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लोग और लोकाचारः लौट रहा परिवार का युग

बहुत-से परिवारों ने मिलकर कोविड का सामना किया और एकजुट बने रहे. इस प्रक्रिया में परिवार का ताना-बाना फिर से होने लगा मजबूत

बढ़ती नजदीकियां अपने और अपने भाई के परिवार के साथ राजीव मारदा (पीले कुर्ते में)
बढ़ती नजदीकियां अपने और अपने भाई के परिवार के साथ राजीव मारदा (पीले कुर्ते में)
अपडेटेड 5 सितंबर , 2021

सोनाली आचार्जी और अदिति पै

सैन होजे से सेंट पीटर्सबर्ग तक और पुणे से मुंबई तक, मई में प्रशांत देवरुखकर का 60वां जन्मदिन ज़ूम पर मनाने के लिए 55 रिश्तेदार इकट्ठा हुए. पूर्व बैंकर को सरप्राइज बर्थडे गिफ्ट के रूप में जो चीज मिली, वह एक वीडियो था जिसमें उस विस्तृत परिवार ने पिछले कई दशकों की उनसे जुड़ी यादें साझा कीं. दिल को छू लेने वाले वीडियो में 90 साल की चाची थीं तो पांच साल की उम्र वाली भांजी और भतीजे भी थे. इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि स्क्रीन पर हंसी-मजाक करने वाले परिजन एक दूसरे से कई हजार किलोमीटर दूर बैठे थे. देवरुखकर की पत्नी वैशाली कहती हैं, ''उस वर्चुअल सेलीब्रेशन ने हमें दूरी और समय के फासले को पाटने में मदद की क्योंकि बिना अपने प्रियजनों के जश्न कैसा? उनका होना तो जरूरी है.'' पहले, पूरे परिवार को मुंबई में एक साथ लाना तार्किक रूप से अकल्पनीय होता. लेकिन कोविड ने उन्हें ऐसे तरीके भी सिखाए जिससे दूर रहकर भी लोग एक-दूसरे के साथ जुड़े रह सकते हैं और महत्वपूर्ण पलों को साझा किया जा सकता है.

अक्सर मुश्किल वक्त में रिश्तों का इम्तिहान होता है और कभी-कभी वे हमेशा के लिए बदल जाते हैं. यह बात पिछले एक साल में बहुत-से लोगों के लिए सही साबित हुई है. लगभग डेढ़ साल से पूरे देश को परेशान कर रही महामारी ने लोगों के आपसी रिश्तों को अप्रत्याशित तरीकों से प्रभावित किया है. दुनिया के अलग-अलग कोनों में बैठे रिश्तेदार और दोस्त जन्मदिन को यादगार बनाने के लिए एक साथ आए हैं. युगलों ने अपने मतभेदों को दफन कर दिया है, हमेशा लडऩे-झगड़ने वाले परिवारों में शांति आई है, व्यवसायियों ने दिवंगत प्रतिद्वंद्वियों की प्रशंसा की है और पेशेवर मजबूरियों से बिखरे परिवार फिर से एक जगह पर जुटे हैं.

2021 में इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी (आइपीएस) की ओर से 1,870 व्यक्तियों से अंग्रेजी और 11 भारतीय भाषाओं में ली गई प्रतिक्रियाओं के अध्ययन से पता चला कि लॉकडाउन का भारत में प्यार और डेटिंग सहित सभी रिश्तों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा. लगभग आधे उत्तरदाताओं (47.4 प्रतिशत) ने महामारी की शुरुआत के बाद अपने जीवनसाथी या परिवार के साथ अपने संबंधों में उल्लेखनीय सुधार की जानकारी दी. मनोवैज्ञानिक पहले ही इसके कारणों का अध्ययन कर चुके हैं.

