अरुण पुरी
अर्थव्यवस्था की रगों में बहते रक्त की तरह हैं रोजगार और नौकरियां. ऊंची बेरोजगारी और बढ़ती कीमतें खराब कोलेस्ट्रॉल की तरह आर्थिक वृद्धि की रगों को जाम कर देती हैं, लोगों को भारी तंगहाली में जीने को मजबूर करती हैं और राजनैतिक पतन की फिजा तैयार करती हैं. मोदी सरकार के लिए असुविधाजनक पर असलियत यही है कि देश की अर्थव्यवस्था महामारी के झटके से पहले ही गर्त की ओर बढ़ चली थी. महामारी के पैर पसारते ही वह पाताल में पहुंच गई.
कोविड-19 का संक्रमण शुरू होने के ठीक पहले 2019-20 की चौथी तिमाही में जीडीपी वृद्धि दो साल पहले के 8.6 फीसद से 4 फीसद पर आ गिरी थी. महामारी वाले महीनों में और तीखी ढलान दिखी. वित्त वर्ष 2020-21 में तो जीडीपी वृद्धि शून्य से 7.3 फीसद नीचे चली गई. 40 साल में पहली दफा अर्थव्यवस्था मंदी का शिकार हुई.
अर्थव्यवस्था की सीवन उधड़ते ही बेरोजगारी उछाल मारने लगी. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) का अनुमान है कि महामारी की दूसरी लहर में ही एक करोड़ लोगों के रोजगार लुट गए. बदकिस्मती से मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में जीडीपी जब 8.4 फीसद को छू रही थी, यूक्रेन युद्ध से अंतरराष्ट्रीय तेल और जिंसों की कीमतें आसमान छूने लगीं. लिहाजा, महंगाई एक बार फिर कमजोर अर्थव्यवस्था को पटरी से उतारने का खतरा ले आई है.
बेरोजगारी हमेशा ही प्रगति के पांव खींचती रही है, मगर पिछले दशक में यह लाइलाज बन गई. एनएसएसओ के मुताबिक, 2017-18 में बेरोजगारी 45 वर्ष के सबसे ऊंचे मुकाम 6.3 फीसद पर पहुंच गई थी. लेकिन, सीएमआइई के मुताबिक, महामारी के थपेड़े से वह 24 फीसद की चोटी पर पहुंच गई. तब से हालात थोड़े सुधरे हैं पर यह अभी 7 फीसद के आसपास है.
सीएमआइई के मुताबिक, अर्थव्यवस्था में 17 फीसद हिस्सेदारी वाले मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में रोजगार में 46 फीसद की भारी गिरावट है. इस क्षेत्र में रोजगार 2016-17 में 5.1 करोड़ से घटकर 2020-21 में 2.73 करोड़ पर आ गए, जो मैन्युफैक्चरिंग में रोजगार बढ़ाकर 10 करोड़ तक ले जाने के केंद्र के लक्ष्य से काफी दूर है. महामारी में मांग की कमी या लागत कम करने के लिए कंपनियों ने कर्मचारियों की छंटनी की. लघु और छोटे उद्योगों वाले असंगठित क्षेत्र का तो बुरा हाल हो गया, जिसकी जीडीपी में हिस्सेदारी 30 फीसद है.
ये दिल दहलाने वाले आंकड़े भी असल कहानी बयान नहीं कर पाते. बेरोजगारी इस बिना पर आंकी जाती है कि कुल कामगार आबादी में कितने फीसद लोग काम तलाश रहे हैं. लेकिन देश में हाशिए पर जीने वाले बहुत-से लोग बिना रोजगार जी नहीं सकते. इसलिए वे सड़क पर खोमचे लगाने का पेशा चुन लेते हैं. छुपी हुई बेरोजगारी एक दूसरा लाइलाज मुद्दा है. खासकर कृषि में, जिस पर देश के कुल कार्यबल का 45 फीसद आश्रित है मगर जीडीपी में उसका योगदान सिर्फ 20 फीसद है. इसलिए इस कड़वी सचाई से मुंह नहीं चुराया जा सकता कि देश भयावह बेरोजगारी संकट में जकड़ा है.
इस मुश्किल दौर में कैसी भी सरकारी नौकरी स्थायित्व देने के वादे की वजह से आखिरी आसरा बन गई है. पर यह भी छलावा है. इस जनवरी में सरकारी नौकरियों की भर्ती में धांधलियों की वजह से हजारों नाराज नौजवानों के ट्रेन में आग लगा देने से यह जाहिर हो गया. सीएमआइई के मुताबिक, देश में 5.3 करोड़ बेरोजगार हैं, जबकि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर 40 लाख नौकरियां ही दे पाती हैं.
