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पिंजड़े में गणेशजी

''देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र'' के हवाले से बीते साल कुतुब परिसर में पूजा अर्चना करने की याचिका खारिज होने के बाद जैन तीर्थांकर भगवान ऋषभदेव के 'नेक्स्ट फ्रेंड्' हरिशंकर जैन ने साकेत कोर्ट में की अपील दाखिल

कुतुब मिनार परिसर में गणेश प्रतिमा
कुतुब मिनार परिसर में गणेश प्रतिमा
अपडेटेड 17 मई , 2022

दयाशंकर शुक्ल

लोग इतिहास नहीं जानते वे इसे दोहराने के लिए अभिशप्त हैं.'' 18वीं सदी के आयरिश मूल के ब्रिटिश राजनेता और दार्शनिक एडमंड बर्क की यह प्रसिद्ध उक्ति हर युग में मौजूं है. 12वीं सदी के अंत में जब विदेशी आक्रांता शहाबुद्दीन गौरी के गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने दिल्ली के हिंदू-जैन मंदिरों को तोड़ कर उसके मलबे से कुतुब मिनार और ठीक उसके बगल में कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का निर्माण कराया था तब उसने कतई नहीं सोचा होगा कि 21वीं सदी में इतिहास की गलतियों को सुधारने के नाम पर वह और उसकी ये इमारतें हिंदूवादी संगठनों के निशाने पर होंगी. कुतुब मिनार परिसर में हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियां मस्जिद की दीवारों और खंभों पर सदियों से अंकित हैं.

लेकिन कभी सांसद रहे और अब राष्ट्रीय संस्मारक प्रा‌धिकरण के चेयरमैन तरुण विजय ने 25 मार्च को संस्कृति मंत्रालय को पत्र लिख कर जैसे सोए हुए किसी जिन्न को जगा दिया. उन्होंने लिखा, ''कुतुब मिनार परिसर में गणेशजी को पैर के स्तर पर रखा गया है. वहां सदियों से गणेशजी को उल्टा लटका देख हिंदुओं को रोजाना अपमान झेलना पड़ रहा है. यहां पिंजड़े में कैद एक गणेश की मूर्ति है जहां लोग जूते पहन कर टहलते हैं.'' पूर्व सांसद ने भारत सरकार से ''कुतुब मीनार में ''उल्टे गणेश और पिंजड़े में बंद गणपति'' को इस परिसर से निकाल कर सम्मान के साथ राष्ट्रीय संग्रहालय में रखने का आग्रह किया है. कई लोगों को भाजपा के पूर्व राज्यसभा सदस्य के भावुकता से भरे इरादे नेक लग सकते हैं पर बात उस वक्त और पेचीदा हो गई जब कुछ हिंदूवादी संगठनों ने उनके पत्र पर एतराज जताते हुए दिल्ली की साकेत कोर्ट में  ''मूर्तियों को परिसर में ही सम्मानजनक ढंग से रखने और उनकी पूजा-अर्चना करने की इजाजत'' देने की अपील दायर कर दी. कोर्ट ने 13 अप्रैल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) को मस्जिद से हिंदू देवताओं की मूर्तियों को हटाने पर रोक लगाकर और यथास्थिति बनाए रखने के आदेश जारी कर दिए. सुनवाई की अगली तारीख 17 मई, 2022 तय है.

कोई और वक्त होता तो बेशक बात आई-गई हो जाती. लेकिन इस दौर में जबकि हर तरफ हिंदुत्व की लहरें हिलोरें मार रही हैं, यह मामला संगीन हो जाता है. एक जमाने से खुद एएसआइ मानता है कि कुतुब मिनार परिसर में ऐबक ने हिंदू-जैन मंदिरों को तोड़ कर उसके मलबे से कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद बनवाई. मस्जिद के मुख्य दरवाजे पर खुद कुतुबुद्दीन ऐबक ने अरबी में इसके निर्माण में ''27 मंदिरों की सामग्री व धन के इस्तेमाल'' का जिक्र किया है. दरवाजे पर अगर यह इबारत न भी लिखी गई होती तो भी इस खुले मस्जिद परिसर में देवी-देवताओं की मूर्तियां और इसके खुले आंगन के चारों तरफ के खख्बों और दीवारों पर हिंदू वास्तुकला साफ तौर पर दिखाई देती है.

