
सोनाली आचार्जी और मोहम्मद वक़ास
मार्च 2020 में देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा के साथ जीवन मानो ठहर गया. दिल्ली के जामिया नगर इलाके में रहने वाले 43 वर्षीय अलीमुर रहमान के दोनों बच्चों का स्कूल बंद हो गया. गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुला लेकिन ऑनलाइन पढ़ाई शुरू हुई, यानी घर से निकलने की जरूरत नहीं थी. कुछ महीने पहले ही ये लोग अपने फ्लैट में शिफ्ट हुए थे. पति-पत्नी और दोनों बच्चे घर में कैद हो गए. नए साल पर स्थिति सुधरती नजर आ रही थी तभी मध्य मार्च से दूसरी लहर की खबर आने लगी. अलीम की मां और भाई परेशान थे और वे लोग कह रहे थे कि मौका मिलते ही घर आ जाओ.
एमबीए डिग्रीधारी अलीम को 2018 में दिल का दौरा पड़ा था. तब उन्हें घर से महज दो किमी दूर एस्कॉटर्स फोर्टिस अस्पताल पहुंचाया गया था, जहां चिकित्सीय हस्तक्षेप से उनकी जान बच गई लेकिन दिल कमजोर पड़ गया. अपनी नाजुक सेहत की वजह से वे घर से ही गुड़गांव की एक प्रोपर्टी डेवलपर कंपनी के लिए 'वर्क फ्रॉम होम' करते थे. जाड़े में प्रदूषण बढऩे पर अकेले गांव चले जाते थे. वे सिर्फ अपने बच्चों को पढ़ाने की गरज से दिल्ली में थे, जिन्हें सिर्फ ऑनलाइन पढ़ाया जा रहा था. दूसरी लहर के दौरान उन्होंने देखा कि अस्पतालों में भी जगह नहीं है. अलीम कहते हैं, ''आखिरकार, मैंने बिहार के पूर्वी चंपारण में अपने पुश्तैनी गांव चंदनबारा लौटने का फैसला कर लिया.''
दूसरी ओर, मुंबई में फिल्म जगत का सारा कारोबार ठप हो गया था. प्रोड्यूसर-डायरेक्टर ओमंग कुमार के फस्र्ट असिस्टेंट डायरेक्टर और अलीम के छोटे भाई 37 वर्षीय सहीफुर रहमान अंधेरी वेस्ट में अपने फ्लैट में कैद थे और उसका मोटा किराया चुकाए जा रहे थे. दूसरी लहर कमजोर पड़ते ही वे भी गांव निकल गए. उन्होंने पिछले साल घर के पास ही 2,500 चिकन की क्षमता वाला पॉल्ट्री फार्म शुरू किया. धीरे-धीरे चिकन फीड और चिक्स की डीलरशिप हासिल कर ली. अब वे 11,000 चिक्स वाले पूरी तरह ऑटोमेटेड फार्म शुरू करने जा रहे हैं. सरबजीत, भूमि जैसी फिल्मों और ओप्पो तथा रियलमी के कमर्शियल बना चुके सहीफ क्या दोबारा मुंबई नहीं जाएंगे? वे कहते हैं, ''मैं अब भी ओमंग जी को असिस्ट करता हूं. यहीं से उनके बजट और स्क्रिप्ट देखता हूं. फिजिकली वहां मौजूद रहने की जरूरत होगी तो पहुंच जाऊंगा.''
दिल्ली-एनसीआर में स्कूल खुलने की वजह से अलीम के बच्चे एक साल बाद राजधानी में अपने घर लौटने की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन अलीम अपने गांव के पास के शहर में मार्बल, टाइल्स, डोर फिटिंग्स आदि का कारोबार शुरू करने की योजना बना रहे हैं. उस छोटे से शहर में उनके वालिद ने पहले ही जमीन ले रखी थी, जो अब तक खाली पड़ी है. वे गांव के अपेक्षाकृत कम तनाव और साफ-सुथरी आबोहवा में रहकर इलाके में आई संपन्नता में अपना हिस्सा तलाश रहे हैं.
