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कांग्रेसः सबसे पुरानी पार्टी के नए तेवर

ब्लॉक, जिला, पीसीसी, एआइसीसी—हर स्तर पर चुनाव के जरिए पार्टी अपने संगठन के कायापलट की उम्मीद कर रही है

विचार मंथन 15 अक्तूबर को सीडब्ल्यूसी बैठक
विचार मंथन 15 अक्तूबर को सीडब्ल्यूसी बैठक
अपडेटेड 8 नवंबर , 2021

अक्तूबर महीने की 16 तारीख को कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक के दौरान महासचिव (संगठन) के.सी. वेणुगोपाल ने पार्टी संगठन के लिए अरसे से लंबित चुनाव का कार्यक्रम जारी किया. कार्यक्रम काफी देर से जारी हुआ है. दरअसल, पार्टी ने इस साल 30 जून तक पार्टी का नियमित अध्यक्ष चुनने के लिए एक रोडमैप को अंतिम रूप दिया था. हालांकि, कोविड-19 की दूसरी लहर ने उस संभावना को खत्म कर दिया और सीडब्ल्यूसी ने 10 मई की बैठक में समयसीमा को अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया था. यह प्रक्रिया अब 1 नवंबर को संगठनात्मक चुनाव के लिए सदस्यों के नामांकन के साथ शुरू होगी और सितंबर, 2022 में राष्ट्रीय अध्यक्ष और सीडब्ल्यूसी के सदस्यों के चुनाव के साथ समाप्त होगी. योजना के अनुसार, इसे क्रियान्वित किया जाता है तो यह कवायद पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को नाटकीय रूप से बदल सकती है.

उद्घाटन भाषण में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसकी एक झलक पेश की कि पार्टी आलाकमान, विशेष रूप से गांधी परिवार, पार्टी के भविष्य की कैसी कल्पना करता है. उन्होंने पार्टी के युवा सदस्यों की सराहना करते हुए परोक्ष रूप से दिग्गजों को संदेश दिया कि यह नई पीढ़ी के लिए मार्ग प्रशस्त करने का समय है. सोनिया गांधी ने कहा, ''पिछले दो वर्षों में, बड़ी संख्या में हमारे सहयोगियों, विशेष रूप से युवा लोगों ने पार्टी की नीतियों और कार्यक्रमों को लोगों तक ले जाने में नेतृत्व की भूमिका निभाई है—चाहे किसान आंदोलन हो, महामारी के दौरान राहत प्रदान करना हो, युवाओं, महिलाओं से संबंधित मुद्दों को उठाना हो, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो, मूल्यवृद्धि हो या सार्वजनिक क्षेत्र का विनाश हो.''

उनका संबोधन लोकसभा चुनाव में लगातार हार के बाद 2019 में अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद से राहुल गांधी जो कह रहे हैं, उसके अनुरूप था. राहुल ने कहा था कि वे भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ लड़ाई में अकेले थे जबकि कई दिग्गज अपने बच्चों को आगे बढ़ाने में व्यस्त थे. तब से, उन्होंने जमीन पर काम करने और सीधे मोदी पर हमला करने का साहस दिखाने वाले नेताओं को बढ़ावा दिया है. उनके एक करीबी सहयोगी कहते हैं, ''के.सी. वेणुगोपाल या मणिक्कम टैगोर, राहुल की योजना में फिट बैठते हैं. वे ऐसे नेता चाहते हैं, जो चमक-दमक और सत्ता व पद की दौड़ से अलग रहे और जिनमें उनकी दृष्टि के अनुसार कांग्रेस के निर्माण की दिशा में छोटे और नियमित कदमों से चलने का धैर्य हो.''

