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बिहारः गठबंधन की ढीली पड़ती गांठ

अरुणाचल प्रदेश के जनता दल (यूनाइटेड) के छह विधायकों का दलबदल करवाकर अपनी पार्टी में ले आने के भाजपा के फैसले ने उसमें और नीतीश कुमार की पार्टी के बीच गहरे मतभेद पैदा कर दिए हैं

पिछले हफ्ते पटना में हुई जद (यू) की एक बैठक में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार रामचंद्र प्रसाद सिंह के साथ
पिछले हफ्ते पटना में हुई जद (यू) की एक बैठक में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार रामचंद्र प्रसाद सिंह के साथ
अपडेटेड 19 जनवरी , 2021

अमिताभ श्रीवास्तव

पटना में जनता दल (यूनाइटेड) के दफ्तर में 7 जनवरी को एक अहम शख्स पधारे. भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और पार्टी के बिहार प्रभारी भूपेंद्र यादव आधिकारिक तौर पर तो जद (यू) के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष रामचंद्र प्रसाद सिंह को बधाई देने आए थे, जिन्होंने 27 दिसंबर को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से अध्यक्ष का पदभार संभाला था, लेकिन उस मुलाकात के कई और मायने भी थे.

रामचंद्र ने कुछ दिन पहले ही जद (यू) को एक ऐसी पार्टी बताया था जो ''न तो धोखा देती है और न ही किसी के खिलाफ साजिश करती है''. इस टिप्पणी को अरुणाचल प्रदेश में 26 दिसंबर को जद (यू) के छह विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल कराने के भाजपा के कदम पर प्रतिक्रिया के रूप में देखा गया था. बताते हैं, इस घटना से बिहार में सत्तारूढ़ गठबंधन में गांठ पड़ गई है. यादव की यात्रा पुराने सहयोगी के साथ पैदा खटास को कम करने के भाजपा के प्रयासों का हिस्सा थी. राजस्थान से राज्यसभा सदस्य यादव को पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का पूरा विश्वास हासिल है. पिछले साल पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुशील मोदी को राज्यसभा में भेजे जाने के बाद वे बिहार में पार्टी के प्रमुख चेहरे के रूप में उभरे हैं.

यादव ने 7 जनवरी को नीतीश से भी मुलाकात की और बिहार मंत्रिमंडल के विस्तार पर चर्चा की. कैबिनेट में मुख्यमंत्री समेत 14 मंत्री हैं और 22 की जगह अभी खाली है. मंत्रिमंडल विस्तार के लिए नाम भेजने में भाजपा की ओर से विलंब और दिसंबर में भाजपा विधायक संजय पासवान के 'नीतीश को गृह मंत्रालय छोड़ देना चाहिए' वाले बयान से जद (यू) परेशान है. नाम न छापने की शर्त पर पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''संदेश साफ है. भाजपा इसलिए हमारी इतनी उपेक्षा नहीं कर सकती क्योंकि वह गठबंधन सरकार का समर्थन कर रही है.''

जद (यू) का पुनर्गठन

जद (यू) की बात करें तो 2022 में कार्यकाल पूरा होने से पहले ही पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद छोडऩे के नीतीश के फैसले को पार्टी के विस्तार का अहम जिम्मा रामचंद्र प्रसाद को सौंपकर पूरा ध्यान शासन पर केंद्रित करने के कदम के रूप में देखा जा रहा है. पिछले नवंबर में बिहार के चुनावी इतिहास में भाजपा पहली बार गठबंधन में जद (यू) से बड़ी साझेदार बनी. 243 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 74 सीटें जीतीं, जबकि जद (यू) केवल 43 सीटें जीत सकी जो 2015 में उसकी 71 सीटों से बहुत कम है. 2005 के बाद से यह उसका सबसे खराब प्रदर्शन है.

जद (यू) नेताओं की राय में नीतीश ने न केवल सही समय पर फैसला किया है बल्कि पार्टी अध्यक्ष के रूप में सटीक व्यक्ति चुना है. अरुणाचल प्रकरण से जद (यू)-भाजपा गठबंधन में खटास पडऩे के बाद नीतीश को एक ऐसे नेता की जरूरत महसूस हुई जो राज्य में तेजी से प्रभाव बढ़ा रही भाजपा की खड़ी की गई चुनौतियों से निबटने के लिए आक्रामक रूप से पार्टी का पुनर्निर्माण कर सके.

