
पार्टी फंड का सूचकांक
कांग्रेस पार्टी लोकसभा में दूसरा सबसे बड़ा राजनैतिक दल है और राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पंजाब जैसे राज्यों में इसकी सरकार है लेकिन संपत्ति के मामले में यह बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से पीछे है जिसकी किसी प्रदेश में सरकार नहीं है लेकिन लोकसभा में 10 सांसद हैं.
यह बात राजनैतिक दलों की तरफ से चुनाव आयोग के समक्ष घोषित वित्त वर्ष 2019-20 के आय-व्यय के ब्योरे का अध्ययन करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रिटक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने जनवरी 2022 में जारी रिपोर्ट में कही. भाजपा नंबर एक पर और सपा, बसपा और कांग्रेस लगभग बराबरी पर हैं. संपत्ति के मामले में शीर्ष पांच पार्टियों में से चार उत्तर प्रदेश के चुनाव मैदान में प्रमुखता से उतरी हुई हैं.
पार्टियों की देनदारी में बैंक कर्ज, ओवरड्राफ्ट आदि शामिल हैं. इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आइसीएआइ) की बनाई गाइडलाइंस के मुताबिक पार्टियों को अकाउंट का ब्योरा देना होता है लेकिन पार्टियां इसमें बहुत सारे ब्योरे नहीं देतीं. एडीआर के हेड मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) अनिल वर्मा कहते हैं कि पार्टियों की आय और व्यय का मूल्यांकन शायद ही कभी किया जाता हो, लिहाजा इनकी प्रामाणिकता भी संदिग्ध रहती है.
कंपनियों की तरह लेखा-परीक्षण के नियम पार्टियों के लिए बाध्यकारी नहीं हैं. आठ राष्ट्रीय पार्टियों में से सात के अकाउंट के ब्योरे आयोग के पास हैं. पंजीकृत गैर मान्यता प्राप्त दलों की आय-व्यय का कोई अता-पता नहीं है जबकि इनकी संख्या अप्रैल 2018 में 2,044 थी और यह सितंबर 2021 में बढ़कर 2,796 हो गई.

2019 के चुनाव में कुल 673 दलों ने भाग लिया था. जाने-माने आरटीआइ एक्टिविस्ट सुभाष अग्रवाल कहते हैं कि ज्यादातर पंजीकृत दलों ने कभी किसी चुनाव में भाग नहीं लिया, ये सिर्फ काले धन को सफेद करने के लिए बनाए जाते हैं. दलों का चंदा आयकर मुक्त होता है और दानदाता को भी छूट मिलती है. अग्रवाल छूट हटाने और सारा चंदा ऑनलाइन लेने की मांग भी करते हैं.

