
उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पंचायत चुनाव को कितनी गंभीरता से ले रही है उसकी बानगी 4 जनवरी को लखनऊ में पार्टी के प्रदेश मुख्यालय में प्रभारी राधामोहन सिंह, प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उपस्थिति में हुई प्रदेश चुनाव समिति की बैठक में दिखी. नेताओं की यह जमघट यूं तो विधान परिषद चुनाव के संभावित उम्मीदवारों का चयन करने के लिए हुआ लेकिन इस मौके का उपयोग पंचायत चुनाव की रणनीति बनाने के लिए किया गया. बैठक में तय हुआ कि भाजपा पंचायत चुनाव में विजय संकल्प लेकर उतरेगी.
इसके सभी छोटे-बड़े कार्यकर्ता के प्रवास की रणनीति भी बनी. बैठक में दोहराया गया कि पंचायत चुनाव में भाजपा नेताओं के रिश्तेदारों को चुनाव लड़ाने से परहेज किया जाएगा. इसके बाद भाजपा ने 11 से 20 मार्च तक चलने वाले ग्राम चौपाल अभियान की शुरुआत की. इस दौरान 55 हजार ग्राम पंचायतों में चौपाल का आयोजन किया गया. पंचायत चुनाव के मद्देनजर शुरू हुए इस बड़े अभियान में भाजपा नेताओं समेत प्रदेश सरकार के मंत्रियों ने मोदी-योगी सरकार की उपलब्धियों की ग्रामीणों को जानकारी दी. अभियान की कमान प्रदेश भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने संभाली. उन्होंने लखनऊ से ग्राम चौपाल अभियान की शुरुआत कर सीतापुर, जौनपुर, सुल्तानपुर समेत दो दर्जन से अधिक जिलों में सभाएं कर और कार्यकर्ताओं के घर भोजन करके पंचायत चुनाव के लिए समर्थन बटोरने की भरपूर कोशिश की.
उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी (सपा) भी पंचायत चुनाव के मद्देनजर किसानों के बीच जाकर पैठ बनाने में जुटी है. इसकी शुरुआत पिछले वर्ष 25 दिसंबर से हुई जब सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के आह्वान पर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने गांव-गांव जाकर ''समाजवादी किसान घेरा कार्यक्रम'' आयोजित किया. इसमें नेताओं ने ग्रामीणों के बीच बैठकें करके किसानों की दिक्कतों पर चर्चा की. अखिलेश 5 मार्च से अलीगढ़ में किसान महापंचायत की शुरुआत कर 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव में सपा की धमक दिखाने की कोशिश में जुट गए हैं.
राजनैतिक पार्टियों की सक्रियता यह इशारा करती है कि प्रदेश में इस बार पंचायत चुनाव महत्वपूर्ण क्यों हो गए हैं. मेरठ कॉलेज में अर्थशास्त्र विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर मनोज सिवाच बताते हैं, ''इस बार पंचायत चुनाव उस वक्त हो रहे हैं जब पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन जारी है. ऐसे में विपक्षी पार्टियां किसानों के मुद्दे उठाकर गावों में सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ जनमत तैयार करने की कोशिश कर रही हैं. वहीं भाजपा के सामने गांव-देहात में पकड़ बनाए रखने की चुनौती है. इस तरह पंचायत चुनाव को राजनैतिक दल 2022 के विधानसभा चुनाव के सेमीफाइनल के तौर पर ले रहे हैं.''
राज्य चुनाव आयोग ने जैसे ही 26 मार्च को प्रदेश में चार चरणों में होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव की घोषणा की प्रदेश का राजनैतिक तापमान अचानक बढ़ गया है. भले ही पंचायत चुनाव राजनैतिक दलों के चुनाव चिन्ह पर नहीं लड़े जाते लेकिन यह पहली बार है कि प्रदेश में सभी राजनैतिक दल पंचायत के चुनाव में अपनी ताकत दिखाएंगे. सिवाच बताते हैं, ''पंचायत चुनाव 2022 के विधानसभा चुनाव की तैयारी में लगे संभावित उम्मीदवारों के साथ मौजूदा विधायकों की भी परीक्षा लेंगे. पंचायत चुनाव राजनैतिक दलों के जमीनी संपर्क की परख भी करेंगे. चुनाव नतीजों से दलों को विधानसभा चुनाव की रणनीति बनाने में आसानी होगी.''
