उत्तराखंड में अगले साल प्रस्तावित विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस के प्रति अनुकूल माहौल बनाने के लिए पार्टी अपनी सक्रियता बढ़ाने की तैयारी कर रही थी. लेकिन पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की इस मांग ने बखेड़ा खड़ा कर दिया है कि मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करके पार्टी विधानसभा चुनाव लड़े, उस चेहरे को चुनने का काम पार्टी करे. चूंकि रावत ही अब पार्टी में सर्वाधिक जनाधार वाले नेता हैं तो शायद इस मांग के पीछे यही मंशा होगी कि पार्टी उनके अलावा किसी का नाम सुझा ही नहीं सकेगी. राज्य में पार्टी के नए प्रभारी देवेंद्र यादव राजस्था्न की जीत में अहम भूमिका निभाने के बाद अब यहां भी कांग्रेस की जीत की राह प्रशस्त करने के लिए स्थानीय नेताओं को एकजुट करने में जुटे हैं. यादव के यह कहने के बावजूद कि पार्टी पहले ही तय कर चुकी है कि चुनाव सामूहिक रूप से लड़ा जाएगा, रावत अपनी मांग पर अड़े हुए हैं.
रावत ने कहा कि भाजपा नगर निकाय चुनावों को भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़कर लाभ ले रही है. ऐसे में अगर कांग्रेस प्रदेश में स्थानीय चेहरा लाती है तो भाजपा को भी स्थानीय चेहरा लाना पड़ेगा. उन्होंने कहा कि स्थानीय स्तर पर कांग्रेस का चेहरा तय होने पर जनता दोनों चेहरों की तुलना करेगी. उनके मुताबिक, मोदी गेस्ट आर्टिस्ट के तौर पर आएंगे और अपनी बात कहकर चले जाएंगे. रावत की दलील है कि सीएम का चेहरा घोषित होने से संगठन में गुटबाजी कम होगी और सभी एकजुट होकर चुनाव में जुट जाएंगे.
वहीं, नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश ने कहा है कि रावत ऐसा माहौल बनाएं कि जनता कांग्रेस के पक्ष में वोट करने को तैयार हो, न कि दूसरी तरफ भागने को तैयार हो जाए. उन्होंने कहा कि यह काम केवल पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व का है कि वह चुनाव किसी चेहरे पर लड़े या सामूहिक नेतृत्व में. हृदयेश ने यह भी तंज किया कि 2017 के चुनाव में रावत को चेहरा बनाने पर पार्टी 11 सीटों पर सिमट गई थी. वैसे, उन्होंने कहा कि रावत खुद को सीएम का चेहरा घोषित करवा लें तो भी पार्टी उनको पूरी ताकत से चुनाव लड़ाएगी.
रावत कीमांग के बाद कांग्रेस में गुटबंदी सतह पर आ गई है. पूर्व स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल, राज्यसभा सदस्य प्रदीप टम्टा और धारचुला क्षेत्र से विधायक हरीश धामी ने तो रावत को सीएम का चेहरा बनाने की मांग शुरू कर दी है. वहीं, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह ने कहा कि ऐसा कोई चेहरा घोषित करने की परंपरा पार्टी में नहीं है. पार्टी राहुल गांधी और सोनिया गांधी के चेहरे पर चुनाव लड़ती आ रही है और अगला चुनाव भी ऐसे ही लड़ेगी. रावत ने कहा कि पंजाब में अमरिंदर सिंह को सीएम पद का उम्मीदवार घोषित किया गया तो पार्टी को फायदा हुआ. हरियाणा में भी भूपेंद्र सिंह हुड्डा का नाम आगे किया गया तो पार्टी चुनाव में बराबर की लड़ाई में आ गई. रावत के मुताबिक, ''पार्टी का चेहरा होने से असमंजस नहीं रहेगा और हमें फायदा होगा.''
रावत के विरोधी साल 2017 में उनके मुख्यमंत्री रहते पार्टी को मिली चुनावी हार समेत खुद उनके दो सीटों से हार जाने की ओर ध्यान दिला रहे हैं. लेकिन, रावत का कहना है कि 2017 में जब मोदी की आंधी चल रही थी तब भी पूरे देश में उत्तराखंड ऐसा राज्य था जहां कांग्रेस का वोट प्रतिशत नहीं गिरा, इसलिए जो दो-चार प्रतिशत वोट चुनाव जीतने के लिए आवश्यक होता है, कांग्रेस को उस पर फोकस करना चाहिए. रावत ने यह भी कहा कि अगर सीएम पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया गया तो भाजपा अपने संगठन और धनबल की बदौलत आगामी चुनाव में कांग्रेस पर भारी पड़ सकती है.
असल में रावत के अलावा फिलहाल कांग्रेस के पास राज्यक में व्यािपक जनाधार रखने वाला और कोई खांटी नेता नहीं है. लेकिन उनके विरोधी इस बात को हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं कि मुख्यमंत्री बनने के बाद रावत पार्टी के अन्यन वरिष्ठे नेताओं से पटरी नहीं बिठा पाए और उन लोगों ने पार्टी छोड़ दी. वैसे, पार्टी में उनकी अब एकमात्र प्रतिद्वंदी हृदयेश ही उनसे मोर्चा लेने को डटी रहती हैं. हृदयेश के अलावा अन्यट नेताओं को दूसरी पांत का नेता ही माना जाता है.
जाहिर है, रावत के इस दांव को पार्टी पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्साव माना जा रहा है. उनके इस तेवर के मूल में दो कारण अहम हैं. पहला यह कि अब वे उम्र के 72वें पड़ाव पर हैं, जहां साल 2022 के विधानसभा चुनाव उनके लिए सत्ता में वापसी का शायद आखिरी मौका हो सकता है. दूसरा कारण यह कि उन्हेंा लगता है, पिछले चार विधानसभा चुनावों की तरह राज्य में सत्ता में बदलाव की परंपरा को मतदाता 2022 में भी जारी रखेंगे, और यहां कांग्रेस को ही अगला मौका मिलेगा. इसी भरोसे की वजह से रावत अपनी मांग पर अड़े हैं, ताकि अगर वाकई एक बार फिर सत्ता वापसी होती है तो उसका श्रेय वे अपने सिर बांध सकें. लेकिन, जाहिर है यह राह इतनी आसान नहीं है.

