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सिनेमाः द कश्मीर फाइल्स सांप्रदायिक भड़ास से सराबोर

घाटी से कश्मीरी पंडितों को बर्बरतापूर्वक निकाल फेंकने की कहानी बयान करती विवेक अग्निहोत्री की द कश्मीर फाइल्स असहमति की आवाजों पर भी निशाना साधती नजर आती है.

अतीत की याद विवेक अग्निहोत्री की द कश्मीर फाइल्स में 'उदारवादी’ प्रोफेसर की भूमिका में पल्लवी जोशी.
अतीत की याद विवेक अग्निहोत्री की द कश्मीर फाइल्स में 'उदारवादी’ प्रोफेसर की भूमिका में पल्लवी जोशी.
अपडेटेड 22 मार्च , 2022

बहुत कम लोगों को उम्मीद होगी कि अलगाववादी उग्रवादियों के हाथों कश्मीरी पंडितों के उत्पीड़न और 1989-90 में घाटी से उनके पलायन पर बना तीन घंटे लंबा, ए श्रेणी का यह सियासी ड्रामा कामयाबी के झंडे गाड़ देगा. 15 करोड़ रुपए के अनुमानित बजट से बनी द कश्मीर फाइल्स ने रिलीज के पहले पांच दिनों में करीब 60 करोड़ रुपए बटोर लिए और उसका कलेक्शन बढ़ता ही जा रहा है.

कारोबारी पंडितों का अनुमान है कि इस रफ्तार से फिल्म 300 करोड़ रुपए बटोर लेगी. फिल्म ने दर्शकों के मन का ऐसा तार छू लिया कि मल्टीप्लेक्स मांग पूरी करने के लिए शो की संख्या बढ़ा रहे हैं और खासकर हिंदी भाषी पट्टी में एक पर्दे वाले सिनेमाघर इसे बढ़-चढ़कर गले लगा रहे हैं. इस फिल्म के लेखक और निर्देशक विवेक रंजन अग्निहोत्री हैं. इससे पहले उन्हें हेट स्टोरी और द ताशकंद फाइल्स के लिए जाना जाता था.

द कश्मीर फाइल्स की कहानी युवा कश्मीरी पंडित कृष्णा (दर्शन कुमार) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने दादा (अनुपम खेर) की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए कश्मीर जाता है. उनकी अंतिम इच्छा थी कि उनकी राख पुरखों के उस मकान पर बिखेर दी जाए जिसे जनवरी 1990 में उन्हें छोड़ने के लिए मजबूर किया गया और इस काम में उनके चार दोस्तों को भी शामिल किया जाए. दो दिनों के दौरान कृष्णा को पंडितों पर हुए अत्याचारों और उस कड़वे सच का पता चलता है जिसमें उसके परिजन मारे गए थे. 

अलबत्ता फिल्म महज उन लोगों की दुर्दशा के बारे में नहीं है जो अपने ही देश में शरणार्थी बनकर रह गए. अग्निहोत्री इस त्रासदी का इस्तेमाल अपने नापसंद लोगों—'उदारवादियों’—पर तोहमत जड़ने के लिए करते हैं. उनकी नुमाइंदगी करने वाली सबसे प्रमुख किरदार एक प्रोफेसर (अग्निहोत्री की पत्नी पल्लवी जोशी अभिनीत) है, जो कश्मीर के मुसलमानों पर अत्याचार करने के लिए सरकार का तिरस्कार करती है और 'एएनयू’ (दिल्ली के जेएनयू की तर्ज पर) के कैंपस में कश्मीरी मुस्लिम छात्रों को 'तुष्ट’ करने की कोशिश करती है.

वह कजरारी आंखों वाली मुस्कराती भड़काऊ महिला है, जो फैज अहमद फैज की नज्म हम देखेंगे गाती है और उसका पसंदीदा लक्रज 'आजादी’ है. अग्निहोत्री वामपंथियों के अकादमिक जगत की ऐसी तस्वीर उकेरते हैं जो कश्मीरी पंडितों की दुर्दशा से या तो अनजान है या उदासीन.

