scorecardresearch

किसान आंदोलनः कानून और अव्यवस्था

सरकार और किसानों के बीच गतिरोध को खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने की पहल. लेकिन किसान कृषि कानूनों को रद्द करने से कम पर किसी सूरत में मानने को तैयार नहीं.

नई उजास गाजीपुर बॉर्डर पर धरनारत किसान लोहड़ी पर नए कृषि कानूनों की प्रतियां जलाते हुए
नई उजास गाजीपुर बॉर्डर पर धरनारत किसान लोहड़ी पर नए कृषि कानूनों की प्रतियां जलाते हुए
अपडेटेड 19 जनवरी , 2021

इस साल राष्ट्रीय राजधानी में चिल्ला जाड़ा पड़ रहा है और इस बार की सर्दी पिछले 15 साल में सबसे कड़क है, लेकिन इससे किसान संगठनों और सरकार के बीच तारी तनाव की गरमी ठंडी नहीं पड़ी है. बहरहाल, 12 जनवरी को नाटकीय ढंग से हस्तक्षेप करते हुए सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबडे तथा ए.एस. बोपन्ना और वी. रामासुब्रह्मण्यम की पीठ ने नए कृषि कानून लागू किए जाने पर रोक लगा दी और किसान संगठनों की बात सुनने के लिए चार सदस्यों की एक विशेषज्ञ समिति गठित कर दी.

पर अगर उन्हें लगा कि इससे प्रदर्शनकारी किसानों को तसल्ली मिल जाएगी तो वे गलत थे. किसानों ने इस समिति के सामने पेश होने से इनकार करते हुए केंद्र के साथ बातचीत जारी रखने की बात कही. किसान संगठन नए किसान उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, 2020, मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा अधिनियम, 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020 पूरी तरह वापस लिए जाने की मांग पर अड़े हैं.

22 सितंबर से ही किसान संगठन लड़ाई के मोर्चे पर डटे हुए हैं जब संसद ने इन कानूनों को अपनी मंजूरी दी थी. संगठनों ने राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के हरियाणा से लगे टीकरी और सिंघु गांवों पर सरहद का रास्ता ब्लॉक कर दिया.

संयोग से पीठ इस कानून की संवैधानिकता पर नहीं बल्कि प्रदर्शन स्थलों से किसान संगठनों को हटाने से जुड़ी याचिका पर विचार कर रही थी. पर अगर अदालत, प्रदर्शनकारी किसानों में पैदा अविश्वास को कम करने की कोशिश कर रही थी, तो वह इसमें बुरी तरह नाकाम रही. अदालत के चुने चार विशेषज्ञ—कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी, पी.के. जोशी, किसान कार्यकर्ता भूपिंदर सिंह मान और अशोक घनवट—इन सभी ने नए कृषि कानूनों का समर्थन किया है, गुलाटी ने तो इसे कृषि के क्षेत्र में 1991-सा निर्णायक पल करार दिया है.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश की दो बिंदुओं पर आलोचना हो रही है. अव्वल तो जजों ने इसकी कोई वजह नहीं बताई कि वे नए कृषि कानून किस बिना पर स्थगित कर रहे हैं, खासकर जब इससे पहले ऐसे मामलों में न्यायपालिका ने कार्यपालिका और विधायी सत्ता के क्षेत्र में सीधे दखल न किया हो. फिर उसने यह पक्का नहीं किया कि चार सदस्यीय समिति सरकार और प्रदर्शनकारी किसानों दोनों को मंजूर हो.

12 जनवरी की शाम, भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू)-राजेवाल के मुखिया बलबीर सिंह राजेवाल और क्रांतिकारी किसान यूनियन के नेता दर्शन पाल ग्रेवाल जैसे नेताओं ने कहा कि ‘सदस्यों को बदल भी दिया जाए’ तो भी वे इस समिति से बात नहीं करेंगे; यह सरकार से दवाब हटाने और समाधान खोजने से भटकाने की चाल है. इस बीच आंदोलन तेज करने की योजना के तहत प्रदर्शनकारियों ने 13 जनवरी को नए कृषि कानूनों की प्रतियां जलाईं.

अब 18 जनवरी को महिला किसान दिवस के मौके पर महिलाओं का विरोध प्रदर्शन, 20 जनवरी को गुरु गोविंद सिंह और 23 जनवरी को सुभाषचंद्र बोस की जयंती पर दो अन्य प्रदर्शनों की योजना है. इसके बाद गणतंत्र दिवस पर महारैली के लिए करीब 5,000 ट्रैक्टर दिल्ली लाए जाएंगे. 29 जनवरी को संसद का बजट सत्र शुरू होने वाला है और इस मसले पर सरकार को घेरने के लिए विपक्ष तैयार बैठा है. और भाजपा के सांसदों की चिंता बजट सत्र के ठीक संचालन के लिए फ्लोर मैनेजमेंट की है.