राइट एलएम और बेल जेएम के 2009 के शोधपत्र में कहा गया था कि 'गंभीर बीमारी और जीवन की चुनौतियां परिवार की इकाई को प्रभावित करती हैं, और पारस्परिक रूप से इस मुश्किल समय के दौरान पारिवारिक इकाई की कार्यप्रणाली (उनकी संरचना, विकास और कार्य सहित) परिवार के प्रत्येक सदस्य के स्वास्थ्य और कल्याण को प्रभावित करती है.' 28 वर्षीय व्यवसायी सान्या गोयल (देखें, केस स्टडी) के साथ भी ऐसा ही देखा गया. शादी करके वे संयुक्त परिवार में आई ही थीं कि ससुराल का परिवार कोविड-ग्रस्त हो गया. उन्होंने पूरे परिवार की देखभाल की. सान्या कहती हैं, ''मैंने महसूस किया कि मुश्किल वक्त में परिवार का होना कितना जरूरी हो जाता है. भले ही आपके बीच मतभेद हों, फिर भी आपके पास परिवार है तो आप अकेले नहीं हैं. उनके साथ खेल खेलने, मूवी देखने या बस बैठकर बात करने के लिए हमेशा कोई न कोई होता है.''

जैसा कि प्रख्यात लेखक और मनोविश्लेषक सुधीर कक्कड़ बताते हैं, ''हम इनसान इस धरती पर देखभाल करने वाले परिवार के वयस्क सदस्यों, विशेष रूप से मां, जो हमारे जीवित रहने के लिए आवश्यक है, पर पूरी तरह से निर्भर प्राणियों के रूप में आते हैं. अगर परिवार भोजन, स्नेह और गर्मजोशी का एक सुसंगत और विश्वसनीय स्रोत है, तो बच्चा बुनियादी विश्वास विकसित करता है और इस दुनिया को एक सौम्य और बेहतर जगह की तरह लेता है.'' दिल्ली के मानव व्यवहार और संबद्ध विज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. निमेश देसाई कहते हैं, ''हमारे अपने शोध में पाया गया है कि महामारी के दौरान परिवार और दोस्तों का समर्थन मिले तो आपदा का मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत कम होता है. भारत में संयुक्त परिवार की सोच कभी भी व्यावहारिक रूप से खत्म नहीं हुई थी, इसकी जड़ें कभी पूरी तरह से नहीं कटी थीं. लेकिन भावनात्मक रूप से तेज रफ्तार वाली जिंदगी, एक दूसरे के साथ भौतिक रूप से दूरी और काम के भारी बोझ के कारण जुड़ाव पहले जैसा नहीं रहा है. कोविड ने लोगों के बीच आपसी भावनात्मक संबंधों को फिर से बुना है.''

जैसा कि दिल्ली के व्यवसायी राजीव मारदा कहते हैं, ''इसने हमें जीवन और हमारे परिवार का सही मूल्य सिखाया है. हमारे बीच रिश्ते और भी गहरे हुए हैं.'' चार शहरों में फैले 70 से अधिक सदस्यों का उनका परिवार जो पहले केवल होली और दीवाली पर ही साथ आता था, महामारी के दौरान हर हफ्ते जूम कॉल पर जुड़ता था और आभासी तौर पर ही सही, सब एक साथ मौज-मस्ती करते थे.

वास्तव में, पारिवारिक संबंधों का पुनर्निर्माण इतना मजबूत है कि इसने महामारी में व्यक्तिगत व्यवहार को भी सकारात्मक रूप से प्रभावित किया है. मिशिगन विश्वविद्यालय के चिकित्सा केंद्र, मिशिगन मेडिसिन की ओर से 1,074 लोगों के बीच किए गए एक अध्ययन में पाया गया है कि कोविड के दौरान लोगों में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों दृष्टिकोण दिखे. किसी प्रियजन के गंभीर कोविड-19 संक्रमण के जोखिम को लेकर जहां उनमें चिंता का उच्च सकारात्मक दृष्टिकोण था तो वहीं सामाजिक दूरी को लेकर कम नकारात्मक दृष्टिकोण. भारत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी देशभर के विश्वविद्यालयों से कोविड-19 से युद्ध में भावनात्मक बंधन के प्रभाव पर और शोध करने का आग्रह किया है. समाजशास्त्री और पारिवारिक मानवविज्ञानी तुलसी पटेल के मुताबिक, ''कोविड से परिवारों के जुड़ाव, एक दूसरे का समर्थन और एक दूसरे को लेकर सोच में काफी बदलाव आया है.''