शायद यही कारण है कि जितिन प्रसाद, ज्योतिरादित्य सिंधिया या सुष्मिता देव जैसे करीबी विश्वासपात्र माने जाने वाले नेताओं के हालिया रवैये से राहुल परेशान नहीं हैं. उनके करीबियों का मानना है कि मोदी का जादू देर-सबेर खत्म हो जाएगा और लोग कांग्रेस की ''समावेशी'' राजनीति को फिर से अपना लेंगे. राहुल के नजदीकी एक लोकसभा सदस्य कहते हैं, ''ज्यादातर टिप्पणीकार उन दिग्गजों से परे देखने से इनकार करते हैं, जो या तो राज्यसभा सांसद हैं या अतीत में काफी सफल रहे हैं या सचिन पायलट जैसे मीडिया के जानकार युवा हैं. लेकिन कांग्रेस में अब भी ऐसी प्रतिभा है, जो चमक-दमक से दूर जमीन पर काम कर रही है. वे ईंट दर ईंट पार्टी निर्माण कर रहे हैं. राजस्थान के जितेंद्र सिंह इसका उदाहरण हैं.''

कैप्टन अमरिंदर सिंह को पंजाब के मुख्यमंत्री पद से हटाने से लेकर विभिन्न राज्य इकाइयों में अपने पसंदीदा लोगों को अध्यक्ष के रूप में नियुक्त करने तक राहुल गांधी अपने अधिकार के प्रति लगातार मुखर और दृढ़ रहे हैं. सीडब्ल्यूसी के एक सदस्य का कहना है कि ''उनका मानना था कि जी-23 बागियों के पीछे अमरिंदर का हाथ था. इसलिए उनसे प्रतिशोध लिया गया. नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त करना कैप्टन के लिए सजा थी, सिद्धू के लिए इनाम नहीं.'' जी-23 वरिष्ठ नेताओं का समूह है जिसमें गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी, शशि थरूर और भूपिंदर सिंह हुड्डा शामिल हैं, जिन्होंने अगस्त, 2020 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र लिखकर पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में आमूल चूल परिवर्तन की मांग की थी.

भले ही अब यह समूह मुट्ठी भर लोगों तक सीमित रह गया है, क्योंकि ज्यादातर हस्ताक्षरकर्ताओं ने इस कोर ग्रुप से खुद को अलग कर लिया है, जी-23 पार्टी के संगठनात्मक चुनावों की घोषणा के बाद काफी उत्साहित था. वास्तव में, यह सीडब्ल्यूसी के सदस्यों का ही चुनाव था, जिसको लेकर जी-23 के नेता अधिक चिंतित थे. वे सभी गांधी परिवार के समर्थन को लेकर एकमत थे, लेकिन सामूहिक नेतृत्व की उनकी मांग का व्यापक महत्व था. उनमें से कई इस बात से नाराज थे कि जिस तरह से कांग्रेस आलाकमान, खासकर राहुल गांधी, उन्हें केंद्रीय निर्णय लेने की प्रक्रिया से अलग कर रहे थे, जो उनके मुताबिक, राहुल की सनक पर आधारित था.

साथ ही यह भी स्वीकार किया गया कि गांधी परिवार के बिना पार्टी टूट सकती है. इसलिए जब उन्होंने सर्वसम्मति से राहुल के पार्टी की कमान संभालने का समर्थन किया, तो वे एक निर्वाचित सीडब्ल्यूसी चाहते थे.

मतदान कार्यक्रम के अनुसार, हर स्तर पर चुनाव होंगे—ब्लॉक, जिला, राज्य कांग्रेस कमेटी और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआइसीसी). इसलिए ये नए सदस्य ब्लॉक, जिलों, राज्यों और राष्ट्रीय स्तर पर नए अध्यक्षों का चुनाव भी करेंगे. ये नए चेहरे नए पार्टी अध्यक्ष और सीडब्ल्यूसी सदस्यों के चुनाव में अहम भूमिका निभाएंगे.

