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प्रधान संपादक की कलम से

उम्मीद है कि डिजिटल शिक्षा की लहर इन भौगोलिक असमानताओं को तोड़ देगी और उच्च शिक्षा को ज्यादा समावेशी बनाएगी. ऑनलाइन शिक्षा ने जबरदस्त संभावनाओं के दरवाजे खोले

21 जून, 2000 का आवरण
21 जून, 2000 का आवरण
अपडेटेड 29 जून , 2021

अरुण पुरी

दुनिया भर में शिक्षा के क्षेत्र में सबसे ज्यादा उथलपुथल कोविड-19 महामारी ने मचाई. स्कूलों-कॉलेजों ने दरवाजे बंद कर दिए और ऑनलाइन कक्षाएं लगाने लगे. अकादमिक जिंदगी उलट-पुलट गई और करियर थम गए. देश के कई शिक्षा बोर्डों ने आमने-सामने परीक्षाएं रद्द कर दीं और छात्रों का मूल्यांकन करने के लिए उनकी जगह कई तरह के फॉर्मूले ले आए.

महामारी ने हमें मजबूर कर दिया कि बच्चे की पढ़ाई का मूल्यांकन करने के लिए परीक्षाओं के अलावा नए तरीकों की भी पड़ताल करें. मसलन, सीबीएसई या केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड छात्रों के आकलन के लिए 12वीं की परीक्षा को 30:30:40 के फॉर्मूले से बदलने का मनसूबा बना रहा है, जो बोर्ड से पहले कक्षा 10 और कक्षा 11 की परीक्षाओं के प्रदर्शन पर आधारित है.

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020, जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पिछली जुलाई में मंजूरी दी, 35 साल पुराने दस्तावेज की जगह आई है. यह शिक्षा पर खर्च बढ़ाने और आमूलचूल बदलाव लाने का वादा करती है. इनमें शिक्षा की सुलभता, समानता और सामर्त्थ पर अधिक ध्यान देना शामिल है.

इसी माहौल में इंडिया टुडे बेस्ट कॉलेज सर्वेक्षण के 25वें संस्करण को उत्कृष्टता की खोज करनी पड़ी. हमने 14 विषयों के कॉलेजों को रैंक देने के लिए प्रतिष्ठित मार्केट रिसर्च एजेंसी मार्केटिंग ऐंड डेवलपमेंट रिसर्च एसोसिएट्स (एमडीआरए) को साथ लिया. एजेंसी ने कॉलेजों के आकलन के लिए सर्वाधिक व्यापक और संतुलित जरिया जुटाने की खातिर प्रत्येक धारा में कार्य प्रदर्शन के 112 संकेतक तैयार किए. इन्हें बांटकर पांच व्यापक मानदंड तय किए गए—इनटेक क्वालिटी और गवर्नेंस, अकादमिक उत्कृष्टता, इन्फ्रास्ट्रक्चर और माहौल, व्यक्तित्व और नेतृत्व विकास और करियर की संभावना तथा प्लेसमेंट.

हमने यह भी समझने की कोशिश की कि कॉलेजों ने महामारी से निबटने के लिए कैसे कमर कसी. एमडीआरए ने मौजूदा साल के डेटा के आधार पर कॉलेजों का मूल्यांकन करके वास्तविक, प्रासंगिक और सटीक जानकारियां निकालीं. जमीनी काम दिसंबर 2020 और जून 2021 के बीच किया गया. कोविड की पाबंदियों के चलते कैंपसों की भौतिक छानबीन कर पाना नामुमकिन-सा ही था. इन सीमाओं के बावजूद कॉलेजों ने जबरदस्त उत्साह से सर्वे में हिस्सा लिया. यह सर्वे देश में कॉलेज शिक्षा का खाका तैयार करने में उत्कृष्टता का पर्याय बन गया है और अपनी निरंतरता के लिए सराहा जाता है.

महामारी के नतीजतन शिक्षा में डिजिटल चुनौती से पार पाने के लिए कई नए काम किए गए. मणिपुर के एक डेंटल कॉलेज ने छात्रों के लिए सिम्युलेशन लैब बनाई. दिल्ली के कॉलेज ने डिजिटल खाई को पाटने की खातिर मुफ्त लैपटॉप और डेटा पैक बांटकर छात्रों की मदद की. कुछ ने अपने छात्रों को धन की पूरी कीमत अदा करने के लिए अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के साथ हाथ मिलाया. दक्षिण के एक कंप्यूटर साइंस कॉलेज ने छात्रों की उत्सुकता जगाने के लिए जावा सरीखी प्रोग्रामिंग भाषाओं को 'गेमिफाइ' किया यानी खेल में बदला. छात्रों को ऑडियो लेक्चर दिए गए ताकि वे अपने खाली वक्त में उन्हें सुनें और कक्षा में सिखाई गई अवधारणाओं को याद रखें. जिनके पास लैपटॉप नहीं थे, उन्हें स्मार्टफोन पर इस्तेमाल किए जा सकने वाले ऑनलाइन कोड एडिटिंग ऐप दिए गए.

