अपने मतदाताओं से जुड़ने की कोशिश के दौरान 30 जनवरी को कांग्रेस नेता हरीश रावत बिंदुखत्ता गांव के कबड्डी मैदान में उतर पड़े. इस 73 वर्षीय वरिष्ठ नेता ने कुछ मिनटों के दोस्ताना मैच में हाथ आजमाया और एक-दो अंक भी हासिल किए. हालांकि उनका असल खेल इतना आसान नहीं है. बिंदुखत्ता उत्तराखंड के नैनीताल जिले के तराई क्षेत्र में स्थित है और लालकुआं विधानसभा क्षेत्र में पड़ता है. और यह उनकी पसंद का चुनावी मैदान नहीं है. रावत को अपेक्षाकृत आसान सीट रामनगर से चुनाव लडऩा था, लेकिन वहां से वे बाहर कर दिए गए... क्या हम इसे पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र कहें? अब पूर्व मुख्यमंत्री रावत को सीधे दुश्मन के गढ़ में उतार दिया गया है और वे भाजपा के मोहन सिंह बिष्ट के खिलाफ खड़े हैं. कबड्डी के मैदान में किए थोड़े खतरनाक प्रयोग की तरह—14 फरवरी को मतदान के दिन उन्हें प्रेम मिलना मुश्किल हो सकता है.
कांग्रेस खेमे के भीतर भी आपसी प्रेम दिखना दुर्लभ चीज हो गया है. अगर उत्तराखंड की चुनावी राजनीति मोटे तौर पर दो-ध्रुवीय है, तो यह पुरानी पार्टी अपने आप में दो-ध्रुवीय संगठन बन गई है. राज्य के सबसे बड़े नेता होने के बावजूद हरीश रावत केवल एक धुरी बनाते हैं. दूसरी धुरी के नेता प्रीतम सिंह हैं जो उनसे करीब दस साल छोटे हैं. प्रीतम सिंह विपक्ष के नेता हैं और रावत के कट्टर विरोधी हैं.
वे राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं और हाल के वर्षों में उनका ग्राफ लगातार बढ़ा है. लेकिन उन्हें यह दिखाना अभी बाकी है कि वे अकेले दम पर पार्टी को चुनावी जीत तक ले जा सकते हैं. हाल ही में पंजाब का प्रभार छोड़ने के बाद रावत उत्तराखंड की राजनीति में वापस लौटे हैं. लेकिन उनके गृह राज्य में चीजें उनके हिसाब से नहीं चल रहीं. उम्मीदवारों के चयन में उन्हें खुली छूट नहीं मिली, तो वे नाराज हो गए, फिर भी उन्हें छोटी-सी छूट हासिल हुई—उन्हें पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं बल्कि केवल चुनावी अभियान का प्रमुख बनाया गया.
उनकी अपनी सीट के लिए जिद नहीं कर पाना दिखाता है कि रावत के लिए समीकरण किस तरह बदल गए हैं. उन्हें रामनगर से हटना पड़ा क्योंकि प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष रणजीत रावत ने वहां से दावा ठोक दिया था. रणजीत प्रीतम सिंह के खेमे के हैं. हालांकि रणजीत रावत को आखिरकार अल्मोड़ा जिले की साल्ट सीट से उम्मीदवार बनाया गया है, लेकिन तब तक हरीश रावत नरम पड़कर लालकुआं स्थानांतरित हो चुके थे. लेकिन उनकी परेशानी कम नहीं हुई है. लालकुआं में संध्या डालाकोटी की जगह हरीश रावत को टिकट दे दिया गया, लेकिन संध्या ने दावेदारी नहीं छोड़ी है और निर्दलीय के रूप में अपना नामांकन दाखिल कर दिया है.
माना जा रहा है कि उन्हें प्रीतम का समर्थन हासिल है. लालकुआं उन 29 सीटों में से एक है जहां बागी उम्मीदवार कांग्रेस की संभावनाओं को खत्म करने पर उतारू हैं. हरीश ने खुद को ''पार्टी का सच्चा सिपाही'' बताते हुए यह सब सहने का विकल्प चुना है. लेकिन उनके वफादारों का कहना है कि इससे मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखने वाले इस वरिष्ठ नेता की छवि को धक्का लगा है.
दिल्ली के कुछ कांग्रेसी नेताओं का मानना है कि भाजपा के लिए भारी सत्ता-विरोध रूझान से बच पाना काफी मुश्किल है. निवर्तमान 70-सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के पास केवल 11 सीटें हैं, लेकिन उसने 34 फीसद वोट हिस्सेदारी हासिल की थी. भाजपा को 47 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ 57 सीटें मिली थीं. उसको पाटा जा सकता है, लेकिन कांग्रेस के लिए चिंता की बात यह है कि क्या वह 14 फीसद मुस्लिम वोटों को एकमुश्त अपने पाले में कर पाएगी. दरअसल, इस बार मुस्लिम वोटों के कई दावेदार मैदान में हैं. बसपा, सपा और असदुद्दीन ओवैसी की एआइएमआइएम ने 18 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया है. इनमें से हरिद्वार (ग्रामीण) सीट भी शामिल है, जहां से हरीश रावत की बेटी अनुपमा चुनाव लड़ रही हैं. उधम सिंह नगर और नैनीताल तथा देहरादून के कुछ हिस्सों में थोड़ी-बहुत मौजूदगी के अलावा मुस्लिम आबादी मुख्य रूप से हरिद्वार जिले में बसी हुई है.
हरिद्वार जिले में बसपा का भी थोड़ा-बहुत प्रभाव है. 2017 में बसपा ने कुल वोटों का 7 फीसद हासिल कर लिया था. उसे ज्यादातर वोट हरिद्वार में ही मिले थे, हालांकि उसे एक भी सीट नसीब नहीं हुई थी. भाजपा ने शासन में कोई भी उत्साहजनक उपलब्धि हासिल नहीं की है, इसे बताने के अलावा बिखरी हुई कांग्रेस के पास है ही क्या?