आभासी दुनिया में बढ़ती निकटता

यात्रा और किसी एक जगह जुटान पर प्रतिबंध लगे तो लोगों को वर्चुअल रूप से जुड़ने का समय मिला. गायक-संगीतकार अमरीश मिश्र ने मई और जून की दूसरी छमाही के दौरान आभासी पारिवारिक समारोहों में गाया. कभी-कभार जन्मदिन और सालगिरह के जश्न के लिए, लेकिन ज्यादातर प्रार्थना सभाओं के लिए. उनका मानना है कि ये सभाएं, पारंपरिक रूप से एक जगह जमा होकर आयोजित होने वाली शोक सभाओं की तुलना में कहीं अधिक भावनात्मक थीं, जहां लोग शोक प्रकट करने से अधिक अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए मौजूद होते हैं. वे कहते हैं, ''मैंने देखा कि इन आभासी सभाओं में लोगों ने जो व्यक्त किया वह कहीं अधिक भावनात्मक और गहरा था. ऐसा इसलिए हो सकता है क्योंकि जो लोग वास्तव में मायने रखते हैं वे दुनिया के किसी भी हिस्से में हों, आपके सुख-दुख में शामिल हो सकते हैं. महामारी ने लोगों को रिश्तों के मूल्य के बारे में अधिक जागरूक किया है. सतहीपन पीछे चला गया है.''

मई 2021 के जूम और क्वाल्ट्रिक्स रिसर्च के एक अध्ययन से पता चला है कि 90 प्रतिशत भारतीयों ने महसूस किया कि महामारी के दौरान वीडियो कॉल ने उन्हें अकेलेपन से निबटने में मदद की. नैदानिक मनोविज्ञानी और मुंबई स्थित एम-पावर-द सेंटर की जेनिशा शाह इन आभासी भेंट-मुलाकातों की ताकत की व्याख्या करती हैं, ''भौतिक निकटता के अभाव के बावजूद, फोन, कंप्यूटर और सोशल मीडिया जैसे विभिन्न माध्यमों की मदद से सामाजिक जुड़ाव बना रहा है. इसने लोगों को उनके सामाजिक समर्थन प्रणालियों के लिए अधिक आभारी बना दिया है. मिसाल के तौर पर, यहां तक कि दोस्तों या परिवार के सदस्यों की आवाज सुनने या उनका कोई मैसेज पढ़ने से अधिक जुड़ाव महसूस करने में मदद मिली है जो किसी के मानसिक और भावनात्मक कल्याण का एक बहुत ही महत्वपूर्ण पहलू है; खासकर उनके लिए जो क्वारंटीन हैं या अकेले रह रहे हैं.''
 
परिवार के लिए ज्यादा वक्त

2019 में गोदरेज इंटीरियो की ओर से 13 शहरों में 1,300 भारतीयों के बीच कराए गए सर्वे 'मेक स्पेस फॉर लाइफ' में 56.7 फीसद ने अपने कामकाजी और निजी जीवन के बीच संतुलन को भयानक बताया. इकोनॉमिस्ट की ओर से 11 देशों में किए गए एक विश्लेषण में पाया गया कि मां अपने बच्चों के साथ रोजाना औसतन 104 मिनट बिताती है जबकि पिता औसतन 59 मिनट बिताते हैं. यह पाया गया कि 34 प्रतिशत उत्तरदाता अपने पेशेवर करियर के कारण अपने बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाने की वजह से अपराधबोध से ग्रस्त थे.

लॉकडाउन ने इसे बदल दिया. अधिक से अधिक लोगों ने अपने रिश्तों को बेहतर बनाने के अवसर का उपयोग किया. दरअसल, कनाडा में 8,000 महिलाओं के बीच कैलगरी विश्वविद्यालय की ओर से हुए एक अध्ययन में पाया गया कि उनमें से आधे से अधिक ने महामारी के कारण खुद को अपने बच्चों के करीब महसूस किया. गुडग़ांव के फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में मानसिक स्वास्थ्य और व्यवहार विज्ञान की विभागाध्यक्ष कामना छिब्बर कहती हैं, ''बोर्ड गेम, बातचीत, साथ में खाना आदि कुछ ऐसी गतिविधियां थीं जो सबसे फायदेमंद रहीं. लोग अपने मतभेदों को समझने और बताने में सक्षम थे. उन्होंने माना है कि उनके पास मदद के लिए हाथ हैं. पारिवारिक इकाइयों में दादा-दादी का मूल्य बढ़ा है. बच्चे उनके साथ फिर से जुड़ गए हैं.'' पुणे स्थित बोर्ड गेम कंपनी का डेटा इसकी पुष्टि करता है क्योंकि पिछले वर्ष बोर्ड गेम की बिक्री में 30 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है.

