वाले नियम-कायदे नहीं लाना चाहते. नवोन्मेषी लोग रचनात्मक होते हैं—उन्हें नए-नए काम करने दीजिए. लेकिन हम नैतिक दिशा-निर्देशों के पालन की उम्मीद करते हैं. एडुटेक को शोषणकारी नहीं होना चाहिए.’’
कैसे एनईपी से भारतीय शिक्षा व्यवस्था बदल जाएगी
धर्मेंद्र प्रधान
केंद्रीय शिक्षा, कौशल विकास और उद्यमशीलता मंत्री
''हमारी चुनौती दरअसल क्या है? छात्रों की उम्र (3-23 वर्ष) में करीब 52 करोड़ लोग हैं, जिनमें 30 करोड़ (हर तरह के) स्कूल में दाखिल हैं. इसका मतलब है कि 20 करोड़ अभी नेटवर्क से बाहर हैं’’
'' चीन और जापान आरऐंडडी, आला दर्जे की नौकरियों या संचार के माध्यम के रूप में अंग्रेजी पर निर्भर नहीं हैं. अगर हमें आगे बढ़ना है तो अपनी स्थानीय भाषाओं के बारे में सोचना होगा’’
केंद्र सरकार का शिक्षा पर बजट पहली बार इस साल 1 लाख करोड़ रुपए के पार चला गया है. राज्य सरकारें और निजी संस्थाएं भी खर्च कर रही हैं. परोपकारी निवेश भी आ रहा है
''हम पाबंदी लगाने वाले नियम-कायदे नहीं लाना चाहते. नवोन्मेषी लोग रचनात्मक होते हैं, उन्हें अपने नए-नए काम करने दीजिए. हां, हम नैतिक दिशा-निर्देशों के कमोबेश पालन की उक्वमीद करते हैं. एडुटेक को शोषणकारी नहीं होना चाहिए’’
'' हमने उच्च शिक्षा आयोग विधेयक का दस्तावेज तैयार कर लिया है. जल्द ही हम इसे मंत्रिमंडल के सामने ले जाएंगे. उम्मीद है कि संसद के अगले सत्र में हमें इसे सदन के पटल पर रख पाएंगे’’
प्रिंसिपल राउंडटेबल : कैसे बनता है बेस्ट कॉलेज
प्रोफेसर अंजू श्रीवास्तव, प्रिंसिपल, हिंदू कॉलेज
‘‘हम अपने छात्रों को विविध विषयों में दिलचस्पी लेने में अपना वक्त लगाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं...लगातार बदलते श्रम बाजार के अनुकूल बनने की खातिर एक से अधिक हुनर सीखना बेहद जरूरी है’’
प्रोफेसर गौरव रहेजा, प्रमुख, डिपार्टमेंट ऑफ ऑर्किटेक्चर ऐंड प्लानिंग, आइआइटी रुड़की
‘‘आइआइटी रुड़की में हम हर दिन काम में सक्रिय रहते हैं, इसमें लचीलेपन के मौके भी होते हैं. यह सिर्फ क्लासरूम में पढ़ाई ही नहीं है, यह अपने समकक्षों से सीखना, खास तरीके से पढ़ना भी है, जो आज की जरूरत है’’
प्रोफेसर फादर विजू देवासी, डायरेक्टर, क्राइस्ट (डीम्ड टु बी यूनिवर्सिटी), बेंगलूरू
‘‘हम छात्रों को उद्योग जगत से जोड़ने की कोशिश करते हैं. हर शनिवार उद्योगपतियों के सत्र होते हैं. बीसीए पाठ्यक्रम में अंतिम वर्ष के लगभग सभी छात्र उद्योग जगत के साथ वक्त बिताते हैं’’
पूनम वर्मा, प्रिंसिपल, शहीद सुखदेव कॉलेज ऑफ बिजनेस स्टडीज
‘‘हमने टेक्नोलॉजी के जरिए महामारी को अवसर में बदल दिया. अनिवार्य इंटर्नशिप मुश्किल थी, इसलिए हमारे छात्रों ने 50 घंटे के ऑनलाइन विकल्प को चुना’’
डॉ. सरसू ईस्थर थॉमस, रजिस्ट्रार, एनएलएसआइयू, बेंगलूरू
‘‘महामारी से मौके पर जाकर छात्रों की इंटर्नशिप में अड़चन पैदा हुई...हमने ऑनलाइन इंटर्नशिप की व्यवस्था की. वह उतनी कारगर तो नहीं रही, लेकिन कुछ तो काम आया’’
प्रोफेसर अशोक गांगुली, डिप्टी डायरेक्टर, स्ट्रेटजी ऐंड प्लानिंग, आइआइटी दिल्ली
