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काशी विश्वनाथः आस्था का गलियारा

आठ सौ करोड़ रु. की लागत से बने काशी विश्वनाथ मंदिर के नए गलियारे का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों लोकार्पित हो रहा. तीर्थयात्रियों के लिए यह बनेगा वरदान.

धार्मिक पुनरुत्थान काशी विश्वनाथ मंदिर के गलियारे के निर्माण का दृश्य (बाएं और ऊपर)
धार्मिक पुनरुत्थान काशी विश्वनाथ मंदिर के गलियारे के निर्माण का दृश्य (बाएं और ऊपर)
अपडेटेड 23 दिसंबर , 2021

लखनऊ के राजाजीपुरम इलाके में रहने वाले बैंककर्मी मयंक अग्रवाल के बुजुर्ग माता-पिता ने 13 फरवरी, 2018 को शिवरात्रि के मौके पर वाराणसी में काशी विश्वनाथ मंदिर में पूजा करने की इच्छा जाहिर की थी. मयंक उन्हें लेकर एक दिन पहले ही वाराणसी पहुंच गए. अगले दिन तड़के छह बजे वे सभी मंदिर की तरफ निकल पड़े. महाशिवरात्रि के कारण मंदिर की ओर जाने वाले सभी रास्ते श्रद्धालुओं से भरे हुए थे.

उधर की गलियों में तो पैर रखने की भी जगह न थी. मयंक बताते हैं, ''70 से ऊपर की वय के मम्मी-पापा के लिए भीड़ में लंबे समय तक खड़े रह पाना संभव न था. शौचालय और दूसरी सुविधाएं न होने से भी दिक्कतें थीं. कुछ देर श्रद्धालुओं की भीड़ में खड़े होने के बाद मम्मी-पापा को लेकर मैं मैदागिन चौक आ गया. यहां पर लगी एलईडी स्क्रीन पर ही बाबा विश्वनाथ के दर्शन किए.’’

मयंक जैसी पीड़ा उन लाखों श्रद्धालुओं की है जो किसी भी प्रकार की नागरिक सुविधाओं के बगैर तंग गलियों में जमा भारी भीड़ में काशी विश्वनाथ मंदिर का दर्शन करने का हौसला नहीं दिखा पाते. ऐसे श्रद्धालु भी अब पूरी गरिमा के साथ आराम से दर्शन कर सकेंगे. वे सीधे गंगा से जल लाकर बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक भी कर सकेंगे. वाराणसी में गंगा नदी से काशी विश्वनाथ मंदिर को एक कॉरिडोर से जोड़ने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना पूरा हुआ है.

अब मंदिर के आसपास तंग गलियों की जगह बेहद चौड़े गलियारे ने ले ली है. पहले 3,000 वर्ग फुट में फैला काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर अब कॉरिडोर बनने के बाद से पांच लाख वर्ग फुट क्षेत्रफल वाला हो गया है. सड़क मार्ग पर उमड़ने वाली भीड़ से बचने के लिए अब श्रद्धालु गंगा नदी के रास्ते भी कॉरिडोर में प्रवेश कर सकेंगे. दर्शन करने के लिए रैंप और एस्कैलेटर की सुविधा वाले कॉरिडोर में श्रद्धालुओं को एक भी सीढ़ी नहीं चढ़नी पड़ेगी.

मयंक भी इस कॉरिडोर के निर्माण को लेकर उत्साहित हैं. वे कहते हैं ''अगले मार्च में 1 तारीख को पड़ने वाली महाशिवरात्रि पर मम्मी-पापा को दर्शन कराने ले जाऊंगा. चार साल पहले अधूरी रह गई इच्छा अगली महाशिवरात्रि में पूरी होगी.’’ 

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रत्याशी के तौर पर वाराणसी संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे मोदी ने काशी विश्वनाथ मंदिर को मुद्दा बनाया था और चुनाव जीतने के फौरन बाद 17 मई, 2014 को वाराणसी पहुंचकर मंदिर में पूजा की थी. इसके बाद उन्होंने इस मंदिर का विकास गुजरात के सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर कराने का संकल्प लिया था. मोदी के संकल्प को गति 2017 में मिली जब यूपी में भाजपा की सरकार बनी और योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने.