कुतुब मिनार के एकदम बगल में बनी यह मस्जिद देश की शुरुआती मस्जिदों में एक है. ज्यादातर खंभों और दीवारों पर अंकित मूर्तियां अब पूरी तरह से टूट चुकी हैं और आम पर्यटक के लिए पहचान कर पाना कठिन है कि कौन सी मूर्ति किस देवी- देवता की है. हालांकि तमाम हिंदू संगठन व इतिहासकार इनकी पहचान गणेश, विष्णु, सूर्य, गंगा, यमुना, दशावतार, कृष्णा जन्म आदि देवताओं से करते रहे हैं. लेकिन चूंकि गणेश की प्रतिमाएं अपनी लंबी सूंड के कारण अलग से पहचानी जाती हैं इसलिए मौजूदा विवाद भी गणेश प्रतिमाओं को लेकर उठ खड़ा हुआ है. 

पहली विवादित प्रतिमा कुतुब मिनार परिसर की मस्जिद के आंगन के दांए सिरे पर रखी है. अब एएसआइ ने इस कोने को बैरीकेड टेप लगा कर घेर दिया है ताकि आम पर्यटक वहां जूते पहन कर न आ सकें. दरअसल, यह प्रतिमा करीब डेढ़ फुट की शिलाखंड पर अंकित है. इसे फर्श पर झुक कर ही देखा जा सकता है. पूर्व सांसद को आपत्ति है कि पर्यटक प्रतिमा के इर्दगिर्द जूते पहन कर घूमते हैं क्योंकि उन्हें मालूम ही नहीं कि यहां गणेश जी की प्रतिमा रखी है. वे इंडिया टुडे से कहते हैं, ''मैंने एएसआइ अफसरों से सिर्फ यह कहा कि इस प्रतिमा को कम से कम पेडेस्टल पर रख जाए ताकि यह हर दिन अपमानित न हो. पर मेरी बात किसी ने नहीं सुनी.'' दूसरा विवाद उल्टी गणेश प्रतिमा को लेकर है. (देखें फोटो) प्रसिद्ध पुराविद और दिल्ली संस्मारकों के कई साल पुरातत्व अधीक्षक रहे डॉ. बी.आर. मणि कहते हैं, ''यह जानबूझ कर हिंदुओं को अपमानित करने के लिए किया गया.

उस जमाने में पत्थरों में अंकित कई मूर्तियां तोड़ी गईं और जो नहीं टूटीं उसे प्लास्टर से ढक दिया गया.'' पूर्व सांसद विजय कहते हैं कि कम से कम इस गलती को तो अब सुधारा जा सकता है. लेकिन दीवार में अंकित इस प्रतिमा को ''सीधा'' कैसे किया जाए? जवाब में विजय कहते हैं, ''यह एएसआइ जाने कि इसे कैसे ठीक करना है. हिंदू अपने ईष्टदेव को रोज अपमानित होता नहीं देख सकते.'' 

गणेश की तीसरी विवादित प्रतिमा वह है जिसे पूर्व सांसद ''पिंजड़े में कैद'' बताते हैं. चूंकि यह प्रतिमा मस्जिद की बाहरी दीवार के सबसे निचले पत्थर पर बनी है इसलिए सदियों के थपेड़े इस पर नहीं पड़े. यह यहां मौजूद मूर्तियों में से सबसे साफ-सुथरी है जिसमें गणेशजी स्पष्ट दिखते हैं (देखें फोटो). लेकिन इसे पुरातत्व विभाग ने लोहे की जाली से घेर रखा है जिसे ''पिंजड़ा'' कहा जा रहा है. डॉ. मणि कहते हैं कि 1995 तक वे यहां थे तब तक इस प्रतिमा को जाली से नहीं ढका गया था. ''पिंजड़े'' का नया विवाद उठने के बाद एएसआइ ने यहां भी अपने सिक्योटी गार्ड बैठा दिए हैं. एक सिक्योटी गार्ड ने बताया कि ''ये आदेश ऊपर से मिले हैं कि जाली के पास किसी को जाने न दिया जाए.'' 