हमने छात्रों से भी बात करके जाना कि वे कैसे काम कर रहे हैं. आइआइटी में वास्तुकला के अंतिम वर्ष के एक छात्र ने बताया कि उसे भौतिक स्टुडियो में सबके साथ मिलकर सीखने और विभाग के बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल नहीं कर पाने की कमी खलती है. पुणे में जनसंचार की पढ़ाई कर रहे एक छात्र ने कहा कि रिकॉर्ड किए गए लेक्चरों की वजह से वह अपनी पढ़ाई पर बेहतर नियंत्रण रख पाया और पार्ट-टाइम नौकरी के साथ पढ़ाई का संतुलन भी बरकरार रख सका.

निष्ठुर हकीकत यही है कि महामारी ने डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा दिया है. आज के वर्चुअल क्लासरूम भले ही जरूरत का नतीजा हैं, पर भविष्य साफ तौर पर मिली-जुली पढ़ाई का है, जिसमें आमने-सामने और ऑनलाइन पढ़ाई आपस में मिलकर शिक्षा का तजुर्बा बढ़ा देगी. 2020-21 का बैच इशारा है कि शिक्षा अंतत: कैसी होगी.

कुछ चिंताजनक संकेत भी हैं. बीते पांच सालों में कॉलेजों की तादाद 3,272 बढ़ी. कुल कॉलेज 42,443 हो गए. मगर प्रति दस लाख छात्रों पर कॉलेज 2015-16 के 2.8 से मामूली बढ़कर 2020-21 में महज 3 पर पहुंचे. संस्थाओं के भौगोलिक बंटवारे में असमानता भी चिंता का सबब बनी हुई है. देश में 78 फीसद कॉलेज मात्र दस राज्यों—उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, गुजरात, तेलंगाना और केरल—में हैं.

उम्मीद है कि डिजिटल शिक्षा की लहर इन भौगोलिक असमानताओं को तोड़ देगी और उच्च शिक्षा को ज्यादा समावेशी बनाएगी. ऑनलाइन शिक्षा ने जबरदस्त संभावनाओं के दरवाजे खोले हैं. ठीक उसी तरह जैसे कारोबारों ने वर्किग फ्रॉम होम या वर्चुअल मीटिंग के फायदे खोजे. उनमें भारत के प्रतिकूल छात्र-शिक्षक अनुपात और अच्छी संस्थाओं की कमी को पूरा और दुरुस्त करने की क्षमता के बावजूद खुले विश्वविद्यालयों और सुदूर शिक्षा को हेय दृष्टि से देखा जाता था. ऑनलाइन शिक्षा समाज में बदलाव का सूत्रपात करने की क्षमता से ओतप्रोत है.

25 साल पहले जब हमने यह सर्वे लॉन्च किया तब भारत शिक्षा पर जीडीपी का महज 3.7 फीसद खर्च करता था. 2019-20 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, अब हम और भी कम, 3.1 फीसद, खर्च कर रहे हैं. यह गिरावट सबके लिए गहरी चिंता की बात होनी चाहिए. 25 साल पहले मैंने लिखा था: ''हम जानते हैं कि किसी भी उभरती विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए शिक्षित दिमाग बेहद अहम है.

एशियन टाइगर्स इसकी अच्छी मिसाल हैं, जिन्होंने समझ लिया है कि 100 फीसद साक्षरता और तकनीक में प्रशिक्षित कार्यबल प्रगति की अनिवार्य शर्त हैं. तिस पर भी हमने अर्थव्यवस्था को उदार तो बना दिया, पर लगता है एक बुनियादी सवाल की अनदेखी कर दी: इसे चलाएगा कौन?'' त्रासदी यह है कि यह सवाल डेढ़ दशक बाद भी मौजूं बना हुआ है. बल्कि अगर हम अपनी मौजूदा 2.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था को अगले तीन सालों में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को लेकर संजीदा हैं, तो यह और भी ज्यादा मौजूं हो गया है.

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