रहमान बंधुओं की ही तरह, कई लोग बड़े शहरों से दूर अधिक समय बिता रहे हैं. महामारी के वर्क फ्रॉम होम की अनिवार्यता ने दूर से काम करने की सुविधा में बदल दिया, और इससे शहरों का जीवन कई लोगों के लिए बोझिल हो गया. रियल एस्टेट मंच नोब्रोकर.कॉम के 2021 के एक सर्वे के मुताबिक, उसके 82 फीसद यूजर शहरों से दूर दूसरा घर चाहते हैं. जनवरी और जून 2021 के बीच 4,965 प्रतिभागियों के बीच आयोजित सीआइआइ-एनारॉक कंज्यूमर सेंटीमेंट सर्वे भी हरियाली वाले वातावरण में उपभोक्ताओं की बढ़ती दिलचस्पी की ओर इशारा करता है. लगभग 68 फीसद उत्तरदाताओं ने बाहरी या उपनगरीय इलाकों में भूखंड खरीदने की इच्छा व्यक्त की; 72 फीसद लोगों ने पैदल मार्ग को चुना और 68 फीसद लोगों ने पर्याप्त खुले हरे-भरे स्थान रखने की इच्छा व्यक्त की. ग्लोबल प्रॉपर्टी वैश्विक संपत्ति सलाहकार, सेविल्स इंडिया के पिछले साल के अंत में किए गए एक अन्य सर्वेक्षण में बताया गया है कि उनके उत्तरदाताओं में से 70 प्रतिशत अगले दो वर्षों में दूसरा घर चाहते हैं, जिसका उपयोग वे कम से कम अगले पांच वर्ष के लिए करने की योजना बना रहे हैं. यह बच्चों, बड़ों की चिंताओं और एक सुरक्षित, स्वस्थ जीवनशैली की इच्छा से प्रेरित है.
मुंबई में आर्किटेक्चरल फर्म एडीएनडी के पार्टनर और आर्किटेक्ट शोभन कोठारी कहते हैं, ''महामारी के दौरान, लोग अपने घरों से बाहर चले गए और एयरबीएनबी जैसी जगहों पर कुछ समय के लिए रहे. इससे उन्हें एहसास हुआ कि यहां रहते हुए दूर से काम करना संभव है और वे शहर से दूर जिंदगी को स्थायी ढंग से बिताने पर विचार करना शुरू कर दिया. लोग अब शहर से दो से तीन घंटे की ड्राइव पर कस्बों में रहने की सोच रहे हैं.''
डिजाइन कंसोर्शियम इंडिया के प्रमुख वास्तुकार नीलांजन भोवाल के अनुसार, महामारी के बाद से दूसरे घरों की मांग दोगुनी हो गई है. भोवाल कहते हैं, ''दूसरा घर पहले ऐश्वर्य का प्रतीक था, विलासिता का प्रतीक था. अब लोगों ने महसूस किया है कि महानगरों से दूर दूसरे घर में निवेश करने से बेहतर रिटर्न मिलता है. मेट्रो शहरों में इसी तरह की संपत्ति की तुलना में दूसरे घरों की कीमत अधिक बेहतर है.''
ऐसी संपत्तियों की बढ़ती मांग इस बात से भी स्पष्ट होती है कि कैसे प्रमुख रियल एस्टेट डेवलपर्स अब टियर 2 और 3 शहरों में दूसरे घर की पेशकश कर रहे हैं. भोवाल की फर्म ने भीमताल, उत्तराखंड में एक प्रीमियम गेटेड कम्युनिटी ब्रुक्स आर्थौस डिजाइन किया है; टाटा ने हिमाचल प्रदेश के कसौली में पर्यावरण के अनुकूल विला स्थापित किए हैं; डीएलएफ के पास हिमाचल में शिमला और कसौली तथा गोवा में आवासीय सुविधाएं हैं; और महिंद्रा और हीरानंदानी समूह दोनों के पास महाराष्ट्र के अलीबाग में लग्जरी विला परियोजनाएं हैं.