4 अप्रैल, 2017 को वाराणसी से जुड़ी विकास योजनाओं की समीक्षा करने के दौरान ही योगी ने अधिकारियों को काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण की दिशा में प्रयास करने का निर्देश दिया था. निर्माण के लिए जमीन का प्रबंध और अन्य सुविधाओं के निर्माण में तेजी लाने के लिए योगी कैबिनेट ने ''श्री काशी विश्वनाथ विशिष्ट क्षेत्र विकास परिषद’’ के गठन को मंजूरी दी. सरकार ने मंदिर परिसर के विस्तार के लिए जमीन का इंतजाम करना शुरू किया.

60 फीसद जमीन का इंतजाम होते ही 2019 के लोकसभा चुनाव की घोषणा से कुछ दिन पहले 8 मार्च को मोदी ने कॉरिडोर का शिलान्यास किया. अब 33 महीने बाद काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का 13 दिसंबर को उद्घाटन करके मोदी उत्तर प्रदेश में 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को इसका भरपूर फायदा दिलाने की कोशिश करेंगे. काशी हिंदू विश्वविद्यालय में समाज विज्ञान और राजनीति शास्त्र विभाग के डीन प्रोफेसर कौशल किशोर मिश्र बताते हैं, ''काशी विश्वनाथ मंदिर में देश ही नहीं, विदेश से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं.

लोगों ने कभी कल्पना नहीं की होगी कि बेहद तंग गलियों के बीच बसा काशी विश्वनाथ मंदिर एक भव्य कॉरिडोर का रूप ले सकेगा. यूपी विधानसभा चुनाव से ठीक पहले इसका उद्घाटन करके मोदी विकास का एजेंडा सेट करेंगे. यही नहीं, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण शुरू होने और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का निर्माण पूरा होने का जिक्र करके भाजपा भी आक्रामक ढंग से हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़़ाएगी.’’

करीब 3,000 वर्ग फुट में फैले मंदिर परिसर को पांच लाख वर्ग फुट क्षेत्रफल वाले कॉरिडोर में तब्दील करना आसान काम न था. मुख्यमंत्री योगी के निर्देश पर अधिकारियों ने मंदिर के आसपास 314 भवनों को चिन्हित किया था जो प्रस्तावित कॉरिडोर की जद में आ रहे थे. मार्च, 2018 में वाराणसी मंडल के कमिशनर की जिम्मेदारी संभालने वाले दीपक अग्रवाल ने सभी 314 भवनों को प्रोजेक्ट में शामिल करने में अहम भूमिका निभाई.

श्री काशी विश्वनाथ विशिष्ट क्षेत्र विकास परिषद के चेयरमैन के तौर पर अग्रवाल के सामने दो विकल्प थे. परिसर के आसपास मौजूद 314 भवनों का अधिग्रहण या आपसी समझौते के माध्यम से इन्हें कॉरिडोर में शामिल किया जाए. योगी के निर्देश पर तय हुआ कि सभी संपत्तियों को आपसी समझौते से खरीदा जाए. अग्रवाल बताते हैं, ''स्वामित्व के आधार पर 314 संपत्तिजयां मुख्य रूप से तीन तरह की थीं.

पहली, निजी स्वामित्व वाली संपत्ति में हर संपत्ति के एक से ज्यादा स्वामी थे. दूसरी ट्रस्ट संपत्ति और तीसरी वे संपत्तियां थीं जिनका केवल कस्टोडियन ही मौजूद था. इसमें 'कस्टोडियन राइट्स’ हस्तांतरित कराने पड़े.’’ निजी संपत्ति को आपसी समझौते के आधार पर खरीदा गया. संपत्ति का मूल्य भूअधिग्रहण अधिनियम के अनुसार निर्धारित बाजार मूल्य का दोगुना दिया गया.