शाह कहती हैं, ''कुछ परिवारों के लिए न्यू नॉर्मल एक 'बेहतर सामान्य' में बदल गया, जहां उन्होंने छोटी चीजों में खुशी खोजना सीखा. इसने उन्हें भविष्य के लिए प्रेरणा दी.'' मिसाल के तौर पर, वास्तुकार युगल राजीव और एकता पारेख (देखें, केस स्टडी) ने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए धन जुटाने की खातिर नीलामी की क्योंकि ग्रामीणों को इस मुश्किल समय में मदद की आवश्यकता थी. उन्होंने अपनी जुड़वां बेटियों को भी इस प्रयास का हिस्सा बनाया.

इसके अलावा, जैसा कि शाह भी बताती हैं, ''घर के कामों के बारे में कठोर पारंपरिक आदर्शों वाले परिवारों ने भी उन पुरानी परंपराओं को तोड़ने और घर का काम मिल-बांटकर करने में रुचि दिखाई.'' साजी जकरिया ऐसे ही लोगों में थे, जो मिलजुलकर काम करते थे (देखें, केस स्टडी). वे कहते हैं, ''अब हमें इस बात की बेहतर समझ है कि घर चलाने के लिए कितना कुछ करना पड़ता है. और किसी गृहिणी घर में रोजाना बहुत सारे काम करती है.''

वास्तव में, कई मनोवैज्ञानिकों ने घर के भीतर पारिवारिक भूमिकाओं में बदलाव को देखा है. ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी के जिंदल स्कूल ऑफ साइकोलॉजी ऐंड काउंसलिंग (जेएसपीसी) के एक मनोवैज्ञानिक और सलाहकार बोर्ड के प्रमुख प्रोफेसर संजीव पी. साहनी के शब्दों में, ''बच्चों के माता-पिता दोनों ही अगर कामकाजी हैं तो दफ्तर के काम, घरेलू जीवन और बच्चों की घर से चल रही पढ़ाई का प्रबंधन करना वास्तव में बहुत कठिन हो सकता है. इसलिए, इन चुनौतियों से निबटने के दौरान हमने परिवार में स्त्रियों और पुरुषों की भूमिकाओं में बदलाव भी देखे हैं. कई घरों में पुरुष और महिलाएं घरेलू काम में हाथ बंटा रहे हैं. हम जानते हैं कि आमतौर पर घरेलू काम का बोझ महिलाओं पर ही होता है, लेकिन अब यह बदल गया है, खासकर कई शहरी मध्यवर्गीय परिवारों में. मैं कहूंगा कि महिलाएं अभी भी रोजमर्रा वाले और थकाऊ काम करती हैं लेकिन एक बदलाव आया है. क्या यह बदलाव स्थाई होगा और महामारी के बाद भी जारी रहेगा, इसका अनुमान लगा पाना अभी बहुत मुश्किल है.''

पारिवारिक घरों की ओर वापसी

भारत के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएसओ) के आंकड़ों से पता चलता है कि लगभग 40 प्रतिशत बुजुर्ग जोड़े या तो बिना बच्चों के रहते हैं या केवल अपने अविवाहित बच्चों के साथ रहते हैं. लेकिन कोविड में कई बुजुर्ग माता-पिता को अपने बच्चों के पास या बच्चों को माता-पिता के पास आते देखा. इसने कई लोगों को फिर से जुड़ने और आपसी लगाव को मजबूत करने का मौका दिया.

मुंबई के 32 वर्षीय मैकेनिकल इंजीनियर दिलीप (बदला हुआ नाम) एक दशक से अधिक समय तक अलग रहने के बाद मार्च में अपने माता-पिता के घर लौट आए. तलाक के बाद मानसिक रूप से लगातार चिंतित रहने और एक पखवाड़े तक कोविड के कारण बीमार रहने के कारण उन्होंने यह फैसला किया. वे अब पिता के साथ अपने संबंधों को 'बेहतर' करने का प्रयास कर रहे हैं, जो तब से तनावपूर्ण हैं जब दिलीप किशोरवय थे. वे कहते हैं, ''जितनी मुझे अपने परिवार की जरूरत है उतनी ही मेरे माता-पिता को मेरी भी आवश्यकता है. पिछला साल बहुत कठिन रहा है और संयुक्त परिवार में ही आपको पूरा समर्थन तंत्र मिलता है जिसकी मुझे जरूरत है और जिसे मैं पहले दमघोंटू समझता था.''