‘‘श्रेष्ठ फैकल्टी और श्रेष्ठ छात्रों से ही विलक्षण माहौल बनता है. हमें प्रतिभावान लोगों और छात्रों की दरकार है. हम छात्रों और पूर्व छात्रों को रोल मॉडल बनाने की कोशिश करते हैं’’
कमलकांत पंत प्रिंसिपल, आइएचएम, पूसा
‘‘श्रेष्ठ संस्थानों को अपने प्रतिस्पर्धियों का शुक्रगुजार होना चाहिए, लेकिन आपको अपने संस्थान का निर्माण जारी रखना है. आइएचएम में हम सभी संबंधित पक्षों और पूर्व छात्रों को शामिल करने की कोशिश करते हैं’’
मनीषा किन्नू, कैंपस डायरेक्टर, एनआइएफटी, दिल्ली
‘‘हमारा कैंपस ठोस अकादमिक पहल के साथ मजेदार गतिविधियों का केंद्र है. हम छात्रों को पहले साल से ही न सिर्फ आकदमिक क्षेत्र में, बल्कि यह भी प्रशिक्षण देते हैं कि वे उद्योगों के साथ कैसे काम कर सकते हैं’’
डॉ. बिपिन जोजो
प्रोफेसर और डीन, स्कूल ऑफ सोशल वर्क, टीआइएसएस, मुंबई
‘‘समकक्षों से सीखना हमारी व्यवस्था का मुख्य बिंदु है और इसकी व्यवस्था तब भी रहती है, जब छात्र यहां मौजूद न हों. डिजिटल फासले के मद्देनजर हमने छात्रों को लैपटॉप मुहैया
कराया है’’
मुख्य वक्तव्य: एनईपी ऐंड इंडस्ट्री 4.0
डॉ. इंदू साहनी
संस्थापक सभापति और कुलाधिपति, एटलास स्कीलटेक यूनिवर्सिटी, मुंबई
''कोविड महामारी हमारे लिए पक्के तूफान की तरह थी. शिक्षा के क्षेत्र में टेक्नोलॉजी का ऐसा इस्तेमाल कभी नहीं होता, अगर महामारी नहीं आती. इससे छात्रों को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ), अत्याधुनिक एनालिटिक्स, छात्रों के लिए व्यक्तिगत ऑनलाइन मदद, और विभिन्न डिजिटल फॉर्मेट के इस्तेमाल में मदद मिली’’
''साल भर बाद जब नगर निगम स्कूल के छात्र हमारे संस्थान में आए तो मैंने उनसे पूछा, 'आप मुझसे क्या पढ़ना चाहते हो?’ या 'आप कैसी क्लासेज चाहते हो?’ हर किसी ने रोबोटिक्स की ही बात की. टेक्नोलॉजी के स्कील की मांग हर क्षेत्र से आ रही है’’
एडुटेक क्रांति: टिकाऊपन, संभावनाएं और समावेश
श्रेयसी सिंह, संस्थापक और सीईओ, हड़प्पा एजुकेशन
‘‘स्कूल खुल गए हैं...फिर भी आज स्कूलों और कॉलेजों में ढेरों ऐसे छात्र हैं, जो अब अपनी कुछ पढ़ाई ऑनलाइन महामारी से पहले के मुकाबले अधिक करते हैं’’
हरि कृष्णन नैयर. सह-संस्थापक, ग्रेट लर्निंग
‘‘अगर आप कोई नौकरी करते हैं, तो हमेशा पढ़ाई के लिए इंस्टीट्यूट जाना संभव नहीं होता है. अपस्किलिंग इंडस्ट्री में, जिसके हम हिस्सा हैं, हमें वाकई की बड़ी बढ़त हासिल हुई है’’
पीयूष नांगरू, सह-संस्थापक और सीओओ, सनस्टोन एडुवर्सिटी
‘‘महामारी हमें ऑनलाइन पढ़ाई की ओर ले गई है. जिन मामलों मे हम ऑनलाइन पढ़ाई नहीं करते (पहले), उनमें में भी यह रोजमर्रा की बात हो गई है. लेकिन यह पढ़ने वाले के वर्ग पर भी निर्भर करता है’’
डॉ. निलिमा चोपड़ा, लीड-अर्ली चाइल्डहुड केयर ऐंड डेवलपमेंट, एचसीएल फाउंडेशन
‘‘महामारी के दौरान हमें दूर-दराज के इलाकों में पहुंचने की चुनौती झेलनी पड़ी. टेक्नोलॉजी उन बच्चों की पढ़ाई जारी रखने में कुछ मददगार साबित हुई है’’
बहस: मिलाजुला क्लासरूम: क्या अब यह सामान्य बात है?