दर्शकों ने अग्निहोत्री के सियासी एजेंडे को हाथोहाथ लिया. फिल्म के मुरीदों में कश्मीरी पंडित और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म उरी—द सर्जिकल स्ट्राइक के निर्देशक आदित्य धर भी हैं. उस फिल्म ने भी द कश्मीर फाइल्स की तरह उम्मीदों से कहीं ज्यादा 28 करोड़ रुपए के बजट के मुकाबले 244 करोड़ रुपए बटोरे थे.

धर ने ट्विटर पर लिखा, ''आपने द कश्मीर फाइल्स देखने के बाद सिनेमाघरों में फूट-फूटकर रोते कश्मीरी पंडितों के वीडियो देखे होंगे. ये जज्बात असली हैं. यह दिखाता है कि समुदाय के तौर पर हमने अपनी तकलीफ और त्रासदी कितने लंबे वक्त तक दबाए रखी. रोने के लिए हमारे पास कोई कंधा नहीं था और न हमारी गुहार सुनने के लिए कोई कान था...बतौर फिल्मकार, मैं खुद अपनी त्रासदी पर इससे बेहतर फिल्म नहीं बना सकता था.’’

हेट स्टोरी?
अलबत्ता हर कोई इससे इत्तेफाक नहीं रखता. कुछ फिल्म आलोचकों ने अग्निहोत्री पर इतिहास की एकतरफा व्याख्या करने का आरोप लगाया. द हिंदू के अनुज कुमार ने लिखा, ''संशोधनवादी डॉक्यूड्रामा की तरह गढ़ा गया...द कश्मीर फाइल्स असल में नैरेटिव की लड़ाई है जिसमें अग्निहोत्री ने पक्के इरादे के साथ घटनाओं के केवल एक पहलू की तरफदारी की है. कुछ तथ्यों, कुछ अर्धसत्यों और ढेर सारी तोड़-मरोड़ का सहारा लेकर यह न केवल उकसाने बल्कि भड़काने के इरादे से कश्मीर मुद्दे के दूसरे नजरिए को बलपूर्वक आगे बढ़ाती है.’’ 

ध्रुवों में बंटी राय ने फिल्म के बारे में चर्चाओं को हवा दी और फिल्म व्हाट्सऐप ग्रुपों और न्यूज चैनलों पर सरगर्म विषय बन गई. सोशल मीडिया पर कश्मीरी पंडितों और कश्मीरी राजनीति को लेकर विभिन्न थ्रेड की बहार आ गई तथा ट्रोल नकारात्मक समीक्षाओं या प्रतिक्रियाओं पर हमले कर रहे हैं.

जहां भड़काऊ मीम की बाढ़ आ गई, कुछ लोगों ने फिल्म के सबसे बड़े सितारे अनुपम खेर का 2013 का एक ट्वीट साझा किया, जिसमें उन्होंने हमदर्दी की वकालत की थी, ''मैं कुछ लोगों को कश्मीरी पंडितों के पलायन पर हो-हल्ले को धार्मिक चीज में बदलते देख रहा हूं. ऐसा नहीं है. यह मानवीय तकलीफ के बारे में है. चाहे हिंदू हों या मुसलमान.’’ 

खेर जिस विभाजनकारी भावना को लेकर चिंतित थे, इस बार वही कुछ जगहों पर सामने आ गई जहां फिल्म हाउसफुल चल रही है. वायरल फ्लिक्स में, फिल्म के एक प्रदर्शन के दौरान कुछ दर्शक मुसलमानों के खिलाफ गालियां भरे नारे लगाते देखे गए. एक क्लिप में एक शख्स चाहता था कि दर्शक तीन खान—सलमान, शाहरुख और आमिर—की फिल्मों का बहिष्कार करें. एक अन्य क्लिप में दिल्ली के एक सिनेमाघर में एक आदमी कहता है कि जब तक 'सेक्यूलर इंडिया’ है, हिंदू मारे जाते रहेंगे और वह भाजपा सरकार के पक्ष में वोट नहीं देने वाले राज्यों केरल, पश्चिम बंगाल और पंजाब में हिंदुओं का भविष्य अंधकारमय बताता है.