शाह के मुताबिक, महामारी से प्रेरित लॉकडाउन ने परिवारों को ''जीवन की एक अलग गति को अपनाने, अपने आस-पड़ोस में घूमने, बागबानी करने, नई आदतों और शौक को अपनाने जैसी गतिविधियों का आनंद लेने का मौका दिया और एक दूसरे के लिए प्रशंसा की भावना जगाई है. महामारी के कारण लगाए गए प्रतिबंध एक दिन समाप्त हो जाएंगे, लेकिन एक परिवार के रूप में वे शारीरिक और भावनात्मक रूप से एक दूसरे के करीब बने रहेंगे. इसने एक दूसरे के साथ खड़े होने की भावना को जन्म दिया. इसने लोगों को अधिक सहिष्णु, लचीला और दूसरों के प्रति जागरूक बना दिया है, हालांकि वे खुद भी महामारी से जूझ रहे थे. उतार-चढ़ाव के बावजूद, इसने लोगों को एक समुदाय के रूप में जोड़ा है.''

महामारी ने लोगों के साथ रहने के तरीके को भी बदल दिया है. पहाड़ियों में या समुद्र के किनारे एक अन्य घर में अचानक रुचि बढ़ने से लेकर एक ऐसी जगह जहां से बहुत सारे काम किए जा सकें और जूम पर जिसका बैकड्रॉप भी बहुत खूबसूरत दिखे, की मांग बढ़ी है. हैदराबाद स्थित पाइनवुड स्टुडियो की लैंडस्केप आर्किटेक्ट मेघना धुलानी कहती हैं, ''मल्टीलेवल आउटस्पेस की मांग बढ़ी है, जहां परिवार में प्रत्येक आयु वर्ग के सदस्य के लिए अपनी सामाजिक जगह होती है. इसके अलावा, हाउस पार्टियां नए जमाने का ट्रेंड बन रही हैं, इसलिए हमें डिजाइन के लिए जो भी हिदायत मिलती है उसमें टेरेस के लिए सुझाव होते हैं क्योंकि अब यह नया सोशल क्लब है. बुजुर्ग घरों की निचली मंजिलों का उपयोग करते हैं जो उनके लिए सुविधाजनक होता है, तो युवा पीढ़ी अब स्विमिंग पूल, आउटडोर डांस डेक और बारबेक्यू स्टेशन जैसी सुविधाओं के साथ अपने लिए अलग स्थान की मांग करती है.'' कोलकाता स्थित स्पेस ऐंड डिजाइन की इंटीरियर डिजाइनर पूजा बिहानी इससे सहमत हैं. पूजा कहती हैं, ''महामारी के बाद विशेष रूप से ऑनलाइन कक्षाओं और घर से काम करने की प्रथा शुरू होने बाद निश्चित रूप से एक बड़े घर की मांग बढ़ी है.''

मुंबई स्थित केएनएस आर्किटेक्ट्स के संस्थापक आर्किटेक्ट कन्हाई गांधी ने महामारी के कारण एक नए ट्रेंड की शुरुआत देखी है—लोग परिवार के अन्य सदस्यों से दूर, अपने लिए एक कमरा या जगह रखना चाहते हैं. वे बताते हैं, ''लोगों को एक ऐसी जगह की जरूरत महसूस हो रही है जहां वे जो चाहे कर सकते हैं. हो सकता है ऐसी जगह वे शायद बस इत्मीनान से बैठकर किताबें पढ़ने या आराम करने, खेलने और अपनी पसंदीदा फिल्में देखने के लिए चाहते हों. दिन में यह एक कॉन्फ्रेंस रूम या ऑफिस में बदल सकता है. उन्हें ऐसे कमरे चाहिए जिन्हें आसानी से परिवर्तित किया जा सकता है.''

