अरुण पुरी
जनमत लोकतंत्र की बुनियाद है क्योंकि लोगों की सहमति पर ही राज्यसत्ता का निर्माण होता है. मगर लोगों की राय भी हमेशा एक-सी नहीं रहती. लोगों की इच्छा से निर्वाचित नेता अपने जोखिम पर ही अपने तमगों के भरोसे बैठे रह सकते हैं. बुरे कर्मों का नतीजा कभी न कभी मिलता ही है. चतुर राजनेता मतदाताओं के बदलते जज्बात पर नजर रखते हैं, चाहे जिस भी साधन से वे रखते हों.
एहतियात और सख्ती से किए गए जनमत सर्वेक्षण ऐसा ही एक साधन हैं जिसका इस्तेमाल कई देश करते हैं और उसे गंभीरता से लेते हैं. इंडिया टुडे हमेशा मानता आया है कि ऐसे सर्वे लोगों के मिज़ाज की थाह लेने के लिए सबसे वैज्ञानिक और वस्तुपरक तरीका हैं. चुनाव में सीटों की संख्या की उनकी भविष्यवाणी भले हमेशा सही न निकले, लेकिन वे इतने अधिक लोगों की राय लेते हैं जितनों से कोई व्यक्ति बात करने की उम्मीद तक नहीं कर सकता.
हमने शख्सियतों और लोकप्रिय मुद्दों पर जनधारणा की थाह लेने के लिए इंडिया टुडे देश का मिज़ाज (एमओटीएन) सर्वे की शुरुआत 2003 में की थी. तब से साल में दो बार—गणतंत्र दिवस से पहले और स्वतंत्रता दिवस की पूर्वसंध्या पर—किया जाने वाला यह सर्वे भारतीय जनमत को मापने का भरोसेमंद पैमाना बन चुका है. एमओटीएन सर्वे अब जब अपने दूसरे दशक में प्रवेश कर रहा है, हमने इसकी पद्धति को परिष्कृत किया और सैंपल आकार को बढ़ाया है.
हम एक नई स्वतंत्र सर्वेक्षण एजेंसी सी-वोटर को भी साथ लाए हैं. हमारे जनवरी 2022 के एमटीओएन सर्वे में 60,141 लोगों से इंटरव्यू किया गया, जो हमारे सामान्य सैंपल आकार से पांच गुना से भी ज्यादा है. सी-वोटर 2019 से 1,200 सैंपल आकार के साथ दैनिक ट्रैकर भी चलाता आया है और साल 2000 से सर्वेक्षण का काम कर रहा है.
हमारा सर्वे दिलचस्प वक्त में आया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार अपना आधा कार्यकाल पूरा कर चुकी है. मध्यावधि आकलन सरकार की लोकप्रियता का प्रमुख पैमाना है, खासकर आज जैसे असाधारण वक्त में जब दो साल से ज्यादा अवधि में कोविड-19 महामारी की तीन लहरों ने अर्थव्यवस्था को तहस-नहस कर दिया, जिंदगियों को उलट-पुलट दिया और आजीविकाओं को बर्बाद कर दिया.
अत्यंत संक्रामक डेल्टा वैरिएंट से उत्पन्न जानलेवा दूसरी लहर ने पिछले साल 4,00,000 जिंदगियां लील लीं और हजारों अन्य लोगों को लंबे वक्त के स्वास्थ्य और वित्तीय नतीजों से जूझता छोड़ दिया. फिलहाल देश ओमिक्रॉन स्ट्रेन से उत्पन्न कोविड की तीसरी लहर की चपेट में है. इसे हल्का वैरिएंट माना जा रहा है, फिर भी इसने वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में शुरू हुई क्रमिक आर्थिक बहाली को ढक लिया, जब कारोबारी गतिविधियां कोविड से पहले के स्तर पर अभी आ ही रही थीं.
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआइई) के आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2021 में शहरी बेरोजगारी 9.3 फीसद और ग्रामीण बेरोजगारी 7.3 फीसद पर पहुंच गई, जो उससे पिछले महीने क्रमश: 8.2 और 6.4 फीसद थीं. सीएमआइई का अनुमान है कि नवंबर 2021 में साठ लाख वैतनिक नौकरियां चली गईं.