सियासी मामला
फिल्म को भाजपा के नेताओं और राज्य सरकारों ने बढ़-चढ़कर गले लगाया. कुछ राज्य सरकारों ने इसे कर-मुक्त कर दिया है. मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की सरकार फिल्म देखने के लिए पुलिस अफसरों को छुट्टी दे रही है. फिल्म की रिलीज के एक दिन बाद 12 मार्च को अग्निहोत्री और उनकी पत्नी पल्लवी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भेंट की.

13 मार्च तक फिल्म ने अपनी एक दिन की कमाई में दोगुना इजाफा करते हुए 15 करोड़ रुपए बटोर लिए. 15 मार्च को भाजपा संसदीय दल की बैठक में मोदी ने कहा कि ऐसी और फिल्में बननी चाहिए. उन्होंने अग्निहोत्री पर कश्मीरी मुसलमानों के खिलाफ हिंसा भड़काने के आरोपों का भी बचाव किया. मोदी ने कहा, ''जो लोग अभिव्यक्ति की आजादी का झंडा उठाए घूमते थे, पिछले कुछ दिनों में बौखला गए हैं.

तथ्यों और कला के आधार पर फिल्म का मूल्यांकन करने के बजाए वे फिल्म को बदनाम करने का अभियान चला रहे हैं. मेरा मुद्दा फिल्म नहीं है. मेरी चिंता यह है कि सत्य जो भी है, उसे देश की भलाई के लिए सही तरीके से पेश करने की जरूरत है. अगर कोई चाहे तो इसी मुद्दे पर अलग नजरिये से एक और फिल्म ला सकता है.’’

मगर क्या वे ला सकते हैं? 2002 के गुजरात दंगों पर राहुल ढोलकिया की फिल्म परजानिया उस राज्य में कभी दिखाई नहीं गई, क्योंकि वहां सिनेमाघर मालिकों को उग्र प्रतिक्रिया का डर था. हाल के वर्षों में सिनेमा का भविष्य साफ तौर पर सियासी फैसलों से ज्यादा तय हुआ है. भाजपा शासित राजस्थान ने पद्मावत को प्रदर्शित होने देने से इनकार कर दिया था.

उत्तराखंड ने केदारनाथ को प्रदर्शित नहीं होने दिया, क्योंकि इसमें हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़के के बीच प्रेम दिखाया गया था. हिंदू कट्टरतावादियों की हुकूमत में तकलीफ से बेजार काल्पनिक भारत पर बनी नेटफ्लिक्स की सीरीज लैला का सीजन 2 दक्षिणपंथियों के विरोध के बाद आया ही नहीं.

द कश्मीर फाइल्स कश्मीर की हिंसा पर पहली फिल्म नहीं है. हिंदी सिनेमा उग्रवाद (मिशन कश्मीर, यहां) और लोगों पर उसके मनोवैज्ञानिक जख्मों (हैदर) से मुखातिब हुआ है. तमिल फिल्मकार मणिरत्नम ने 1990 के दशक में अपनी प्रशंसित फिल्म रोजा में बगावत की पड़ताल की थी. 2020 में लेखक-निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने, जो खुद कश्मीरी पंडित हैं, शिकारा बनाई. वह अतीत के जख्मों से उबर पाने में असमर्थ पंडित युगल की प्रेम कहानी थी.