जद (यू) में गंभीर नाराजगी इस वजह से भी थी कि विधानसभा में स्पष्ट बहुमत होने के बावजूद भाजपा ने अरुणाचल के उसके विधायकों का पालाबदल कराया. जद (यू) के नेताओं का तर्क है कि केंद्रीय नेतृत्व की सहमति के बगैर तो भाजपा ने ऐसा किया नहीं होगा. जद (यू) के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''यह हालात को और दुर्भाग्यपूर्ण बनाता है. अगर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को विश्वास में लेकर हमारे विधायकों का दलबदल कराया गया है, तो इससे बिहार में सहयोगी दलों के बीच विश्वास में कमी आना स्वाभाविक है.''

रामचंद्र प्रसाद, हालांकि, नीतीश की तरह बड़े जननेता नहीं हैं पर ऐसे निर्णायक मोड़ पर जद (यू) की कमान संभालने के लिए उपयुक्त हैं. उन्हें सतर्क योजनाकार माना जाता है जो खामोशी के साथ काम करना पसंद करते हैं. वे पूर्व आइएएस अफसर हैं और नीतीश के प्रमुख सचिव रह चुके हैं. 2010 में उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली और जद (यू) से राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए. 2016 में उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजा गया. वे नीतीश के कान भी माने जाते हैं.

एक जद (यू) नेता का आकलन है, ''मुख्यमंत्री और जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में दोहरी भूमिका में नीतीश भाजपा नेताओं के साथ उतने प्रभावी ढंग से सख्ती नहीं दिखा सकते थे क्योंकि शासन के मामलों पर उन्हें सहयोगी दल के साथ समन्वय बनाना पड़ता है. राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में रामचंद्र प्रसाद कड़े तेवर दिखाने का काम करेंगे.'' पार्टी संगठन के सुधार को जारी रखते हुए 10 जनवरी को जद (यू) ने उमेश कुशवाहा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया. वे उम्र के चौथे दशक में हैं और उन्होंने 70 बसंत देख चुके बिहार की पार्टी इकाई प्रमुख बशिष्ठ नारायण सिंह की जगह ली है.

गठबंधन का दबाव

भाजपा और जद (यू) के बीच विधानसभा चुनावों के बीच ही खटपट शुरू हो गई थी. जद (यू) को लगता था कि सीटों के आवंटन पर सहमति न बनने के बाद आक्रामक हुए लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) प्रमुख चिराग पासवान ने नीतीश और उनकी पार्टी पर जो लगातार हमले किए, भाजपा ने उसे रोकने को पूरे मन से प्रयास नहीं किए. लोजपा ने अंतत: एनडीए से अलग स्वतंत्र रूप से बिहार चुनाव लड़ा. उसे जीत तो सिर्फ एक सीट पर मिली लेकिन जद (यू) के वोटों में सेंध लगाकर लोजपा ने कई सीटों पर उसकी हार पक्की कर दी. जद (यू) को भारी नुक्सान पहुंचाने वाली लोजपा राष्ट्रीय स्तर पर अब भी एनडीए में बनी हुई है और इस बात से भी भाजपा-जद (यू) का आपसी भरोसा डगमगा रहा है.

हालांकि विधानसभा में जद (यू) की ताकत कम हो गई है, लेकिन नीतीश अभी भी सत्ता के केंद्र बने हुए हैं. जहां भाजपा को राज्य के किसी भी अन्य प्रमुख दल से समर्थन मिलने की संभावना नहीं दिखती, वहीं विपक्षी खेमे में नीतीश की मदद करने वालों की कोई कमी नहीं है. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के प्रमुख तेजस्वी यादव ने जद (यू) के साथ गठबंधन की संभावना से इनकार किया है और नीतीश ने भी घोषणा की है कि एनडीए सरकार अपना कार्यकाल पूरा करेगी, लेकिन भाजपा अच्छी तरह से जानती है कि नीतीश के पास भाजपा को अलविदा कहकर भी सत्ता में बने रहने के विकल्प अभी खुले हैं.

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