जहां सबकी नजर/अमृतसर सीट
आरोपों की बौछार और जवाबी हमले. दुश्मन बनते दोस्त. पंजाब का अमृतसर पूर्व इस वक्त जलते तवे सरीखा है. एक कोने में नवजोत सिंह सिद्धू हैं जो अपनी महत्वाकांक्षा के आड़े आने वाली किसी भी चीज पर खुद को पेट्रोल बम की तरह फेंकते हैं, भले ही वह उनकी अपनी पार्टी का ही क्यों न हो! भला कौन उनसे मुचैटा लेना चाहेगा?
अकाली दल में नंबर दो, विवादास्पद विक्रम सिंह मजीठिया के अलावा भला कौन. गिरफ्तारी पर आखिरी वक्त में सुप्रीम कोर्ट की रोक से लैस और पंजाब में मादक पदार्थों के सबसे बड़े सियासी सरपरस्त होने के आरोपों से घिरे मजीठिया ने पास के अपने पारिवारिक गढ़ मजीठा को तिलांजलि दे दी और सिद्धू की फेंकी चुनौती का तीर उठा लिया. उनके सिर पर बदले की आग जो सवार है.
मजीठिया ने ही एक दशक पहले इस शहरी निर्वाचन क्षेत्र को सिद्धू का गढ़ बनाने में मदद की थी. तब सिद्धू भाजपा में थे. उनकी पत्नी नवजोत कौर सिद्धू ने भी यह सीट मजीठिया की मदद से जीती थी. खुद मजीठिया ऐसे परिवार से हैं जिसकी माझा इलाके पर सदियों पुरानी छाप है.
2012 के चुनाव के बाद सिद्धू का मजीठिया और उनके बहनोई सुखबीर बादल से झगड़ा हो गया. बीते छह महीनों में दुश्मनी इतने चरम पर पहुंच गई कि सिद्धू ने अपने पूर्व साथी को दुरुस्त करना अपना निजी एजेंडा बना लिया. उन्हीं की शह पर मादक पदार्थों की तस्करी और रेत माफिया से कथित जुड़ावों को लेकर मजीठिया के खिलाफ एफआइआर दर्ज की गई.
इसने 2022 की बड़ी जंग का रंगमंच तैयार कर दिया, जिसके पंजाब के लिए कहीं ज्यादा बड़े नतीजे होंगे, खासकर माझा के लिए. माझा के चार जिलों में 25 विधानसभा क्षेत्र हैं, जिनमें से 15 में अकाली दल का कांग्रेस से सीधा मुकाबला है. अकालियों को उम्मीद है कि यहां की तीखी लड़ाई दूसरी जगहों के कार्यकर्ताओं को भी जोश से भर देगी.