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक से नापी जाने वाली भारत की मानक मुद्रास्फीति दर दिसंबर 2021 में 5.6 फीसद थी, जो पांच महीनों का इसका सबसे ऊंचा स्तर था. इन आर्थिक दुश्वारियों को पूर्वी लद्दाख में चीन की सैन्य जमावट ने और बढ़ा दिया है, जिसने करीब दो साल से गतिरोध पैदा कर रखा है और कोई समाधान भी नजर नहीं आता.
पिछले एमओटीएन सर्वे की तरह इस बार भी उत्तरदाताओं की असल चिंता अर्थव्यवस्था की हालत को लेकर है. 48 फीसद लोग बेरोजगारी और कीमतों को अपने बड़ी चिंता बताते हैं. उन लोगों की तादाद, जो मानते हैं कि उनकी आर्थिक हैसियत में गिरावट आई है, 31.8 फीसद तक अधिक है, जो अगस्त 2021 के नतीजे के लगभग बराबर ही है, पर जनवरी 2021 के मुकाबले यह दोगुनी हो गई है.
इसका अर्थ है कि सरकार ने आर्थिक मुद्दों का पर्याप्त समाधान नहीं निकाला है. बदतर यह कि अन्य 42.7 फीसद लोग सोचते हैं कि सरकार की आर्थिक नीतियों ने केवल बड़े कारोबारों की मदद की है.
कितना भी विरोधीभासी क्यों न प्रतीत होता हो, पर लगता यही है कि प्रधानमंत्री और उनकी सरकार ने जनधारणा में अपनी जगह लगातार बनाए रखी है. अगर आज आम चुनाव हों, तो एमओटीएन का अनुमान है कि भाजपा सामान्य बहुमत (543 सदस्यीय लोकसभा में 272 सीट) से एक सीट पीछे रह जाएगी, लेकिन एनडीए के साथ 296 सीटें जीतेगी.
भाजपा और एनडीए की मौजूदा सीटों (303 और 352) में यह कमी महामारी की अभूतपूर्व चुनौतियों और संभवत: हर सरकार के सामने आने वाली मध्यावधि थकान के कारण हो सकती है. हालांकि 58.7 फीसद लोग सरकार के कुल कामकाज से बहुत संतुष्ट/संतुष्ट महसूस करते हैं.
फिर आश्चर्य क्या कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निजी लोकप्रियता बढ़ रही है. पिछले अगस्त में अब तक के एमटीओएन सर्वेक्षणों में सबसे कम 54 फीसद से छलांग लगाकर यह 62 फीसद पर पहुंच गई है, हालांकि अगस्त, 2020 के 78 फीसद से यह अब भी कम है. प्रधानमंत्री पद के सबसे अच्छे विकल्प के रूप में मोदी ने अपने निकटतम राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी राहुल गांधी से अंतर बढ़ा लिया है—6.8 फीसद के मुकाबले 52.5 फीसद.
दरअसल, उन्हें भारत के अब तक के प्रधानमंत्रियों में सबसे अच्छा आंका जाता है, जो काफी अंतर से दूसरे पायदान पर आए अपने दिवंगत मार्गदर्शक ए.बी. वाजपेयी से भी बहुत ऊपर हैं. करीब 53 फीसद उत्तरदाताओं ने सरकार को कठघरे में खड़ा करने की विपक्षी दलों की कोशिशों को खारिज कर दिया.
ताजातरीन एमओटीएन सर्वे से साफ है कि अपनी तमाम चिंताओं के बावजूद लोग इन परेशानियों से निकालकर ले जाने के लिए मोदी पर ही भरोसा करते हैं. अपने कद से कहीं बड़ी शख्सियत के तौर पर उनमें लोगों का विश्वास 2014 में उनके चुनाव के समय से ही हमारे सर्वेक्षणों में लगातार व्यक्त हुआ है, फिर देश चाहे जिन भी चुनौतियों से घिरा हो. इसीलिए इस सप्ताह हमारे आवरण की सुर्खी है, 'भरोसा बढ़ा... लेकिन’.
हमारे मौजूदा सर्वे का बड़ा निष्कर्ष यह है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में जन विश्वास और उनकी राजनैतिक पूंजी बरकरार है, वहीं उन्हें आर्थिक मोर्चे पर काम करने और लोगों की उनसे लगाई जा रही ऊंची उम्मीदों को पूरा करने की जरूरत है.
25 अगस्त, 2021 का आवरण