63 वर्षीय नीतीश मुखर्जी और उनकी पत्नी ने डेढ़ साल पहले ब्रुक्स आर्थौस में एक दूसरे घर में निवेश किया था. मुखर्जी कहते हैं कि अपने नए घर के बारे में उन्हें वास्तव में आश्चर्य इसलिए हुआ कि इस जगह ने उनके 30 साल के बेटे और उनकी पत्नी को भी लुभा लिया. वे और उनकी पत्नी सेवानिवृत्त जीवन को बेहतर बिताने की गरज से भीमताल चले गए, जबकि कॉर्पोरेट नौकरियों में कार्यरत उनके बच्चों को पहाड़ों से काम रहने में मजा आ रहा था. मुखर्जी कहते हैं, ''दिल्ली में हमारा अपना मकान है लेकिन अब हम भीमताल में अधिक वक्त बिताने लगे हैं. ऐसा इस तथ्य की वजह से भी है कि इस जगह की कनेक्टिविटी अब पहले से बेहतर है.''
इस दंपति को ग्रामीणों के साथ जुड़ने में आनंद आता है और उन्हें लगता है कि वे शहरी शहर की तुलना में भीमताल में समाज को अधिक वापस देने में सक्षम हैं. वे कहते हैं, ''हम हमेशा से शहरी व्यवस्था में रहते आए हैं और, कुछ समय से एक ऐसी जगह की तलाश में थे जहां हमें मजबूत सामुदायिक भावना मिल सके. साथ ही साथ हम जिम जाने की बजाए अपने रोजमर्रा के हिसाब से कुदरती तौर पर व्यायाम कर सकें.''
भोवाल कहते हैं कि उन्होंने दूसरे लोगों के बीच ऐसी ही भावनाएं देखी हैं. वे कहते हैं, ''कोविड ने लोगों को एहसास कराया है कि प्रकृति के साथ सामंजस्य बिठाकर जीवन जीना चाहिए. हरे-भरे घास के मैदानों और पहाड़ियों के बीच कोई भी स्थायी रूप से रह सकता है और शहर में रहने के लिए काम करने से परे जीवन का अनुभव कर सकता है.''
आज कई मध्यमवर्गीय व्यक्ति और परिवार भी दूसरे घरों में निवेश कर रहे हैं. पिछले साल आखिर में दिल्ली एनसीआर से हिमाचल प्रदेश में आ कर बसने वाले 39 वर्षीय इंजीनियर अभिरूप रॉय कहते हैं, ''धर्मशाला में एक कॉटेज मालिक के साथ मेरी लंबी अवधि के किराए की व्यवस्था है. मैं एक बगीचे के साथ दो कमरे के घर के लिए केवल 15,000 रुपए का भुगतान करता हूं-यह दिल्ली में ऐसे ही घर की कीमत का एक-चौथाई हिस्सा भर है.''

कुछ उपनगरीय सामूहिक परियोजनाएं लोगों के समूह के बीच लागत को विभाजित करके दूसरे घर के प्रस्ताव को और अधिक किफायती बना रही हैं. उदाहरण के लिए, बेंगलुरू और राजस्थान में विवस्व इन्फ्रा का एक ब्रांड, वीकम्युनिटीज सामूहिक और टिकाऊ जीवन के लिए है, जहां समान विचारधारा वाले लोग प्रकृति के साथ गहरा संबंध बना सकते हैं. इसके लिए लोग मिल-जुलकर किसी फार्म का एक छोटा हिस्सा खरीद लेते हैं—जो 80 से 100 एकड़ तक का होता है—और इसे लो-फुटप्रिंट, ऑर्गेनिक फार्म में बदल देते हैं जहां पर जरूरी बुनियादी इन्फ्रास्ट्रक्चर मौजूद होता है.