रेखा कृष्णन, प्रिंसिपल, वसंत वैली स्कूल
‘‘हमें बतौर शिक्षक इस विचार के लिए खुला रहना होगा कि किसी समस्या का कोई एक हल नहीं होगा. सिर्फ ऑफलाइन या सिर्फ ऑनलाइन सही नहीं है. हमने (पिछले) दो साल में पढ़ाई के मामले में टेक्नोलॉजी की बढ़त के बारे में सीख चुके हैं’’
मीता सेनगुप्ता, एडुकेटर
‘‘अगर आप टेक्नोलॉजी को अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से तैयार कर सकते हैं, तो सवाल है कि 'क्या यह हमें आसानी से उपलब्ध है, क्या यह ऐसा है, जिसे हम अपने क्लासरूम में लगा सकते हैं?’ हमें स्वीकार करना होगा कि इस प्रक्रिया में हम प्रवेश कर रहे हैं’’
शौरी चटर्जी, चीफ डिजिटल अफसर, स्कूलनेट, इंडिया लिमिटेड
‘‘अगर टेक्नोलॉजी इस मिलेजुले क्लासरूम का हिस्सा है, तो हम यह देख रहे हैं कि 'टास्क ऑन टाइम’ का वक्त कुछ घटाया जा सकता है या नहीं. कोई अध्यापक को एक ही पाठ बार-बार पढ़ाना पड़ रहा है तो क्या टेक्नोलॉजी उसकी जगह ले सकती है. सबसे अहम यह है कि क्लासरूम से जुड़ाव हो’’
प्रभात जैन, सह-संस्थापक, पाथवेज स्कूल्स
‘‘एक वैश्विक अध्ययन से पता चलता है कि पढ़ाई में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल का विरोध छात्र नहीं, वयस्क लोग करते हैं. कोविड ने यह किया है कि टेक्नोलॉजी को इस्तेमाल करने का डर भगा दिया है’’
गरमागरम मुद्दा: स्टार्ट अप कथा: बतौर आइडिया हब भारत
रंजन बनर्जी, डीन, बीआइटीएस स्कूल ऑफ मैनेजमेंट
''समस्या यह है कि हम लोगों को जानी-पहचानी समस्याओं के 'सही’ जवाब के लिए तैयार करते हैं, अनजानी समस्याओं के 'अच्छे’ और 'बेहतर’ जवाब के लिए नहीं’’
रोहित तनेजा, बॉम्बे सेविंग कंपनी
''मैं सोचता हूं कि आकलन की प्रणाली अंकों के बदले छात्रों को नवाचार करने की दिशा में बढ़ाने वाली हो, उन्हें अधिक उद्यमी, अधिक जिज्ञासु बनाने की हो’’
''(उद्यमशीलता) कुछ ऐसा करने के बारे में है, जो पहले नहीं किया गया, उस तरीके से पहले नहीं हुआ. इसके लिए जिज्ञासु होना पड़ेगा’’
—नेहा माथुर, सीएचआरओ, अर्बन कंपनी.
झलकियां: हैंड्स-ऑन लर्निंग की अहमियत
प्रोफेसर दिनेश सिंह, कुलाधिपति, के.आर. मंगलम यूनिवर्सिटी और पूर्व कुलपति, दिल्ली विश्वविद्यालय
‘‘एनईपी के मामले में, मेरी राय है कि यह देश के लिए स्वर्णिम मौका है, और हम इस महान अवसर का इस्तेमाल कर सकते हैं, एक तो देश में ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की स्थापना के लिए ही ’’
‘‘अध्यापकों को हमेशा ब्लैकबोर्ड पर लिखते रहने के बदले गुरु बनना सीखना होगा. हम ब्लैकबोर्ड वाली पढ़ाई से आपने छात्रों की दिलचस्पियों को मार डालते हैं’’