सबसे बड़ी चुनौती सत्तारूढ़ भाजपा के सामने है. प्रदेश भाजपा की लखनऊ में 15 मार्च को हुई कार्यसमिति की बैठक में जिस तरह किसान आंदोलन को लेकर चिंता दिखी उससे भगवा खेमे के लिए पंचायत चुनाव काफी महत्वपूर्ण हो गए हैं. कार्यसमिति की बैठक में उद्घाटन से लेकर समापन सत्र तक में किसी न किसी बहाने खेती-किसानी के मुद्दे गूंजते रहे. पार्टी ने किसानों पर फोकस करने वाले कार्यक्रमों की रूपरेखा खींची. 21 मार्च को प्रदेश के सभी 826 ब्लॉकों पर किसान सम्मेलन का आयोजन किया गया. भाजपा ने प्रदेश उपाध्यक्ष और विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) विजय बहादुर पाठक को पंचायत चुनाव का प्रभारी बनाया है.
पाठक लगातार पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से समन्वय बनाकर पंचायत चुनाव में कमल को मजबूत करने में जुटे हैं. पाठक बताते हैं, ''भले ही पंचायत चुनाव पार्टी के निशान पर नहीं लड़े जाएंगे, इसके बावजूद पार्टी जिला पंचायत सदस्य के उम्मीदवार घोषित करेगी. पूरी पार्टी इन्हें चुनाव लड़ाएगी.'' पाठक के मुताबिक, सभी वार्डों में भाजपा ने चुनाव संचालन समिति का गठन किया है. उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया में पहले वार्ड, जिला, क्षेत्र फिर प्रदेश स्तर पर कार्य किया जा रहा है. पाठक बताते हैं, ''भाजपा ब्लॉक प्रमुख का चुनाव लड़ेगी लेकिन बीडीसी का चुनाव नहीं लड़ेगी. भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा गया है कि बीडीसी और ग्राम प्रधान का चुनाव वे अपने समन्वय और स्वविवेक के आधार पर लड़ें.''
पंचायत चुनाव में शामिल होने वाले राजनैतिक दलों की ओर से ग्राम प्रधान और क्षेत्र पंचायत सदस्य (बीडीसी) पदों के लिए अधिकृत उम्मीदवार नहीं उतारने की घोषणा की गई है. बावजूद इसके स्थानीय स्तर पर राजनैतिक दलों के प्रभावशाली नेता अपने समर्थकों को चुनाव लड़ाने में जुट गए हैं. आगामी क्षेत्र पंचायत प्रमुख के चुनाव में बीडीसी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं तो जिला पंचायत सदस्य की तरह प्रधान, बीडीसी भी भविष्य में एमएलसी चुनाव में मतदाता की भूमिका में रहने वाले हैं.
समाजवादी पार्टी ने भी पंचायत चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है. पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सभी जिलाध्यक्षों को निर्देश दिया है कि संभावित उम्मीदवारों से आवेदन लेकर साक्षात्कार की प्रक्रिया पूरी कर ली जाए. संबंधित वार्ड से उम्मीदवार घोषित करने का अंतिम फैसला जिला कमिटी का होगा. इसके लिए सभी जिलों में चयन कमिटी बनाई गई है. प्रत्याशी के चयन में जीत का आधार, व्यक्तित्व, चुनावी अनुभव आदि पर खासतौर से महत्व दिया जाएगा. सपा ने पंचायत चुनाव के बहाने यादव और मुसलमान के अपने कोर वोट बैंक में उन पिछड़ी जातियों को भी जोड़ने की कोशिश की है जो वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में साइकिल से छिटक गई थीं. इसीलिए 26 मार्च को पंचायत चुनाव की आचार संहिता लागू होते ही सपा पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष राजपाल कश्यप ने 51 सदस्यीय कार्यकारिणी की घोषणा कर दी.
