आनंद चौधरी
जैसलमेर जिले के विश्व प्रसिद्ध सम रेगिस्तान से चार किलोमीटर दूर कनोई ग्राम पंचायत की मुराद खां की ढाणी 35 घरों वाला मांगणियार कलाकारों का एक गांव है. पांच साल के नन्हे मुशर्रफ से लेकर 75 साल के प्रदेश के इकलौते सुर मंडल वादक चांदन खान तक यहां मांगणियार लोक गायकी को अपने सुरों और वादन से संजोए हुए हैं. पिछले कुछ महीनों से ये कलाकार दुविधा में हैं. कोरोना की दो साल की आर्थिक तंगी से अभी ये उबरना शुरू ही हुए थे कि एक सरकारी आदेश ने इनकी नींद उड़ा दी हैं. कनोई हलके के पटवारी और तहसीलदार की ओर से मुराद खां की ढाणी के इन लोक कलाकारों को जुर्माना अदा करने के लिए नोटिस जारी किए गए हैं. ये नोटिस इन्हें सरकारी जमीन पर अतिक्रमण मानते हुए थमाए गए हैं. ये कलाकार कनोई गांव से बेदखल होकर यहां आए थे और अब इन्हें फिर से बेदखली का डर सताने लगा है.
देश के इकलौते सुर मंडल कलाकार चांदन खान कहते हैं, ''काफी पहले घर, मकान, मंच, सब पीछे छूट गया, तिनका जोड़कर नए आशियाने बनाए, अब इन्हें भी जमींदोज करने का प्रयास हो रहा है. उम्र के इस पड़ाव पर मैं चाहता हूं कि मुझे इसी मिट्टी में दो गज जमीन नसीब हो.'' दरअसल, 11 साल पहले सरपंची के चुनावों को लेकर कनोई गांव में झगड़ा हुआ था. इसके बाद इन 15-20 मांगणियार परिवारों को डर के मारे गांव खाली करना पड़ा. पक्के घर, साजो-सामान, रियाज का मंच सब गांव में पीछे छूट गया. इसके बाद ये कलाकर गांव से दो किलोमीटर दूर एक सरकारी जमीन पर आकर बस गए. 10 साल की कठिन मेहनत के बाद इनमें से कई परिवारों ने एक-दो कमरों के पक्के मकान भी बना लिए.
गांव के छह लोगों को प्रधानमंत्री आवास योजना में इसी जमीन पर पक्के मकान भी मिल गए. स्थानीय तहसीलदार चतुरसिंह राठौड़ का कहना है, ''कुछ साल पहले गांव में हुए झगड़े के बाद कुछ परिवार सरकारी जमीन पर आकर बस गए थे. गांव में अब इसकी शिकायत हुई तो हमने अतिक्रमण का मामला दर्ज करते हुए इन्हें जुर्माना अदा करने के नोटिस जारी किए हैं.'' ग्राम पंचायत के पटवारी मेघराज सिंह राठौड़ कहते हैं, ''अभी बेदखली जैसा कोई कदम नहीं उठा रहे हैं. अतिक्रमण का जुर्माना तय किया गया है.''
पहले सम के धोरों में पर्यटकों को सूफी, लोक गीत और भजन सुनाकर ये अपना और परिवार का पेट पाल लेते थे लेकिन अब धोरों में पर्यटकों की आवाजाही भी कम हो गई है. सम सैंड ड्यूंस (बालू के टीले) मुराद खां की ढाणी से महज चार किमी दूर हैं. सम सर्दियों में पर्यटकों से आबाद रहता है लेकिन पिछले दो साल से यहां पर्यटकों की संख्या काफी घट गई है. इससे पहले गांव के चांदन खान और अन्य कलाकारों ने देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक में लोक गायन का लोहा मनवाया है. चांदन खान के ग्रुप ने जर्मनी, रूस, हॉलैंड सहित 15-20 देशों में कला का प्रदर्शन किया है.
राजस्थान में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही पारंपरिक लोक कलाओं में मांगणियार लोक कला भी एक है. मांगणियार वंशानुगत लोक कलाकारों का समूह है. इनकी गायन विधा जाति, धर्म, समुदाय की सीमा से परे है. गायन को ये मंदिर के पुजारी की तरह पूजते हैं. गायन सीखने ये कभी किसी इंस्टीट्यूट नहीं जाते बल्कि रियाज और नियम से इसे तराशते हैं.
मांगणियार लोक गायक सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल हैं. मुस्लिम होते हुए भी इनके नाम और गीतों में हिंदू देवी-देवताओं, त्योहारों और संस्कृति की झलक मिलती है. मीरां, कबीर, तुलसी के भजनों को इन्होंने देश ही नहीं, विदेशों में भी पहचान दिलाई है. वाद्य यंत्र सुर मंडल बजाने और बनाने में कनोई गांव की मुराद खां की ढाणी को ही महारत हासिल है. इस समय चांदन खां और उनका परिवार ही इसे बजाता है. 11 मार्च को ही चांदन खां का समूह नई दिल्ली के बीकानेर हाऊस में प्रस्तुति देकर लौटा है. भपंग, ढोलक, कमायचा और खड़ताल तो इस गांव का बच्चा-बच्चा बजा लेता है. इनकी गायन शैली में छह रंग और 36 रागनियां शामिल हैं. मिट्टी की खुशबू इनकी हर मुरकी, आलाप और राग में मिलती है. फाग, हालरिया, सुवटिया, बन्ना गीत, विरह गीत, मोरू बाई, दमा दम मस्त कलंदर, निंबुड़ा-निंबुड़ा जैसे गीत मांगणियार लोक गायन का मुख्य आकर्षण हैं.

