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उत्तर प्रदेशः वफादारी की जंग

शिनाख्त या आजीविका? इन दो ध्रुवों के बीच झूल रहे पश्चिमी उप्र के मतदाता गहरी दुविधा में हैं. हमारे दौर केसबसे ज्वलंत मुद्दों के केंद्र से एक ग्राउंड रिपोर्ट

बज गया बिगुल पश्चिमी उत्तर प्रदेश पिछले साल किसान आंदोलन का भी केंद्र रहा है
बज गया बिगुल पश्चिमी उत्तर प्रदेश पिछले साल किसान आंदोलन का भी केंद्र रहा है
अपडेटेड 17 फ़रवरी , 2022

प्रशांत श्रीवास्तव

यमुना के पूर्वी तट पर कैराना से देखें तो नदी के दूसरी तरफ पानीपत पड़ता है—सीमा पार करके एक घंटे में हरियाणा पहुंचा जा सकता है. गन्ने और आक्रोशित लोगों से भरे पश्चिम उत्तर प्रदेश में नदी के किनारे का यह मैदानी इलाका हमारे दौर का ऐतिहासिक युद्धक्षेत्र साबित हो सकता है. यह विचारों—दिमाग—की जंग है और अभी भी करोड़ों लोगों के दिमाग में उमड़ रही होगी क्योंकि यह इलाका 10-14 फरवरी को पहले दो चरणों के चुनाव के लिए तैयार है. यह हमारे दौर के सबसे ज्वलंत मुद्दों का केंद्र रहा है. ये इलाका न केवल पिछले साल के किसान आंदोलन का केंद्र रहा बल्कि यह पिछले करीब एक दशक से अधिक समय से हिंदुत्व की प्रयोगशाला रहा है. इनके साथ-साथ दोआब क्षेत्र के जटिल सामुदायिक ताने-बाने के साथ यहां बहुत गहरी और प्रतिस्पर्धी वफादारियां बनती हैं. हर मतदाता इन मसलों को कैसे हल करता है, इससे उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में से एक-चौथाई के नतीजे तय होंगे—जो दक्षिण में मंदिरों के शहर मथुरा से लेकर उत्तर में तराई के इलाके सहारनपुर तक फैला हुआ है.

इस इलाके की 50 सीटों पर जाट समुदाय हावी है और बाकी सीटों पर भी उनका असर है. जाट तबका इस जंग के केंद्र में है. हाल तक यह तबका भगवा रंग में रंगा था, लेकिन कृषि संकट ने इसे अपने धार्मिक पहचान से इतर जाकर रक्षात्मक रूप से एकजुट होते हुए देखा है. सत्तारूढ़ भाजपा स्वाभाविक रूप से इसे रोकना चाहती है. यही वजह है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह यहां घर-घर जा रहे थे और उन्हें कैराना में 2014-16 के पलायन की याद दिला रहे थे और यहां तक कि मुगलों के पुराने पड़ चुके संदर्भों का भी हवाला दे रहे थे. यह एक ऐसी समृद्ध कड़ी है जिसे भाजपा ने अतीत में सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया है और यह फिर काम कर सकती है—कम से कम उनके वोटों को नुक्सान न पहुंचाने वाले हिस्सों में बांट सकती है.

उत्तर प्रदेशः वफादारी की जंग
उत्तर प्रदेशः वफादारी की जंग

जाटों के आइकन और पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह के पोते तथा राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) के युवा नेता जयंत चौधरी के लिए भाजपा के दरवाजे खुले हैं,-शाह का यह बयान जाटों की नाराजगी को कम करने की कोशिश भर है. भाजपा के एक पदाधिकारी ने इंडिया टुडे से कहा, ''चौधरी साहब (अजित सिंह) के निधन के बाद जाटों में जयंत के प्रति सहानुभूति है. वे जयंत को अपने सियासी चेहरे के रूप में देखना चाहते हैं, इसलिए जयंत के बजाए हम समाजवादी गठबंधन पर निशाना साध रहे हैं. हमें अभी भी उम्मीद है कि आधा से अधिक जाट समुदाय भाजपा को वोट करेगा.''