फिर इस प्रतिमा को ''पिंजड़े'' में कैद क्यों करना पड़ा? इसके जवाब में एएसआइ के एक अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि इस प्रतिमा पर भक्त टीका चंदन लगाने और प्रसाद चढ़ाने लगे. जबकि प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 (एएमएएसआर एक्ट) पुरातत्व संपत्ति के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ की इजाजत नहीं देता. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण दिल्ली सर्किल के अतिरिक्त महानिदेशक डॉ. आलोक त्रिपाठी अपनी टीम के साथ मस्जिद परिसर में अपने मोबाइल फोन से इन मूर्तियों की तस्वीरें खींचते नजर आए. गणेश प्रतिमा को जाली में बंद रखने के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं कि ''यहां सब कुछ एएमएएसआर ऐक्ट के मुताबिक है. और मुझे कुछ नहीं कहना.'' 

लेकिन ऐसे लोगों की कमी नहीं जो इस पूरे प्रकरण को सोची-समझी साजिश मान रहे हैं. अलीगढ़ मुस्लिम विवि के मध्यकालीन इतिहास के प्रोफेसर एस. अली नदीम रिजवी इंडिया टुडे से कहते हैं, ''यह वैसा ही है कि कल कोई कहे कि मैं संग्रहालय में रखी किसी देवी-देवता की पूजा वहीं करूंगा, भजन-कीर्तन करूंगा. या मुस्लिम कहें कि यह हमारी पहली मस्जिद है हम यहां नमाज पढ़ेंगे. या मैं शिया हूं ब्रिटिश म्यूजियम में कई सदियों पुराने बड़े-बड़े ताजिए रखे हैं. और मैं वहां कल जाकर मातम करने लगूं? इसका तो कोई अंत नहीं है.'' रिजवी यह भी कहते हैं, ''इत्तला मिली है कि वहां बहुत दिनों से सुनियोजित तरह से मूर्तियों को झाड़-पोछ कर सामने सजाया जा रहा है ताकि बखेड़ा खड़ा किया जा सके'' जबकि डॉ. मणि कहते हैं, ''यहां कोई छेड़छाड़ संभव ही नहीं. क्योंकि इस परिसर को यूनेस्को ने वल्र्ड हेरिटेज साइट घोषित किया है. यहां एक भी पत्थर यहां से वहां किया गया तो यह दर्जा छिन सकता है.'' 
 
उपासना ऐक्ट पर भी विवाद
''देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र'' के हवाले से बीते साल कुतुब परिसर में पूजा अर्चना करने की याचिका खारिज होने के बाद जैन तीर्थांकर भगवान ऋषभदेव के 'नेक्स्ट फ्रेंड्' हरिशंकर जैन ने साकेत कोर्ट में अपील दाखिल की कि पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की संबंधित धाराएं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा अधिग्रहित कुतुब मिनार जैसे इमारतों पर लागू नहीं होतीं. पूजास्थल ऐक्ट कहता है कि 15 अगस्त, 1947 को मौजूद देश में किसी भी उपासना स्थल का धार्मिक स्वरूप वैसा ही बना रहेगा जैसा वह उस दिन विद्यमान था. जबकि कांग्रेस नेता व सुप्रीम कोर्ट के सीनियर ऐडवोकेट सलमान खुर्शीद इंडिया टुडे से कहते हैं,  ''ये पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की गलत व्याख्या है.''

जाहिर है, पहली नजर में यह सारा मामला पुराने जख्म कुरेदने जैसा है. लेकिन जैन कहते हैं, ''यह पुराने जख्म का उभार है. आखिरी आजादी मिलती क्यों हैं ताकि पुरानी गलतियों को सुधारा जा सके.'' जैन ताजा मिसाल देते हैं, ''आज जो रूस, यूक्रेन के साथ कर रहा है क्या उसे कभी यूक्रेन की आने वाली पीढ़ी भूलेंगी, फिर हम विदेशी आक्रांताओं को कैसे भूल जाएं?'' इस पर इंडियन मुस्लिम लॉयर कांउसिल के महासचिव आबिद हुसैन कहते हैं कि ''पुराने जख्म कुरेदने से सिर्फ तकलीफ और नफरत ही पैदा होती है. बेहतर यह है कि हम पुरानी बातों को भूल कर आगे बढ़ें.''

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