
आनंद दत्ता, रांची से
जनवरी की 30 तारीख को झारखंड के धनबाद और बोकारो में हजारों आदिवासी और मूलनिवासी सड़कों पर उतर आए. उन्होंने वहां करीब 50 किलोमीटर की मानव शृंखला बनाई. इसी के साथ राज्य में भाषाई युद्ध छिड़ गया. दरअसल, ये लोग झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (जेएसएससी) की ओर से मैट्रिक और इंटर स्तरीय परीक्षाओं के लिए क्षेत्रीय भाषा की श्रेणी में भोजपुरी, मगही, अंगिका और उर्दू को जगह दिए जाने का विरोध कर रहे हैं. आंदोलनकारियों को क्षेत्रीय भाषा के तौर पर बाहरी (बिहारी) भाषाएं मंजूर नहीं हैं.
नाराजगी इतनी ज्यादा है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान बोकारो में रास्ते से गुजर रहे भाजपा नेता और पूर्व सांसद रवींद्र राय को लोगों ने खदेड़ दिया. उनकी गाड़ी पर हमला किया गया और उसके शीशे तोड़ दिए. उन्होंने 200 अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज कराई है.
दरअसल, झारखंड सरकार ने बीते 23 दिसंबर, 2021 को एक नोटिफिकेशन जारी किया था. इसके मुताबिक, जेएसएससी की ओर से मैट्रिक और इंटर स्तरीय परीक्षाओं के लिए जनजातीय भाषा की श्रेणी में संथाली, कुडुख, खड़िया, हो, मुंडारी, असुर, बिरजिया, बिरहोरी, भूमिज और माल्तो को शामिल किया गया. वहीं, क्षेत्रीय भाषा की श्रेणी में नागपुरी, पंचपरगनिया, बांगला, अंगिका, कुरमाली, मगही, उडिय़ा, खोरठा और भोजपुरी को जगह दी गई. अगले दिन एक और नोटिफिकेशन जारी हुआ और उर्दू को सभी जिलों की क्षेत्रीय भाषा की सूची में शामिल कर दिया गया.
जिलावार जारी सूची के मुताबिक, बोकारो और धनबाद में क्षेत्रीय भाषा की श्रेणी में भोजपुरी, मगही, उर्दू, खोरठा, बांग्ला, कुरमाली और नागपुरी को रखा गया है. आंदोलन में शामिल बोकारो के पत्रकार और तुपकाडीह गांव के रहनेवाले 29 वर्षीय तीर्थनाथ आकाश कहते हैं, ''इन दो जिलों में भोजपुरी, मगही बोलने वाले लोग न के बराबर हैं. जो लोग हैं, वे किराएदार हैं या हाल के वर्षों में जमीन खरीदकर यहां बस गए हैं. हम इन्हें बाहरी और अतिक्रमणकारी मानते हैं. यहां अधिकतर लोग खोरठा बोलते हैं.'' जब खोरठा शामिल है, फिर विरोध क्यों? बोकारो जेनामोड़ के सामाजिक कार्यकर्ता और किसान 39 वर्षीय सोहराय हांसदा बताते हैं, ''इन भाषाओं के लोग अगर नियुक्त होते हैं तो वे सीधे गांव तक पहुंच जाएंगे. वे अपनी भाषा लेकर ही जाएंगे. उसके प्रचार-प्रसार के लिए उनके पास अथाह सामग्री है. मसलन, सरस्वती पूजा में केवल भोजपुरी गाना सुनने को मिल रहा है. ऐसे में खोरठा कहां तक टिक पाएगी? हम अगली पीढ़ी को अपनी भाषा कहां से दे पाएंगे?''
यह रोजगार से भी जुड़ा हुआ मसला है. रांची यूनिवर्सिटी में जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग के प्रमुख प्रो. हरि उरांव कहते हैं, ''झारखंडी भाषाओं में अब पीजी स्तर तक पढ़ाई होती है. फेलोशिप, स्कॉलरशिप मिल रही हैं. नौकरी भी मिल रही है. लोगों को भविष्य दिख रहा है. उन्हें आभास हो रहा है कि अगर भोजपुरी, मगही को जगह मिल गई तो उनके लिए रोजगार के मौके कम हो जाएंगे.''
जेएसएससी कई सारे पदों पर भर्तियां निकालती है. जिला और राज्यस्तरीय नियुक्तियों में एक पेपर क्षेत्रीय-जनजातीय भाषा का भी होगा, जिसके प्राप्तांक को जोड़कर मेरिट लिस्ट बनेगी. आंदोलनकारियों का मानना है कि खोरठा एवं अन्य जनजातीय भाषाओं के मुकाबले भोजपुरी, मगही, अंगिका के सिलेबस की किताबें अधिक उपलब्ध हैं जिससे इनके परीक्षार्थियों के पास करने की संभावना अधिक होगी. तोपचांची, धनबाद के रहनेवाले जयराम महतो का कहना है कि जिलावार नियुक्ति स्थानीय लोगों को वरीयता देने के लिए होती है. वे कहते हैं, ''हम बिहार और यूपी के लोगों से मुकाबला नहीं कर सकते. अगर हम स्थानीय भाषा में परीक्षा देंगे तो उनसे बेहतर कर पाएंगे.''
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 2021 को नियुक्ति वर्ष घोषित किया था. कोरोना का वास्ता देकर वे 2022 में अपने नौकरी के वादे को पूरा करने की बात कह रहे हैं. जाहिर है, अगर क्षेत्रीय-जनजातीय भाषा में युवाओं को नौकरी मिलने लगे, तो उसे पाने की संभावना और उस भाषा के बचने की संभावना बढ़ जाती है.