नतीजा यह है कि एक पोस्ट के लिए भी हजारों लोग अर्जी डालते हैं और ज्यादातर आवेदक पद की मांग से बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे होते हैं. मसलन, दिसंबर 2021 में ग्वालियर की एक अदालत ने चपरासी, माली, सफाईकर्मी और ड्राइवर के 15 पदों के लिए भर्ती का ऐलान किया तो 11,000 अर्जियां आ पहुंचीं. जरूरी योग्यता कक्षा 10 पास की थी, लेकिन आवेदकों में ज्यादातर बीए, एमए, यहां तक कि एमबीए पास लोग थे.
और देखिए: 2018 में करीब 3,700 पीएचडी और 50,000 स्नातकों ने उत्तर प्रदेश पुलिस के मैसेंजर के 62 पदों के लिए अर्जी दी थी. ऐसी मिसालें ढेरों हैं. इससे मात्रा और गुणवत्ता की भारी विसंगति का ही पता चलता है. यह त्रासद है कि आजादी के 75 साल बाद भी हजारों लोग एक अदद नौकरी की तलाश में भटक रहे हैं.
बात यहीं खत्म नहीं होती. विडंबना ही है कि सरकारी नौकरियों में बड़े पैमाने पर पद खाली पड़े रहते हैं. असल में, 2014 और 2020 के बीच खाली पद 4,21,658 से दोगुने बढ़कर 8,72,243 हो गए. लेकिन केंद्र सरकार पांच वर्ष में सिर्फ आधे पदों पर ही नियुक्ति कर पाई. इनमें करीब 30 फीसद तो रेलवे के 2019-20 में भर्ती अभियान से ही हुआ. एक बुनियादी वजह तो यह है कि भर्ती प्रक्रिया पेचीदा, अराजक और कई मामलों में निहायत भ्रष्ट है.
इस साल गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर जो गुस्सा फूटा, उसकी वजह यह थी कि रेलवे ने 2019 में क्लर्क, गार्ड और टाइमकीपर जैसे गैर-तकनीकी पदों के लिए 35,281 भर्तियां निकालीं, जिसके लिए 1.25 करोड़ अर्जियां आईं. लेकिन उलझन योग्यता के पैमाने और कट-ऑफ दोनों में थी.
ऊपर से नतीजे के ऐलान में बेहिसाब देरी ने कहर बरपा दिया, जिससे हताशा में नाराजगी और हिंसा फूट पड़ी. दूसरी तरफ भारी गड़बड़ियों की खबरें हैं, जो पेपर लीक होने से लेकर राजनैतिक भाई-भतीजावाद तक हर तरह की हैं. ऊपर से दुबले पर दो आषाढ़ यह कि ज्यादातर सरकारें खर्चों में कटौती की दिशा में बढ़ गई हैं.
ब्यूरो रिपोर्टों को आवरण कथा में गूंथने वाले डिप्टी एडिटर कौशिक डेका ने सरकारी नौकरियों के बढ़ते जुनून और पदों को भरने के गड़बड़झालों के बुनियादी मसलों पर विस्तार से लिखा है. सरकार के पास पदों की संख्या बढ़ाकर इस लाइलाज समस्या का हल निकालने का कोई तरीका नहीं हो सकता लेकिन कम से कम वह खाली पदों को भरने की प्रक्रिया को तो दुरुस्त कर ही सकती है.
बेरोजगारी की बड़ी समस्या का इलाज आर्थिक वृद्धि में भारी इजाफे से ही हो सकता है. वह तभी संभव है जब मोदी सरकार ऐसा नीतिगत माहौल बनाए, जिससे निजी क्षेत्र में तेज वृद्धि को उछाल मिले.
इस मुद्दे पर तुरंत ध्यान दिए जाने की जरूरत है क्योंकि जन्म दर घट रही है तो युवा कार्यबल सिकुड़ने से बहुप्रचारित डेमोग्राफिक डिविडेंड हासिल करने के दरवाजे बंद हो जा सकते हैं. हमें तेजी से अधिक रोजगार और नौकरियां पैदा करनी होंगी, लेकिन सिर्फ सरकारी नहीं. वरना जनसंख्या रूपी आपदा हमारे आगे मुंह बाए खड़ी है.

