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लेकिन खर्च भी तो हो...

पूंजीगत व्यय मद में तो 35 फीसद की बढ़ोतरी की गई है लेकिन असल खर्च आवंटित रकम के मुकाबले काफी कम रहना चिंता का बड़ा सबब

सुस्त रफ्तार पहले से ही विलंबित चल रहे दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की गुजरात में धोलेड़ा साइट में काम में लगे कर्मचारी.
सुस्त रफ्तार पहले से ही विलंबित चल रहे दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर की गुजरात में धोलेड़ा साइट में काम में लगे कर्मचारी.
अपडेटेड 17 फ़रवरी , 2022

केंद्रीय बजट  2022 क्रियान्वयन

इस 1 फरवरी को केंद्रीय बजट पेश करते वक्त वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश के करदाताओं के प्रति आभार जताया और उनके बारे में कहा, ''खुलकर योगदान दिया और सरकार के हाथ मजबूत किए.’’ सीतारमण ने कुछ भारी-भरकम घोषणाएं भी कीं, जिसमें अगले वित्त वर्ष के लिए पूंजीगत खर्च के प्रावधान को 35 फीसद बढ़ाकर 7.5 लाख करोड़ रुपए करना शामिल है.

हालांकि करदाताओं और विशेषज्ञों के लिए अमल में हीला-हवाली सबसे ज्यादा चिंता का विषय है, जिससे हर साल बजट की घोषणाओं और वास्तविक खर्च में चौड़ी खाई दिखती है. इसकी वजह केंद्र और राज्य सरकारों की बेहद सुस्त नौकरशाही और फंड जारी करने की अजीबोगरीब प्रक्रिया है, जिससे काफी देर हो जाती है.

कोविड महामारी ने हालात और बदतर कर दिए, जैसा कि मौजूदा वित्त वर्ष से जाहिर है. लिहाजा, केंद्र और राज्य दोनों स्तर पर सरकारी खर्च में फर्क काफी बढ़ गया. महालेखा नियंत्रक (सीजीए) के आंकड़ों से पता चलता है कि वित्त वर्ष 2021-22 के आठ महीनों (सिर्फ नवंबर तक के आंकड़े उपलब्ध) में केंद्र में खर्च के लिए तय रकम 40 फीसद खर्च नहीं हुई थी. सीजीए के मुताबिक, केंद्र सरकार का नवंबर तक कुल खर्च 20.7 लाख करोड़ रु. था, जबकि 2021-22 के बजट में 34.8 लाख करोड़ रु. का प्रावधान था. इसका मतलब है कि तय रकम का सिर्फ 59.6 फीसद ही खर्च किया जा सका.

लेकिन खर्च भी तो हो...
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धीमा खर्च
सरकार का 2021-22 का तय पूंजीगत खर्च 5.54 लाख करोड़ रु. है, लेकिन नवंबर तक सिर्फ 49 फीसद (2.73 लाख करोड़ रु.) हो पाया. पूंजीगत खर्च वह है जो कि सरकार मशीनरी, उपकरण, भवन, स्वास्थ्य सुविधाओं वगैरह के विकास के साथ जमीन जैसी स्थाई संपत्तियां खरीदने पर करती है. विभिन्न मंत्रालय शायद वित्त वर्ष के अंत में अपने पूंजीगत खर्च में इजाफा करें.

राष्ट्रीय इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन (एनआइपी) के लिए 44,700 करोड़ रु. का प्रावधान किया गया था, जिसे सीधे आर्थिक मामलों के विभाग (डीईए) को ही खर्च करना था. डीईए का वित्त वर्ष के लिए कुल पूंजी प्रावधान 56,500 करोड़ रु. है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, नवंबर तक सिर्फ 2 फीसद या 1,150 करोड़ रु. ही खर्च हो पाए थे. केंद्रीय प्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड ने अपने विभाग के प्रावधान 20,100 करोड़ रु. में से सिर्फ 5,100 करोड़ रु. ही खर्च किया.