इससे पहले 12 अगस्त, 2021 को जेएसएससी ने एक और नोटिफिकेशन जारी किया था. उसमें क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषा में 30 फीसद अंक प्राप्त करना अनिवार्य कर दिया गया था. इसी महीने पलामू और गढ़वा जिलों में हिंदी भाषा को क्षेत्रीय भाषा वर्ग में शामिल करने के लिए आंदोलन शुरू हुआ. दरअसल, बिहार से सटे होने के कारण इन जिलों में अधिकतर लोग हिंदी के अलावा भोजपुरी, मगही, अंगिका बोलते हैं. युवाओं को डर था कि नागपुरी, खोरठा को शामिल और अनिवार्य कर दिया गया तो उन्हें नौकरी नहीं मिल पाएगी. तब हिंदी को छोड़ भोजपुरी, मगही को जोड़ा गया. डाल्टनगंज की राजनीति में सक्रिय स्थानीय युवक 27 वर्षीय सन्नी शुक्ला कहते हैं, ''बोकारो और धनबाद में हुए आंदोलन के बाद हमें आशंका है कि फिर इन भाषाओं को हटा दिया जाएगा. इसके अलावा जिन भाषाओं को शामिल किया गया है, वे यहां नहीं बोली-समझी जातीं.''

भाषा आंदोलन के साथ स्थानीय नीति लागू करने की मांग भी जोर पकड़ रही है. बीते विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) ने 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय नीति और फिर नियोजन नीति लागू करने का वादा किया था. वहीं, पूर्व की रघुवर दास सरकार ने इसके लिए 1985 को आधार वर्ष माना था. उसके मुताबिक, 1985 तक जो झारखंड आ गए थे, जिनके पास संपत्ति थी, उनको झारखंडी माना जाएगा. वैसे, हेमंत सरकार ने इसे अभी तक खारिज नहीं किया है. पर एक नियम जरूर जोड़ दिया गया है कि वही व्यक्ति सरकारी परीक्षाओं में शामिल हो पाएंगे जिन्होंने दसवीं-बारहवीं झारखंड से पास की है. कांग्रेस अध्यक्ष राजेश ठाकुर कहते हैं, ''एक ओर तो 1932 की बात की जा रही है. दूसरी ओर नए नियम से अगर कोई कभी भी दसवीं-बारहवीं झारखंड से पास करता है, तो उसे स्थानीय माना जाएगा. ये विरोधाभासी है.''
दो साल बाद भी सरकार ने अपना वह वादा नहीं निभाया है. इसको लेकर जेएमएम दबाव में है. शिबू सोरेन सहित सरकार में शामिल अन्य आदिवासी नेता और कांग्रेस विधायक बंधु तिर्की जब भी इसे लागू करने की मांग उठाते हैं, कांग्रेस सहित अन्य दलों के गैर-आदिवासी नेता इसका विरोध करते हैं. बीती 29 जनवरी को जब कांग्रेस के झारखंड के नए प्रभारी अविनाश पांडे रांची पहुंचे, तो पूर्व शिक्षा मंत्री गीताश्री उरांव ने दोपहर के समारोह में उनका स्वागत किया. लेकिन शाम होते-होते स्थानीय नीति और भाषा पर पार्टी का रवैया स्पष्ट न होने का आरोप लगाते हुए उरांव ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया. उरांव ने इंडिया टुडे को बताया, ''जिस भोजपुरी, मगही को बिहार में राजभाषा का दर्जा नहीं दिया गया है, उनको यहां की सरकार ने वरीयता दी है. इसमें कांग्रेस नेता भी शामिल हैं. इसके लिए अलग राज्य की लड़ाई नहीं लड़ी गई थी. किसी भी राज्य का मुख्य आधार तो उसकी भाषा, संस्कृति ही है.''
जेएमएम नेता और राज्य के शिक्षा मंत्री जगन्नाथ महतो ने 31 जनवरी को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि बोकारो और धनबाद से भोजपुरी तथा मगही को हटाया जाएगा. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''बोकारो, धनबाद, गिरिडीह में एक भी घर नहीं है जहां लोग भोजपुरी बोलते हों. उसको प्राथमिकता देने का कोई आधार नहीं.'' क्या कांग्रेस के दबाव में यह निर्णय लिया गया था? शिक्षा मंत्री ने सवाल को टालते हुए कहा, ''खुद ही समझ लीजिए.''
दरअसल, शहरी इलाकों में वोटरों को साधने के लिए रघुवर सरकार ने भोजपुरी, मैथिली, मगही और अंगिका को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया था. कांग्रेस ने अब यहां पैठ बढ़ाने के लिए इन भाषाओं को जोर देकर शामिल कराया है. वहीं, शिबू सोरेन ने मांझी-महतो यानी आदिवासी और महतो वर्ग का एक बड़ा वोट बैंक तैयार किया था. इसमें मूलनिवासी महतो का वोट छिटक-सा गया है. हेमंत इस वोटवर्ग को मजबूती से जोड़ना चाहते हैं. यही वजह है कि पहले उन इलाकों में भोजपुरी और मगही को शामिल करना, विरोध के बाद हटाना तथा क्षेत्रीय-जनजातीय भाषा में 30 फीसद अंक अनिवार्य जैसी कवायद लगातार की जा रही हैं. जाहिर है, भाषा के जरिए शह और मात का खेल जारी है.