उन्होंने नायिका शांति की भूमिका अदा करने के लिए कश्मीरी मुस्लिम सादिया खतीब को चुना. द कश्मीर फाइल्स को जो बात उन कहानियों से अलग करती है, वह मीडिया एनैलेटिक्स और कंस्लटिंग फर्म ओरमैक्स मीडिया के संस्थापक-सीईओ शैलेश कपूर के शब्दों में यह है कि यह ''देश के मौजूदा मिजाज के अनुरूप दक्षिणपंथी भावनाओं को खुराक देती है.’’ वे कहते हैं, ''लोग कहानी के हिंदू चश्मे से जुड़ रहे हैं. यह कश्मीर मुद्दा उतना नहीं है और बात 'हिंदुओं के साथ ऐसा हुआ’ के बारे में ज्यादा है.’’

अग्निहोत्री कहते रहे हैं कि पंडित, यानी हिंदू, उनकी प्राथमिकता हैं. इसमें ज्यादातर कश्मीरी मुसलमानों को पाकिस्तान से प्यार करने वाले और हिंदुओं से नफरत करने वाले आतंकवादियों की तरह दिखाया गया है. इसमें पंडितों के खिलाफ भीषण नारेबाजी और हिंदुओं के खिलाफ हिंसा के भयानक दृश्य जज्बात को झकझोरते हुए खौफ पैदा करते हैं.

फिल्मकार ने राजनीति की व्याख्या भी अपने चुनिंदा ढंग से की है. स्थानीय लोगों को उकसाने में पाकिस्तान की भागीदारी को ज्यादा नहीं दिखाया गया. पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला को बदनाम किया गया है. मगर तब के प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह का कोई जिक्र नहीं है, जिनकी सरकार को उस वक्त भाजपा का समर्थन था, जब यह त्रासदी घट रही थी. 

फिल्म का प्रभावी हिस्सा वह है जिसमें अग्निहोत्री पंडितों के अलगाव और नुक्सान के एहसास पर सहानुभूति भरी नजर डालते हैं. विवेक ओबरॉय अभिनीत पीएम नरेंद्र मोदी की याद दिलाने वाले एक संवाद में खेर का किरदार कहता है, ''कश्मीर जल रहा है.’’ वह शरणार्थी शिविर में एक प्लेकार्ड थामे है जिस पर लिखा है 'अनुच्छेद 370 हटाओ’ और पंडितों के पुनर्वास की मांग करता है. पलायन के करीब तीन दशक बाद अनुच्छेद 370 को हटा लिया गया है. मगर पंडितों की वापसी अब भी महज ख्वाब ही है.

अतीत की याद
विवेक अग्निहोत्री की द कश्मीर फाइल्स में 'उदारवादी’ प्रोफेसर की भूमिका में पल्लवी जोशी. इस फिल्म में मिथुन चक्रवर्ती भी हैं

अग्निहोत्री की इस फिल्म में अधिकतर कश्मीरी मुसलमानों को पाकिस्तान से प्यार करने वाले और हिंदुओं से नफरत करने वाले आतंकवादियों की तरह दिखाया गया है. इस फिल्म में कई दृश्य खौफ पैदा करने वाले हैं

जोरदार हो-हल्ले  की वजह
पहले दिन 3.25 करोड़ रुपए की शुरुआत के बाद मुंहजबानी प्रचार, सोशल मीडिया पर चर्चा और न्यूज कवरेज फिल्म को हफ्ते भर में 100 करोड़ रुपए के पार ले जा रही हैं

उत्तर प्रदेश, गोवा, त्रिपुरा, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, हरियाणा और गुजरात सरीखे भाजपा शासित राज्यों में फिल्म को कर-मुक्त कर दिया गया. असम में सरकार कर्मचारियों को 2 घंटे 50 मिनट की इस फिल्म को देखने के लिए आधे दिन की छुट्टी दे रही है

 फिल्म को कई कंपनियों का समर्थन मिल रहा है. मसलन, डालमिया भारत ग्रुप ने अपने कर्मचारियों और 'केवल दिल्ली में उनके जीवनसाथी के लिए’ टिकट बुक करने की पेशकश की है
 

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