मार्च, 2019 तक सारी संपत्तियां खरीद लीं गईं. समस्या इन संपत्तियों को खाली कराने की थी क्योंकि 100 से ज्यादा संपत्तियां ऐसी थीं जिसमें उनके मालिक और रहने वाले अलग-अलग थे. ये किराएदार या अतिक्रमणकारी के रूप में थे. अग्रवाल बताते हैं, ''ऐसे लोग जिनके पास संपत्ति से जुड़ा कोई भी कानूनी दस्तावेज नहीं था पर वे उसका उपयोग व्यवसाय के लिए कर रहे थे. इनसे आपसी समझौते के जरिए 'वन टाइम सेटलमेंट’ किया गया.

एक से 10 लाख रुपए प्रति यूनिट ''रिहैबिलिटेशन ग्रांट’’ के रूप में दिए गए. इस ग्रांट में व्यक्ति की सामाजिक स्थिति का भी ध्यान रखा गया. विधवा, एससी-एसटी वर्ग से जुड़े लोगों को निर्धारित से अधिक धन दिया गया. मसलन, वे 37 परिवार जिनकी जीविका मणिकर्णिका घाट पर होने वाले अंतिम संस्कार से जुड़ी थी, उन्हें करीब 50 फीसद तक अधिक राशि दी गई. ये सभी परिवार अब मणिकर्णिका घाट के आसपास ही किराए पर मकान लेकर रहते हैं. इस व्यवस्था के चलते यहां खरीदी गई जमीनों से जुड़ा एक भी मामला किसी भी अदालत में लंबित नहीं है.

कॉरिडोर के लिए जमीन का इंतजाम करने में सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल देखने को मिली. कॉरिडोर के विस्तार में ज्ञानवापी मस्जिद के सामने मौजूद 1,700 वर्ग फुट जमीन आड़े आ रही थी. 1993 में यह जमीन सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने स्थानीय प्रशासन को दी थी जिस पर पुलिस कंट्रोल रूम बना था. साल भर तक कई वार्ताओं के बाद जुलाई में मंदिर प्रशासन और सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के बीच जमीन की परस्पर अदला-बदली पर सहमति बनी.

जमीन की कीमत के आधार पर हुई अदला-बदली में कॉरिडोर को 1,700 वर्ग फुट जमीन मिली. बदले में मंदिर प्रशासन ने 200 मीटर दूर बांसफाटक इलाके में 1,000 वर्ग फुट जमीन अंजुमन इंतजामिया मसाजिद (ज्ञानवापी मस्जिद का संचालन करने वाली संस्था) को दी. मसाजिद के संयुक्त सचिव एस.एम. यासीन बताते हैं, ''सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की संपति के बदले में अंजुमन को 1,000 वर्ग फुट जमीन मिली है. आर्टिकल-31 में निहित एक्सचेंज ऑफ प्रॉपर्टी के तहत संपत्तियों का हस्तांतरण हुआ है.’’

जमीन का इंतजाम होने के बाद 2019 में भवनों को ढहाने का काम शुरू हुआ. तंग गलियों में होने की वजह से सबसे पहले इन्हें मैनुअली ढहाया गया. इस दौरान 61 प्राचीन मंदिर और देवी-देवताओं की मूर्तियां भी निकलीं. अग्रवाल बताते हैं, ''कॉरिडोर का डिजाइन तैयार करते वक्त सोचा गया था कि मंदिर के आसपास का पूरा परिसर एक समतल मैदान के रूप में मिल जाएगा.

ढहाने पर निकले मंदिरों को भी कॉरिडोर का हिस्सा बनाने के लिए डिजाइन में बदलाव किया गया. वैदिक सेंटर, मुमुक्षु भवन समेत कई भवनों को रीलोकेट किया गया.’’ वहीं निकले 27 बड़े मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया जा रहा है. परिसर में एक देव गैलरी भी बनाई जा रही है, जहां निकले मंदिरों के अवशेष और देवी-देवताओं की मूर्तियों को श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए रखा जाएगा.