हालांकि यह कांग्रेस को परेशान करने वाली कई समस्याओं को सुधारने की दिशा में पहला कदम हो सकता है-कमजोर संगठनात्मक संरचना, जमीनी स्तर से ऊपर तक खराब या अदृश्य नेतृत्व और निर्णय लेने में जड़ता के कारण पुनरुत्थान का मार्ग उतना आसान नहीं हो सकता, जितना कागज पर दिखाई देता है. कांग्रेस के संगठनात्मक चुनावों में पैसे और बाहुबल वाले नेताओं की ओर से धांधली की आशंका होती है.

राहुल ने नए खून और योग्यता को बढ़ावा देने के लिए युवा कांग्रेस के चुनाव की शुरुआत की थी. लेकिन ऐसे कई उदाहरण थे, जब पैसे वाले उम्मीदवारों ने अनुचित प्रभाव डाला. संगठनात्मक चुनाव के समग्र परिणाम चाहे जो भी हों, लेकिन एक परिणाम लगभग निश्चित है—राहुल की पार्टी अध्यक्ष के रूप में वापसी. सीडब्ल्यूसी के सदस्य इस मांग पर एकमत थे कि राहुल एक बार फिर पार्टी की कमान संभालें. इसका मतलब यह है कि इस पद के लिए चुनाव की स्थिति में गांधी परिवार से इतर कोई नेता उम्मीदवारी की पेशकश नहीं करेगा.

बैठक ने बागियों को कड़ा संदेश भी दिया है. पार्टी का मौजूदा संकट पूर्णकालिक निर्वाचित अध्यक्ष की कमी से उपजा है, इसे खारिज करते हुए, सोनिया ने कहा कि वे (अंतरिम के बजाए) पूर्णकालिक, व्यावहारिक कांग्रेस अध्यक्ष हैं और उनसे मीडिया के जरिए बात करने की जरूरत नहीं थी, जैसा कि जी-23 के कुछ नेता पारंपरिक और सोशल मीडिया में कहते रहे हैं. जी-23 के एक नेता ने कहा, ''हमें इसकी चिंता नहीं है कि वे हमसे परेशान हैं. हमारी मांगें मान ली जाती हैं, जैसा कि सीडब्ल्यूसी में वादा किया गया था, तो किसी को शोर मचाने की जरूरत नहीं पड़ेगी.''

युद्ध की रेखाएं स्पष्ट रूप से खिंच गई हैं. राहुल संगठनात्मक चुनावों को दिग्गजों के प्रभाव से मुक्त करने में सफल हो जाते हैं, तो हर राज्य में हर स्तर पर एक नए रूप में कांग्रेस टीम हो सकती है. लेकिन जैसा कि इतिहास से पता चलता है, कांग्रेस के दिग्गजों को पछाड़ना और उसके मौजूदा हालात को बदलना आसान नहीं है, हालांकि यह असंभव भी नहीं है. दक्षिण के एक युवा लोकसभा सांसद कहते हैं, ''खेल, गांधी परिवार को चुनौती देने या उसका विकल्प तलाशने के बारे में नहीं है, यह गांधी परिवार की ताकत के दायरे को परिभाषित करने के बारे में है. ये दिग्गज निर्णय लेने की प्रक्रिया में अपनी बात रखने और अपने चुनावी या संगठनात्मक पदों की रक्षा करने की मांग कर रहे हैं, जिसमें राज्यसभा सदस्यता जैसे कुछ प्रतिष्ठित संवैधानिक पद शामिल हैं.''

बहरहाल, यह तो संगठन चुनाव के नतीजों से तय होगा कि क्या पार्टी अपने उद्देश्य को प्राप्त कर सकती है या नहीं. राहुल को या तो मोदी के खिलाफ 2024 का लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए पसंद की टीम मिलेगी या कुछ चुने हुए सीडब्ल्यूसी सदस्यों की निरंतर निगरानी के तहत पार्टी के संचालन में तालमेल और शांति बनाए रखनी होगी. इससे भी बड़ी चुनौती पार्टी में यथास्थिति बनाए रखने की होगी, ताकि आगे और अलगाव या किसी विभाजन को रोका जा सके.

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