समग्र प्रक्रिया का सक्रिय हिस्सा बनने के लिए सदस्य अक्सर ऐसे खेतों के पास घर खरीदते हैं. इस तरह के समूह न केवल समान जुनून वाले लोगों को जोड़ने में मदद करते हैं बल्कि रहने के लिए एक स्वस्थ वातावरण भी प्रदान करते हैं. विराह कपूर कहते हैं, ''मैं काम के कारण नोएडा में रहता था, लेकिन इसके अलावा मुझे एनसीआर क्षेत्र से कोई वास्तविक संबंध नहीं लगा.'' 33 साल के कपूर कहते हैं, ''मैं अपने पड़ोसियों को नहीं जानता था, मुझे स्थानीय समस्याओं में कोई दिलचस्पी नहीं थी और मैंने वहां अपने जीवन का कभी आनंद नहीं लिया.'' जिस वक्त से एक प्रवासी प्लेसमेंट सलाहकार कपूर ने दूर से काम करना शुरू किया, उन्हें नैनीताल के बाहरी इलाके में एक दूसरे फ्लैट को किराए पर लेने का अवसर मिल गया. ''मेरे पड़ोसियों और मैंने मिलकर एक हरे-भरे टेरेस फार्म की स्थापना की है.'' नवंबर 2021 में, वे स्वास्थ्य कारणों से दिल्ली से अपनी मां को भी नैनीताल ले आए ताकि वे उनके साथ रह सकें.
उन्मुक्त सांसें
प्रदूषण शहरवासियों की सबसे बड़ी आशंकाओं में से एक है. ग्रीनपीस इंडिया के एक अध्ययन के अनुसार, दिल्ली में अप्रैल 2020 और अप्रैल 2021 के बीच नाइट्रोजन डाइऑक्साइड प्रदूषण में 125 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई है. इस अध्ययन में भारत की आठ सबसे अधिक आबादी वाले राज्यों की राजधानियों-मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नै, कोलकाता, जयपुर और लखनऊ में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड की सांद्रता का विश्लेषण किया गया था. इन सभी शहरों में इस गैस से लोगों के फेफड़े प्रभावित हुए हैं.
दिल्ली के पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. दविंदर कुंद्रा कहते हैं, ''बुजुर्गों को प्रदूषित इलाकों में जिंदगी खास तौर पर मुश्किल लगती है क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ उनके फेफड़े पहले से ही कमजोर हो चुके होते हैं. इसके अलावा, ज्यादा प्रदूषण के वक्त परिवार के लोग अपने बुजुर्गों को घर के अंदर ही रहने के लिए मजबूर करते हैं. बाहर न जाने, लोगों से न मिल पाने, चलने-फिरने से वंचित होने और आजाद न होने का तनाव उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को दूसरे कई तरीकों से प्रभावित करता है.''
दिल के मरीज अलीम दिल्ली में जाड़े के दिनों में प्रदूषण से स्वास्थ्य को होने वाले नुक्सान से वाकिफ हैं. उनके डॉक्टर ने भी इससे बचने की सलाह दी है. अब वे गांव में अपने घर के सामने के खेतों में टहलते हुए सामने नेपाल से आने वाली लाल बक्या नदी के किनारे टहलते हैं. इसका असर यह हुआ है कि पहले जहां उन्हें हृदय प्रत्यारोपण की सलाह दी गई थी, वहीं अब उनके डॉक्टर उन्हें लगभग स्वस्थ मान रहे हैं, हालांकि उन्हें अब भी कई दवाइयां खानी पड़ती हैं.
अधिक प्रदूषण वाले इलाकों के निवासियों के लिए 2021 की सर्दी विशेष रूप से कठिन थी. 51 साल के तरुण महार दमे की वजह से एक महीने तक नोएडा में अपने घर में कैद रहे. वे पहले ही वर्ष की शुरुआत में कोविड की वजह से लंबे समय तक बीमार रहे थे. दिसंबर में, उन्होंने केरल के पलक्कड में एक दोस्त के परिवार के साथ रहने का फैसला किया. वे कहते हैं, ''मुझे यह इतना पसंद आया कि मैं यहां जमीन खरीदने की सोच रहा हूं. यहां हवा साफ है और ताजादम करने वाली है. और यहां सांस लेना बहुत आसान है.''
तनाव बढ़ाने वाले अन्य कारक
प्रदूषण शहरों में स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला कोई इकलौता कारक नहीं है. अन्य स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी लोगों को छोटे शहरों, कस्बों या गांवों में ले जा रही हैं. सामुदायिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोकलसर्किल ने एक सर्वेक्षण में पाया कि दिल्ली में सर्वेक्षण में शामिल 45 प्रतिशत लोग अपने परिवार या स्थानीय सोशल नेटवर्क में किसी ऐसे व्यक्ति को जानते थे जो 2021 में डेंगू से प्रभावित था.