इन्फ्रास्ट्रक्चर कंसल्टेंसी फर्म फीडबैक वेंचर्स के चेयरमैन विनायक चटर्जी का अनुमान है कि सरकार के तय किए पूंजीगत खर्च का करीब 55 फीसद ही खर्च हो पाया है. चटर्जी कहते हैं, ''वित्त वर्ष के इस वक्त तक तो खर्च करीब 66 फीसद हो जाना चाहिए.’’ इस वर्ष दो दिक्कतें आईं. कोविड की दूसरी लहर की वजह से अप्रैल-जून में प्रोजेक्ट रुके रहे और फिर इधर ओमिक्रॉन वेरिएंट से तीसरी लहर आ गई.

लेकिन खर्च भी तो हो...
लेकिन खर्च भी तो हो...

इंडिया टुडे से बातचीत में चटर्जी बताते हैं, ''खर्च में कमी की वजह कोविड महामारी हो सकती है. कितने ही कामगार बीमार पड़ गए, जिससे परियोजनाओं पर अमल में देरी हुई.’’ सीजीए के आंकड़ों से पता चलता है कि महामारी के पहले के वर्ष 2019-20 में ज्यादातर मंत्रालयों ने अपने संशोधित खर्च अनुमान के मुकाबले खर्च का अपना लक्ष्य (90 फीसद और ज्यादा) पूरा कर लिया था.

वित्त वर्ष 2021-22 के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए 73,931.8 करोड़ रु. खर्च का प्रावधान था. उसमें से नवंबर तक 47,006 करोड़ रु. (करीब 64 फीसद) खर्च हुए. अप्रैल 2021 तक स्वास्थ्य पर कुल सरकारी खर्च में राज्यों की हिस्सेदारी 69 फीसद थी. राज्य स्तर पर केंद्रीय योजनाओं पर अमल के लिए केंद्र प्रमुख रूप से वित्त आयोग और विभागीय प्रावधानों के जरिए रकम देता है.

नई दिल्ली स्थित गैर-मुनाफा हेल्थ ट्रांसफॉर्मेशन प्लेटफॉर्म (एचएसटीपी) के एक अध्ययन के मुताबिक, स्वास्थ्य के मोर्चे पर कम खर्च की मुख्य वजहें कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था, स्वास्थ्य क्षेत्र में कर्मियों की कमी, सरकारी मसले और खरीद तथा निर्माण की पेचीदा प्रक्रिया है.

दूसरी वजह केंद्र से हासिल रकम को राज्यों में जिला स्तर तक पहुंचने में लगने वाली देरी है. एचएसटीपी की सुधा चंद्रशेखर और भुवनेश्वर में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक हेल्थ की सरित के. राउत के अप्रैल 2021 के अध्ययन के मुताबिक, ''देरी सरकारी खजाने से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के मुख्यालय और फिर वहां से जिला स्वास्थ्य संस्थाओं तक रकम पहुंचने की प्रक्रिया में लगती है, जिनके कई बैंक खाते होते हैं. इससे पारदर्शिता भंग होती है और निगरानी काफी पेचीदा हो जाती है.’’

जल शक्ति मंत्रालय नवंबर तक वित्त वर्ष के लिए तय राशि का सिर्फ 34 फीसद ही खर्च कर पाया था; वह पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में 44 फीसद खर्च कर चुका था. हालांकि मंत्रालय जल जीवन मिशन के तहत 2024 तक सभी ग्रामीण घरों तक पीने का पानी पहुंचाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य का पीछा कर रहा है.

अनुमानित 18.7 करोड़ ग्रामीण घरों में से अगस्त 2021 तक सिर्फ 17 फीसद तक ही किसी तरह नल जल पहुंच पाया है. जल जीवन मंत्रालय के लिए प्रावधान अनुमानित 3.6 लाख करोड़ रु. है, जिसमें से 2.08 लाख करोड़ रु. केंद्र की हिस्सेदारी का है. चटर्जी की राय है कि तमाम अड़चनों के बावजूद जल जीवन मिशन ने सराहनीय प्रगति की है.