पंचायत चुनाव के मद्देनजर सपा के पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ में प्रदेश के हर हिस्से और जाति को प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया गया है. कार्यकारिणी में पांच उपाध्यक्ष, 19 सचिव, 24 सदस्य और 76 विशेष आमंत्रित सदस्य बनाए गए हैं. पिछड़ी जातियों को सपा के पक्ष में लामबंद करने के लिए पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ पिछले कई दिनों से जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन कर रहा है. पंचायत चुनाव में जिला पंचायत सदस्य के लिए सपा ने केवट, निषाद, लोहार, चौरसिया, कश्यप, बियार, नोनिया जैसी जातियों के मजबूत उम्मीदवारों पर दांव लगाने की रणनीति तैयार की है. यही वे जातियां हैं जो पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ खड़ी दिखाई दी थीं. सपा के मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी बताते हैं, ''सपा एकमात्र पार्टी है जो समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलती है. पंचायत चुनावों में भी यह स्पष्ट दिखाई देगा. भाजपा ने सभी जातियों को छला है. पंचायत चुनाव में ये जातियां सपा को समर्थन देने का मन बना चुकी हैं.''

बसपा की मुखिया मायावती ने पंचायत चुनाव और मिशन-2022 की तैयारियों को लेकर संगठन में फेरबदल किया है. 8 मार्च को पार्टी के मुख्य सेक्टर प्रभारियों के दायित्वों में बड़ा बदलाव किया गया है. मुख्य मंडल प्रभारियों के सहयोग के लिए जिला सेक्टर प्रभारी लगाए गए हैं. प्रदेश के हर विधानसभा क्षेत्र में एक सेक्टर प्रभारी तथा सुरक्षित विधानसभा क्षेत्रों में दो सेक्टर प्रभारी तैनात किए जाएंगे. मुख्य सेक्टर प्रभारियों को बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी दी गई है. मायावती ने जिला पंचायत सदस्य पद के प्रत्याशियों के नाम फाइनल करने का जिम्मा मुख्य सेक्टर प्रभारी को सौंप दिया है. जिलाध्यक्ष स्तर से जिलावार प्रत्याशियों की सूची जारी होगी. बसपा के एक सेक्टर प्रभारी बताते हैं, ''मायावती ने पार्टी नेताओं से साफ कह दिया है कि विधानसभा चुनाव के लिए टिकट की दावेदारी मजबूत करनी है तो पंचायत चुनाव में बेहतर परिणाम लाना होगा.''
प्रदेश में अपने पांव जमाने में जुटी कांग्रेस ने पंचायत चुनाव के लिए राष्ट्रीय सचिव जुबैर खान व धीरज गुर्जर को प्रभारी नियुक्त किया है. पंचायत चुनाव और अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने प्रदेश में संगठन का विस्तार भी किया है. इसके तहत तीन नए उपाध्यक्ष, 13 महासचिव के अलावा 53 सचिव बनाए गए हैं. कुछ समय पहले कांग्रेस की प्रदेश कमिटी में पश्चिमी यूपी के जाट नेता पंकज मलिक, योगेश दीक्षित, विधायक सुहेल अंसारी, वीरेंद्र चौधरी और ललितेश पति त्रिपाठी को उपाध्यक्ष का दायित्व सौंपा गया था. अब इनमें तीन नाम और जोड़े गए हैं. पश्चिमी यूपी में जाटव जाति से आने वाले दीपक कुमार, बुंदेलखंड में कोरी जाति से आने वाले गयादीन अनुरागी और गोरखपुर के विश्वविजय सिंह को उपाध्यक्ष बनाया गया है. इस विस्तार के बाद अब हर जिले में कांग्रेस का एक प्रभारी सचिव होगा. इस तरह पंचायत चुनाव कांग्रेस के नए संगठन का भी इम्तिहान लेंगे.