हालांकि, भले ही परिवार ने इस कठिन महामारी के समय में मुख्य भूमिका निभाई है लेकिन एक साथ रहने की कुछ परेशानियां भी हैं. इससे बहस, टकराव और आजादी के छिन जाने का भाव भी आया है. दिल्ली की मनोवैज्ञानिक डॉ. उपासना चड्ढा कहती हैं, ''कई लोग अपने माता-पिता से दूर रहने के वर्षों बाद वापस लौट आए हैं; इससे उनमें कुछ निराशा और झुंझलाहट भी देखी जा रही है क्योंकि लोगों को एक साथ रहने की आदत नहीं रही है. पहले जो रिश्ता अस्थायी और औपचारिक था, अब वह अचानक स्थायी रिश्ते जैसा बन गया है. भले ही लोग एक साथ समय बिताने का आनंद ले रहे हों लेकिन इसके लिए उन्हें समझौते करने होते हैं. लेकिन हां, निश्चित रूप से परिवार और दोस्तों पर अधिक निर्भरता है और उनके लिए गहरी प्रशंसा भी पैदा हुई है.''

मुंबई की एक गृहिणी, 36 वर्षीय अक्षिता चतुर्वेदी का कहना है कि उनके पड़ोसियों के साथ पहले उनका रिश्ता 'औपचारिक' हुआ करता था जो उस समय 'दोस्ती' में बदल गया जब उनका परिवार कोविड संक्रमित हो गया. गोरेगांव स्थित उनकी बिल्डिंग में उनके निकटतम पड़ोसियों ने बारी-बारी से उन्हें भोजन भेजा और यहां तक कि उनके बच्चों को भी अपने साथ रहने के लिए ले गए. कॉमन एरिया में पालतू जानवरों, साफ-सफाई और पौधों को लेकर होने वाली छोटी-छोटी बहस बेमानी हो चली थी. वे कहती हैं, ''हमने पहली बार एक-दूसरे को दोस्त के रूप में देखा और यह बहुत से बंधनों को काटने वाला और बहुत सुकूनभरा था.'' मुंबई की एक परामर्श मनोवैज्ञानिक देविका कपूर इसका श्रेय समाज में एक दूसरे के प्रति बढ़ी संवेदना को देती हैं. वे कहती हैं, ''एक दूसरे का साथ देने की भावना का एक सांस्कृतिक पक्ष भी है. जब हम बड़े हुए तो हमें सिखाया गया कि हमें किसी का बुरे वक्त में साथ निभाना चाहिए. हमने सहयोग की जो संस्कृति पीढ़ी दर पीढ़ी सीखी है, उसने अपनी पूरी भूमिका निभाई.''

गार्टनर के एक शोध के मुताबिक, किसी दूरस्थ स्थान से काम की छूट की मांग 2030 तक 30 फीसद बढ़ जाएगी. लेकिन क्या घर से काम करने की अनुमति के बाद लोगों के बीच रिश्तों में वैसी ही गर्माहट बनी रहेगी जो कोविड से उपजे भावनात्मक लगाव के कारण देखी गई? कहना मुश्किल है. मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि परिवार के समर्थन के सकारात्मक प्रभाव और अनुभवों को देखते हुए कुछ परिवार जुड़े रहने के प्रयास जारी रखना चाहेंगे. शाह कहते हैं, ''स्वस्थ भोजन की आदत, एक साथ खाना बनाना, घर के कामों का आपस में बंटवारा, इनडोर गेम खेलना, घर पर कसरत करना और अपनी देखभाल को दिनचर्या में शामिल करना जैसी कुछ चीजें हैं जो वे महामारी के चले जाने के बाद भी जारी रख सकते हैं.''

डॉ. देसाई कहते हैं, ''मुझे लगता है कि अधिकांश प्रभाव सकारात्मक रहे हैं, परिवार एक साथ समय बिता रहे हैं, बहुत-सी चीजें साथ मिलकर कर रहे हैं, एक दूसरे को फिर से जान रहे हैं.'' हालांकि, यह तो समय ही बताएगा कि लोग परिवार से जुड़े रहने के प्रयास क्या वास्तव में करेंगे या फिर यह केवल कोविड जैसी आपदा के कारण उपजा जुड़ाव था जो महामारी के विदा होने के बाद ढीला पड़ जाएगा.

—साथ में शैली आनंद और रिद्धि काले

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