लेकिन इसके क्रियान्वयन में तेजी लाने के लिए चटर्जी निगमों, ट्रस्टों और देसी-विदेशी फाउंडेशनों को जोड़ने की वकालत करते हैं, जो कुछ गांवों को अपनाकर इसमें हिस्सेदारी करने की ख्वाहिश रखते हैं. चटर्जी कहते हैं, ''स्थानीय जल सुविधाओं के लिए पानी समितियों के गठन का विस्तार बिजली, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में किया जाना चाहिए.’’

इस बीच, कृषि मंत्रालय 2021-22 के बजट प्रावधान का नवंबर तक सिर्फ आधी रकम ही खर्च कर पाया था, जबकि आयुष मंत्रालय 51 फीसद, कोयला मंत्रालय 60 फीसद और संचार तथा शिक्षा मंत्रालय क्रमश: 53 और 48 फीसद रकम ही खर्च कर पाए थे.

राजस्व के मामले में सरकार नवंबर तक वित्त वर्ष के लिए निर्धारित राजस्व का करीब 70 फीसद (कुल 19.7 लाख करोड़ रु. में से 13.7 लाख करोड़ रु.) हासिल कर चुकी थी. कुल निर्धारित 15.4 लाख करोड़ रु. के कर राजस्व में उसे 11.3 लाख करोड़ रु. हासिल हो चुके थे. नवंबर में केंद्र ने 95,082 लाख करोड़ रु. राज्यों को कर खाते में उनकी हिस्सेदारी के मद में ट्रांसफर किए. यह कर संग्रह में इजाफे की वजह से हुआ.

यह बजट अनुमान के मुताबिक दोबारा मासिक हस्तांतरण था. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश को सबसे ज्यादा हिस्सा (17,057 करोड़ रु.) मिला. उसके बाद बिहार (9,563 करोड़ रु.), मध्य प्रदेश (7,464 करोड़ रु.), पश्चिम बंगाल (7,153 करोड़ रु.) और महाराष्ट्र (6,006 करोड़ रु.) का नंबर था. राज्यों को कर हस्तांतरण साल में 14 किस्तों में होता है और संशोधित अनुमान के हिसाब से भरपाई अमूमन मार्च में की जाती है. पर सवाल है कि राज्य कितने कारगर ढंग से रकम का इस्तेमाल कर रहे हैं?

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ऊंघते-उनींदे राज्य
केंद्र की योजना और फंड से बड़ी परियोजनाओं पर राज्य अमल करते हैं. 2022-23 में अर्थव्यवस्था में कुल निवेश के इजाफे के लिए केंद्र राज्यों को एक लाख करोड़ रु. देगा. यह 50 साल के लिए ब्याज मुक्त कर्ज राज्यों की सामान्य कर्ज उठान से अलग होगा. कई केंद्रीय योजनाएं तय समय से पीछे चल रही हैं. जानकारों का कहना है कि ज्यादातर समस्या राज्यों के स्तर पर है.

भारतीय रिजर्व बैंक के नवंबर में जारी राज्य बजट सार-संक्षेप से पता चलता है कि कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में राज्य काफी पिछड़ रहे हैं और उसकी वजह से बजट में खर्च के प्रावधान और वास्तविक खर्च में बड़ा अंतर है. बजट में खर्च का प्रावधान पूरे साल का होता है, जबकि संशोधित अनुमान वित्त वर्ष के नौ महीने के आंकड़ों के आधार पर आकलन होता है. ये आकलन अक्सर बजट में खर्च के प्रावधान से ज्यादा होते हैं.