कॉरिडोर के लिए मंदिरों के आसपास भवनों को तोड़ने पर सवाल भी खड़े हो रहे हैं. इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी (आइआइटी), बीएचयू के प्रोफेसर और वाराणसी के प्रसिद्ध संकट मोचन मंदिर के महंत विश्वंभर नाथ मिश्र कहते हैं, ''कॉरिडोर के लिए काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास के मंदिरों को तोड़ने से पूरे इलाके का ईकोसिस्टम बदल गया है. आने वाले दिनों में इसके कुप्रभाव देखने को मिलेंगे.’’

उनके आरोपों का खंडन करते हुए, योगी सरकार में वाराणसी जिले के प्रभारी मंत्री आशुतोष टंडन कहते हैं, ''मंदिर के आसपास के भवनों से जिस संख्या में मंदिर निकले हैं उससे साबित होता है कि प्राचीन काल में बाबा विश्वनाथ मंदिर परिसर में कई मंदिर थे जिन पर बाद में अतिक्रमण करके भवन बना दिए गए. कॉरिडोर से इन्हें फिर संरक्षित किया गया है.’’

इस आयोजन से पूर्व माता अन्नपूर्णा की प्रतिमा मंदिर परिसर में स्थापित की गई. स्थापना से पहले निकाली गई इसकी धर्मयात्रा के जरिए भाजपा ने सांस्कृतिक एजेंडे को धार देना शुरू कर दिया है. 18वीं सदी की यह प्रतिमा 1913 में काशी से चोरी कर कनाडा ले जाई गई थी. यह वहां के रेजिना विश्वविद्यालय में रखी थी. मोदी को इसकी जानकारी मिलने के बाद इसे भारत लाने के प्रयास शुरू हुए.

कनाडा से यह मूर्ति मिलने के बाद 11 नवंबर को गोपाष्टमी पर दिल्ली से शोभायात्रा के जरिए गाजियाबाद, अलीगढ़, कानपुर, लखनऊ, अयोध्या होते हुए इसे वाराणसी लाया गया. 15 नवंबर को देवोत्थानी एकादशी पर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने इसे काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में स्थापित किया. के.के. मिश्र बताते हैं, ''एक दर्जन शहरों में निकली शोभायात्रा से साफ है कि अगले विधानसभा चुनाव में विपक्षी दलों के मुद्दों के जवाब में भाजपा आक्रामक हिंदुत्व का सहारा लेगी.’’

काशी विश्वनाथ कोरिडोर के लोकार्पण को भव्य बनाने और देश भर में संदेश पहुंचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्ययमंत्री और उपमुख्यमंत्री को परिवार समेत आने का न्योता भेजा है. कोरिडोर के लोकार्पण के बाद इन नेताओं को परिवार समेत अयोध्या में राम मदिर का भी दर्शन कराया जाएगा.

क्षेत्रीय भाजपा अध्यक्ष महेशचंद्र श्रीवास्तव बताते हैं, ''काशी विश्वनाथ के प्रसाद को गांव-गांव तक पहुंचाया जाएगा. इसके लिए भाजपा पदाधिकारियों को जिम्मा सौंपा गया है कि वे ब्लॉकवार ग्रामीणों को काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन कराएं.’’

भाजपा की रणनीति पर सवाल खड़े करते हुए समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और अखिलेश यादव सरकार में पर्यटन मंत्री रहे ओमप्रकाश सिंह कहते हैं, ''काशी विश्वनाथ कॉरिडोर प्रोजेक्ट सपा सरकार में शुरू किया गया था.

इसके लिए पांच भवनों की खरीद भी की गई थी. जनता भाजपा की नीयत पहचान चुकी है. इसके निर्माण से इन्हें कोई फायदा नहीं होने वाला.’’ यह कॉरिडोर भाजपा की सियासी हसरतों का भी कॉरिडोर साबित होगा कि नहीं, यह अगले विधानसभा चुनाव के नतीजे बताएंगे.

तीन हजार वर्ग फुट वाला मंदिर परिसर अब पांच लाख वर्ग फुट वाले कॉरिडोर से जुड़ रहा है जो इसे सीधे गंगा से जोड़ेगा

भाजपा को उम्मीद है कि मंदिर परिसर के इस पुनर्विकास से पार्टी को प्रदेश में 2022 में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में खासा सियासी फायदा होगा

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