अरुण पुरी
हिंदुस्तानी कई लिहाज से सरकार की नाकामियों से निबटने के आदी हैं. बरसों से जेनरेटर सेट लगाकर हम बिजली की कमी से निबटे हैं, निजी वाहनों से सार्वजनिक यातायात नहीं होने की भरपाई की है, गड्ढों भरी सड़कों पर चले हैं, साफ पानी नहीं है तो पानी फिल्टर करने की मशीनें और बोतलबंद पानी ले आए, और ताजा उदाहरण लें तो शहरी प्रदूषण से निबटने के लिए एयर प्यूरिफायर लगा लिए. जन स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा हमेशा जर्जर था, पर हम किसी तरह काम चलाते रहे. कहीं कोई दहशत नहीं थी.
कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर ने बेनकाब कर दिया कि शहरों का स्वास्थ्य ढांचा किस कदर घोर नाकाफी है और केंद्र तथा राज्यों की सरकारें अनुमान लगाने, योजना बनाने या आपातस्थितियों से तेजी से निबटने में बुरी तरह नाकाम रहीं, बावजूद इसके कि उन्हें कोविड संकट के पहले दौर के बाद तैयारी के लिए एक साल मिला था. दुनिया भर में पर्याप्त सबूत मौजूद थे कि कोरोना वायरस किसी न किसी रूप में लौटकर आता है, खासकर तब जब कोविड के नियम-कायदों का पालन नहीं किया जाता और ज्यादातर आबादी को टीके न लगे हों.
हमने संक्रमित मरीजों की लहरों के बोझ से दबते ही देश भर के शहरों में स्वास्थ्य व्यवस्था को वस्तुत: ढहते देखा. बीमारों को अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस नहीं थीं, अस्पतालों में बिस्तर और ऑक्सीजन मिलना दूभर था और मरीजों की देखभाल के लिए मेडिकल स्टाफ की कमी थी. श्मशानों पर भी भारी बोझ था और कई मामलों में जब पूरा परिवार पॉजिटिव हो गया तब मृतक का अंतिम संस्कार करने वाला कोई नहीं था. अब जब वायरस छोटे कस्बों और गांवों में फैल गया है, जहां सरकार ही मुख्यत: स्वास्थ्य सेवा मुहैया करती है, वाकई भयावह स्थितियां उभरकर सामने आई हैं. सरकार या तो गायब है या प्रभावी तरीके से निबटने में सुस्त है.
जिस तरह संकट में हमारे बीच हीरो पहचाने जाते हैं, उसी तरह इस महामारी में ऐसे कई हिंदुस्तानियों के चेहरे उजागर हुए जो संक्रमितों की मदद करने में सरकार की छोड़ी खाली जगह को भरने के लिए असाधारण ढंग से सामने आए. पहली लहर में डॉक्टरों, स्वास्थ्य कर्मियों, सरकारी सेवकों का एक शानदार समूह था जिसने बीमारों की देखभाल के लिए अपने कर्तव्य से कहीं ज्यादा बढ़-चढ़कर किया. दूसरी लहर में उनके साथ बेमिसाल स्त्री-पुरुषों का एक समूह भी था जिसने नदारद सरकार की कमियों को पूरा किया. एंबुलेंस और जीवन-रक्षक दवाइयों का इंतजाम करने से लेकर जरूरतमंदों के लिए अस्पतालों में बिस्तर, ऑक्सीजन और खाने की तलाश करने और श्मशानों में वॉलंटियर के तौर पर काम करने तक हमारे ये नायक हर जगह थे. खुद अपनी जिंदगी और अपने परिवारों को होने वाले जोखिम की अनदेखी करके वे इस चुनौती से निबटने के लिए आगे आए.