हालांकि, वास्तविक खर्च आखिरकार जब पेश किया जाता है तो उसमें भारी कमी दिखती है. इसका अंदाजा राज्य के बजटीय घाटे में कमी से भी लगाया जा सकता है. घाटा तब होता है जब सरकारी खर्च करों और दूसरे स्रोतों से जुटाए राजस्व से ज्यादा हो जाता है. ज्यादा बजटीय घाटे का मतलब है कि सरकार ने उधारी या कर्ज उठाकर अपने राजस्व से ज्यादा खर्च कर डाला है.

हालांकि कम बजटीय घाटा चिंता का विषय है क्योंकि उससे सरकारी खर्च में कमी का पता चलता है. आरबीआइ का डेटा बताता है कि 2021-22 में जीडीपी के 3.6 फीसद पर राज्यों का बजटीय घाटा 2020-21 के संशोधित अनुमान 4.7 फीसद से 1.1 फीसद कम था.

एशिया पैसिफिक स्ट्रैटजी और इंडिया इक्विटी स्ट्रैटजी फॉर क्रेडिट सुइस के सह-प्रमुख नीलकंठ मिश्र कहते हैं, ''अंतिम घाटा हमेशा संशोधित अनुमान से नीचे रहता है और अक्सर बजट के अनुमान से भी कम रहता है. बजटीय घाटे से कम घाटा ज्यादातर खर्च न कर पाने की वजह से होता है, जो लॉकडाउन की वजह से काफी प्रभावित हुआ है.’’

आरबीआइ के डेटा में बजटीय घाटे के राज्यवार आंकड़ों के अभाव में यह पता लगाना मुश्किल है कि कौन-से राज्य ज्यादा फिसले हैं. राज्यों ने कितना कम खर्च किया, इसका अंदाजा सरकार के पास मौजूद बची नकदी से भी लगता है. राज्य सरकारें आरबीआइ से लेनदेन नहीं कर सकतीं, लेकिन वे अधिशेष रकम से केंद्र के जीरो कूपन बॉन्ड खरीद सकती हैं.

केंद्र इस रकम को आरबीआइ में रखता है. मिश्र के मुताबिक, आंकड़ों से पता चलता है कि 2020-21 के आखिर में केंद्र ने 2.7 लाख करोड़ रु. आरबीआइ में जमा कर रखा है, मतलब राज्यों का घाटा जीडीपी के 3 फीसद के आसपास है.

मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही में राज्यों ने लक्ष्य से 80,000 करोड़ रु. कम उधार उठाए और बची हुई रकम 20,000 करोड़ रु. आसपास पहुंच गई. मिश्र कहते हैं, ''2021-22 में भी घाटा जीडीपी के 3 फीसद के आसपास हो सकता है और उधारी बजट अनुमान से एक लाख करोड़ रु. कम हो सकती है.’’

तेलंगाना के पूर्व मुख्य सचिव एस.के. जोशी क्रियान्वयन में देरी के लिए कई वजहों की ओर इशारा करते हैं, और ये वजहें एक से दूसरे प्रोजक्ट में अलग-अलग होती हैं. वे कहते हैं, ''एक तो बजट में खर्च तय होने के बाद केंद्र और राज्य सरकार के प्रतिनिधियों के बीच संवाद का अभाव है. दूसरे, दिल्ली और राज्यों में चीजों के आगे बढ़ने की गति काफी अलग होती है, अमूमन यह प्रभारी व्यक्ति पर निर्भर होता है.

योजना के स्तर पर आंके गए मूल्य से कीमतों में बढ़ोतरी और राज्यों की हिस्सेदारी, चाहे वह जितनी हो, देने में अक्षमता भी परियोजनाओं के लटकने और केंद्रीय योजनाओं के क्रियान्वयन में देरी की वजहें होती हैं.’’ इसके अलावा, प्रोजेक्ट या परियोजना की प्रकृति को लेकर राज्य विशेष मसले होते हैं, जिन पर योजना के स्तर पर बात नहीं होती है.