यह सर्वेक्षण दिल्ली-एनसीआर के 14,974 निवासियों के बीच किया गया था. इसके अलावा, ट्रैफिक जाम, बीमारियां, अपराध और रहन-सहन की उच्च लागत और महामारी ने लोगों के जीवन में तनाव बढ़ा दिया है. मुंबई के मनोचिकित्सक डॉक्टर केदार तिलवे कहते हैं, ''आजकल चिंता आम है. कोविड ने इस तरह के तनाव को संभालने की बहुत से लोगों की क्षमता को खत्म कर दिया है और इसलिए आज लोग कम तनाव, अधिक सकारात्मकता और आरामदायक जीवन जीना चाहते हैं. मानसिक शांति और भलाई के लिए जो तनाव आवश्यक नहीं है, उससे बचना चाहिए.'' वैश्विक सूची टॉमटॉम ट्रैफिक इंडेक्स में, 56 देशों के 416 शहरों में ट्रैफिक कंजेशन स्तर के मापदंडों पर मुंबई दूसरे स्थान पर, बेंगलुरू छठे, दिल्ली आठवें और पुणे 16वें स्थान पर है.
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के सितंबर के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में बेरोजगारी दर भी चार महीने के उच्च स्तर 16.8 फीसद पर है. दिल्ली पुलिस के नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि महिलाओं के खिलाफ सड़क पर होने वाले अपराध, जैसे कि स्नैचिंग और डकैती, 2021 में 30-40 प्रतिशत बढ़ गए थे.
खुशियों में निवेश
जीवन की बेहतर गुणवत्ता में निवेश उन घरों की प्रकृति में भी स्पष्ट है जिन्हें लोग शहरों के बाहर बना रहे हैं. कोठारी कहते हैं, ''कोई भी दो परिवार समान नहीं होते और प्रत्येक परिवार अपनी आवश्यकताओं के साथ आता है. लेकिन दूसरा घर बनाने का उद्देश्य हमेशा एक ऐसी जगह घर बनाना होता है जहां आप शहर की हलचल से दूर पारिवारिक जीवन का आनंद ले सकें. यह भी महत्वपूर्ण है कि एक परिवार के लिए एक सुरक्षित आश्रय का निर्माण करते समय, स्वतंत्र महसूस करने और प्रकृति के साथ एकता को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त जगह हो. दूसरे घर से लोगों की प्रमुख आवश्यकता यह है कि यह अच्छी तरह से रोशनी, अच्छी तरह हवादार और बाहर से अच्छी तरह से जुड़ा होना चाहिए.''
हालांकि गांव-कस्बों और बड़े शहरों में बुनियादी अंतर सुविधाओं के मामले में है. मसलन, कस्बों और छोटे शहरों में बढ़िया चिकित्सा सुविधा और बच्चों के लिए बढ़िया स्कूल नहीं हैं. जैसे, अलीम के डॉक्टरों ने 2018 में कहा था कि उन्हें आधे घंटे के अंदर अस्पताल न लाया गया होता तो शायद वे जिंदा न होते. यह गांव में मुमकिन न था. हालांकि अब उन्हें वहीं रहना है लेकिन बच्चों के लिए गांव में बढ़िया स्कूल नहीं है. लिहाजा, वे दिल्ली में रहेंगे और छुट्टियों में अपने दूसरे घर जाएंगे. शायद उनके बड़े होने तक सुविधाओं का अंतर भी कम हो जाए.
महामारी ने वर्क फ्रॉम होम को सामान्य बनाया और अब लगता है कि दूसरे घर का चलन भी बना रहने वाला है. इसके पीछे यह विश्वास है कि बड़े महानगरों की अराजकता से दूर और अधिक हरे और स्वस्थ स्थानों में अधिक सकारात्मकता पाई जा सकती है.
—साथ में शैली आनंद और अदिति पै