केरल के एक गांव में मां-बेटे की एक जोड़ी कोविड-19 के मरीजों को अस्पताल ले जाती है. दिल्ली सिख गुरद्वारा प्रबंधन समिति जरूरतमंदों के लिए ऑक्सीजन लंगर चलाती है. आइआइटी के छात्रों का एक समूह मुंबई का सबसे बड़ा एंबुलेंस ऐप चलाता है. लखनऊ की एक महिला महामारी के मृतकों की अंत्येष्टियां संभालती है. कोलकाता की एक युवा नाट्यकर्मी कोविड के मरीजों के लिए खाना बनाती और पहुंचाती है. उनमें से कई साधारण तबके के लोग हैं. कोविड मरीजों को मुफ्त ट्रांसपोर्ट सेवा मुहैया करने वाले कोल्हापुर के ऑटोरिक्शा ड्राइवर की रुपए-पैसे से मदद उनकी पत्नी और बहू करती हैं. कई खुद कोविड से उबरे लोग हैं जिन्होंने अपनी निजी पीड़ा को परोपकार और करुणा के जरिए निकलने का रास्ता दिया.
लोगों को मुफ्त ऑक्सीजन सिलिंडर देने वाले पटना के 'ऑक्सीजन पुरुष' गौरव राय पिछले साल कोविड मरीज के तौर पर सांसों के लिए तड़पे थे. वायरस का संक्रमण होने पर अपने पड़ोसियों के हाथों अकेले छोड़ दिए गए श्रीनगर की डल झील के हाउसबोट मालिक ने उन्हीं की मदद के लिए तैरती एंबुलेंस बनाई. हमारे सारे हीरो एक साझा धागे से बंधे हैं और वह है अपने साथी नागरिकों के लिए गहरी हमदर्दी. राय कहते हैं, ''खुद परेशानी झेलकर मैं जानता हूं कि हवा के लिए तड़पना क्या होता है. किसी को ठीक होते देखना, उसके चेहरे पर और उसके परिजनों के चेहरों पर राहत देखना ईश्वर के उपहार की तरह लगता है.''
हमारे तमाम ब्यूरो के हाथ संकलित की गई हमारी आवरण कथा, 'स्वयंसेवा का गणतंत्र', असाधारण लोगों और संगठनों की कहानियां दर्ज करती है जिन्होंने दूसरी लहर के दौरान अपने काम से अच्छा-खासा असर डाला. हमने पांच मुख्य क्षेत्रों—चिकित्सा सहायता, ऑक्सीजन, ट्रांसपोर्ट, खाना मुहैया करना और अंतिम संस्कारों में मदद करना—में दूसरों की मदद करने वाले लोगों को चुना है. हमारी फेहरिस्त एक मिसाल भर है. हमने देश भर से जिन लोगों की कहानियां जुटाई हैं, उन्हीं की तरह हजारों लोग हैं जिन्होंने हमारे वक्त की बदतरीन प्राकृतिक आपदा में अपने साथी नागरिकों के लिए मदद का हाथ बढ़ाया.
भले ही ये ढाढस दिलाने वाले मालूम देते हैं, लेकिन इन प्रेरक प्रयासों का दूसरा पहलू भी है—सरकार जिसने अपने नागरिकों को मायूस किया. नागरिक सरकार की जगह नहीं ले सकते. उन्हें लेना भी नहीं चाहिए. सरकारों जितने विशाल संसाधन और कारिंदों की फौज नागरिकों के पास कहां है. वे ज्यादा से ज्यादा कमियों की भरपाई कर सकते हैं. यह भारत सरकार के लिए शर्म की बात होनी चाहिए कि ऐसी आपातस्थिति में लोगों को खुद अपने साधनों के भरोसे छोड़ दिया गया. हम सबको अपने चुने हुए नुमाइंदों से जवाबदेही की मांग करनी ही चाहिए और उन्हें अच्छा राजकाज देने की अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ने देना चाहिए, खासकर जब हम अब भी महामारी की एक के बाद एक आती लहरों की संभावना से दोचार हैं. 'स्वयंसेवा का गणतंत्र' का तमगा मिलना हमारे राष्ट्र के लिए कोई सम्मान की बात नहीं है. हमें 'भारतीय गणराज्य' होने पर गर्व है, जो हम सबसे बड़ा है. मगर इसके नागरिक बेहतर बर्ताव के हकदार हैं.