खामियां और सबक
नाम न छापने की शर्त पर मुंबई स्थित एक अर्थशास्त्री का कहना है कि राज्य सरकारें हमेशा संशोधित बजट अनुमान ऊंचा रखती हैं, ताकि लक्ष्य से कम काम हो. यह बात कोविड के पहले के वर्षों में भी सही थी. उनकी दलील है कि सरकारें खर्च न करने का बहाना कोविड को नहीं बना सकतीं.

''सरकारों को निजी कंपनियों जैसा रवैया अपनाना चाहिए और आश्वस्त करना चाहिए कि कोई बड़ी रुकावट न हो. सरकारें अमूमन आपदा से बहाली की तैयारी रखती हैं. लेकिन महामारी ने मानो उनकी पोल खोल दी. जब करदाताओं के पैसे को सही ढंग से खर्च करने की बात आती है तो वे पकड़ी जाती हैं.’’

दूसरे लोग सरकार से वित्त वर्ष के अंत तक लक्ष्य हासिल करने की उम्मीद करते हैं. बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस का कहना है कि केंद्र के खर्च में कमी उपभोक्तर मामलों, खाद और ईंधन के क्षेत्रों में सबसे ज्यादा है, जहां सब्सिडी दी जाती है. मसलन, सरकार के मुक्त खाद्यान्न कार्यक्रम के लिए 2021-22 के मद में 98,000 करोड़ रु. का प्रावधान था.

वे कहते हैं, ''अनाज पहले ही एफसीआइ को दिया जा चुका हो सकता है, पर हिसाब-किताब वित्त वर्ष के अंत में लगाया गया हो सकता है. जब तक पूंजीगत खर्च से समझौता नहीं किया जाता, वृद्धि पर असर नहीं पड़ता.’’ 

हालांकि खर्च के मोर्चे पर कमियां तो पहले के वर्षों में भी हुई हैं, लेकिन महामारी ने इस जरूरत पर जोर डाला है कि राहत और ऐसी परियोजनाओं के लिए सरकारी मशीनरी के कारगर इस्तेमाल की दरकार है, जिससे बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा हो.

आरबीआइ के डेटा के मुताबिक, ऐसा 2021-22 में होता नहीं लगा. केंद्र और राज्य सरकारों दोनों को महामारी से कुछ कड़े सबक सीखना चाहिए. वे योजनाओं पर अमल कारगर ढंग से करें, अगर खर्च का लक्ष्य हासिल करने और लोगों को लाभ पहुंचाने का इरादा हो. 

—साथ में अमरनाथ के. मेनन

40 % रकम उस बजट की नवंबर 2021 तक बची रह गई थी जिसे केंद्र ने वित्त वर्ष 2021-22 में दिया था

70 % लक्ष्य, राजस्व जुटाने का (19.7 लाख करोड़ रु. में से 13.7 लाख करोड़ रु.) सरकार ने हासिल कर लिया

महामारी ने हमें यह बात अच्छी तरह से समझा दी है कि राहत पहुंचाने और नए रोजगार दे पाने में सक्षम परियोजनाओं को सिरे चढ़ाने के लिए सरकारी मशीनरी का बेहतर ढंग से इस्तेमाल कितना जरूरी है

''आवंटन और असल खर्च में भारी फासले के लिए कोविड से उपजे अड़ंगों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. श्रमिक और कर्मचारी बड़े पैमाने पर बीमार पड़ गए. इस वजह से परियोजनाओं के काम में देरी हुई’’
विनायक चटर्जी
चेयरमैन, फीडबैक वेंचर्स

‘‘बजट में खर्च का प्रावधान हो जाने के बाद केंद्र और राज्यों के अफसरों के बीच संवाद का नितांत अभाव देखा गया है. और दोनों के ही छोर पर काम की गति में काफी फर्क है’’
एस.के. जोशी
पूर्व मुख्य सचिव, तेलंगाना.

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