जयंत पर इसका कोई असर नहीं पड़ रहा है—वे भाजपा की मुख्य विपक्षी समाजवादी पार्टी के साथ मजबूती के साथ खड़े हैं. सपा-रालोद का मुख्य जोर अपने-अपने वोट आधार को एकजुट करते हुए जाट-मुस्लिम-यादव वोटबैंक के निर्माण पर है. उनके गठबंधन से सैद्धांतिक रूप से यही नतीजा निकल रहा है. ठीक इसी दौरान वे अपने खेमे में नुक्सान के प्रति भी सचेत हैं और आगे बढ़ते हुए नई संभावनाएं भी तलाश रहे हैं. यही वजह है कि पिछली शताब्दी का प्रभावी मेल, जो चुनावी पर्यवेक्षकों का मुख्य आधार था, नए क्रमपरिवर्तन के साथ फिर से चलन में आ गया है. पुराने 'अजगर' की जगह इस बार बात 'गजब' फॉर्मूले की है. इसे समझने के लिए उन पुराने दिनों में जाना होगा जब कांग्रेस ने अपने स्वर्णिम दौर में ब्राह्मणों, दलितों और मुसलमानों को एकजुट करके सत्ता पर एकाधिकार कर रखा था. उसे चुनौती देते हुए 1960 के दशक में चरण सिंह ने पश्चिमी यूपी में महत्वपूर्ण संख्या रखने वाली गैर-ब्राह्मण और गैर-दलित जातियों का गठबंधन तैयार किया था. उस अजगर फॉर्मूले—जिसका तात्पर्य अहीरों, जाटों, गुर्जरों और राजपूतों से है—ने उन्हें मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचाया और उससे भी आगे बढ़कर इसने भारत में गैर-कांग्रेस राजनीति के रास्ते खोले.

अजगर फॉर्मूला अब काम नहीं करेगा. अहीर यानी यादव सपा प्रमुख अखिलेश यादव का मजबूत खेमा है, लेकिन राजपूतों को पूरी तरह से भाजपा का वफादार माना जा रहा है. ऐसे में उन्होंने अपनी नई ताकत का फॉर्मूला बनाया है—'गजब' (जीएजेएबी). इसमें गुर्जर, अहीर, जाट और नए हिस्से के रूप में ब्राह्मण को शामिल किया गया है. सपा अनिवार्य रूप से राजपूत वोटों की अनुपस्थिति की भरपाई ब्राह्मणों से करना चाहती है.

हालांकि मंडल मसीहा मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश के लिए यह कितना भी विपरीत लगे, लेकिन यूपी के संदर्भ मंर मुफीद नजर आ रहा है—जहां योगी आदित्यनाथ के 'ठाकुर राज' में दरकिनार कर दिए जाने की वजह से ब्राह्मणों को हमेशा नाराज बताया जाता है. इसलिए, ब्राह्मणों की उपेक्षा का विलाप कर रहे सपा नेताओं का मंजर अप्रत्याशित नहीं है. हालांकि 'गजब' फॉर्मूले को साध पाना अभी भी इतना आसान नहीं है. जाटों के गठबंधन वाले पैकेज में गुर्जर आसानी से फिट नहीं किए जा सकते. वहीं, जाट-मुस्लिम वैमनस्य की चिनगारी कितनी बची है, यह भी ध्यान देने वाली बात है.

शाह के यात्रा कार्यक्रम में मथुरा एक अहम हिस्सा था और यह भी उसी प्रयोग का एक हिस्सा है. यहां भाजपा कृष्ण जन्मभूमि मुद्दे को धीरे-धीरे उठा रही है और आपात परिस्थितियों के लिए इसे तैयार रखेगी. वैसे, एक स्थानीय संत राम दास ऐसी कवायद को खारिज करते हुए कहते हैं, ''मथुरा प्रेम और शांति का शहर है. यहां नफरत के लिए कोई जगह नहीं.'' सपा-रालोद गठबंधन की मुख्य चुनौती अपने कार्यकर्ताओं के बीच की नाराजगी को कम से कम करना है ताकि एक-दूसरे के उम्मीदवारों को सफलतापूर्वक वोट हस्तांतरित किए जा सकें.

कई सीटों के आवंटन पर मतभेद उभर आए हैं—मिसाल के तौर पर जाट बहुल मांट विधानसभा सीट पर रालोद के योगेश नौहवार को सपा के हरियाणा से आयातित संजय लाठर के लिए रास्ता छोड़ना पड़ा. इससे जमीनी स्तर पर बेचैनी बढ़ी है. मेरठ में सिवालखास में जाटों ने हंगामा कर दिया जब सपा ने अपने मुस्लिम उम्मीदवार को रालोद के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ाने के लिए उतारा. इससे रालोद के वरिष्ठ नेता राज कुमार सांगवान की संभावनाएं खत्म हो गईं. एकजुटता के प्रति जयंत की दृढ़ता और जमीनी स्तर पर सभी 'समन्वय समितियों' के बावजूद एक पुराने रुझान के फिर से उभरने का खतरा है: मुस्लिम जाट उम्मीदवारों को समर्थन दें, लेकिन जाट खेमा बदले में उन्हें समर्थन देने को उत्सुक न रहे, खासकर उन सीटों पर जहां भाजपा ने भी जाट उम्मीदवार उतारे हैं. यही वफादारी की अंदरूनी कशमकश है.

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