जारी है गतिरोध
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने किसानों के विरोध के अधिकार को बरकरार रखा और उनसे प्रदर्शन के लिए राजधानी में रामलीला मैदान के इस्तेमाल के लिए दिल्ली पुलिस की अनुमति मांगने को कहा. किसान समूहों की एक बड़ी चिंता उनके बीच खालिस्तान और नक्सल-समर्थक समूहों की घुसपैठ का है. किसान नेताओं की पूरी कोशिशों के बावजूद जरनैल सिंह भिंडरावाले समेत खालिस्तानी उग्रवादियों के पोस्टर प्रदर्शन स्थल पर दिखने लगे और खालिस्तान समर्थक नारेबाजी की छिटपुट घटनाएं भी हुईं.

अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल का दावा है कि अमेरिका स्थित खालिस्तान समर्थक संगठन सिख्स फॉर जस्टिस के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शनों में घुसपैठ कर ली है और वे इस मसले पर खुफिया ब्यूरो की रिपोर्ट के साथ एक हलफनामा दाखिल कर रहे हैं.

सिख समुदाय की अब कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों में मजबूत उपस्थिति से भी हालात जटिल हो गए हैं. भारत से कूटनयिक दवाब के बावजूद कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने किसानों के प्रदर्शन से समर्थन वापस लेने से इंकार कर दिया. ओटावा में यह कोई हैरत की बात नहीं कि कुरसी पर उनका भविष्य न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थन पर टिका है.

जिसके मुखिया जगमीत सिंह धालीवाल का खालिस्तान पर नजरिया स्पष्ट है. इस बीच, 20 दिसंबर से केंद्रीय और हरियाणा, पंजाब की एजेंसियां विभिन्न संदेहास्पद जगहों पर छापे मार रही हैं जहां हिंसा को बढ़ाने के लिए विदेशी फंडिंग का शक हो रहा है.

भरोसे का संकट
सरकार के पक्ष में खड़े लोगों का कहना है कि सरकार के अधिकांश मांगें मानने की पेशकश के बाद भी किसान नए कानूनों को रद्द करने पर अड़े हैं. पर किसानों के प्रतिनिधि ध्यान दिलाते हैं कि यह आश्वासन कानून में लिखा नहीं है और यह नए कानूनों पर प्रभावी होगा, इसका कोई भरोसा नहीं. राजेवाल कहते हैं कि ये कानून समवर्ती सूची की एक गलत जमीन पर खड़े किए गए हैं जिनका मकसद विपणन और वाणिज्य है, कृषि नहीं.

संविधान की समवर्ती सूची में अनुच्छेद 7 के उपबंध 33 में केंद्र को खाद्य सामग्री समेत वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण पर कानून बनाने की अनुमति है. संविधान विशेषज्ञ और वरिष्ठ अधिवक्ता अनुपम गुप्ता कहते हैं कि केंद्र ने कृषि उत्पाद और कृषि विपणन में कर चोरी पकडऩे के लिए इसका उपयोग किया है, और गुप्ता के मुताबिक ये राज्य के विषय हैं.

बीकेयू के अलग हुए धड़े के अधिवक्ता एम.एल. शर्मा ने अपनी याचिका में कहा है कि संविधान के संशोधन अधिनियम, 1954 में खाद्य सामग्री पैदा करने, उसकी आपूर्ति और वितरण को समवर्ती सूची में रखा गया है और इसे गलत तरीके से पारित किया गया. वे तर्क देते हैं कि खाद्य सामग्री के उत्पादन को समवर्ती सूची में रखना असंवैधानिक है. 9 दिसंबर को किसानों को सरकार के अडिग रुख के बारे में समझाया गया, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उनसे साफ कहा कि नए कानून बनाने से पहले सारे कानूनी मशवरों को ध्यान में रखा गया था.

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर कहते हैं कि कई किसान समूहों ने कृषि कानूनों पर अपना समर्थन जाहिर किया है. वे बताते हैं, ''वे मुझसे मिले, अपना समर्थन पत्र दिया और वे प्रेस में अपना बयान भी देंगे. अगर किसानों के संगठन किसी उपबंध से नाखुश हैं तो हम उसे सुधारने, स्पष्ट करने या बदलने को तैयार हैं, लेकिन कानूनों को वापस लेना संभव नहीं है.’’

सियासी गुणा-गणित
पंजाब में अब चुनाव का समय आ रहा है, और इसकी शुरुआत 20 फरवरी को स्थानीय निकायों के चुनाव से होगी, फिर सिख संसद का चुनाव है जिसमें शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के 170 सदस्य निर्वाचित होंगे. अगले साल फरवरी में विधानसभा चुनाव होने हैं. हालांकि, देहाती किसान पारंपरिक रूप से शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) से जुड़े रहे हैं, लेकिन 2014 के बाद से उनका झुकाव धीरे-धीरे आप की तरफ हुआ और फिर वे कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुआई वाली कांग्रेस की तरफ मुड़ गए. अभी तक किसान संगठनों ने किसी सियासी पार्टी को मंच का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी है.

पर पंजाब में कांग्रेस, अकाली और आप के विधायक इस प्रदर्शन के लिए अपने कार्यकर्ता भेज रहे हैं. पंजाब में कई कैबिनेट मंत्री, और साथ ही कई वरिष्ठ अकाली नेता यह मानते हैं कि किसान आंदोलन ने राज्य में राजनैतिक फिजां बदल दी है. राजनैतिक विश्लषकों का मानना है कि आंदोलन ऐसे ही चलता रहा तो बड़े पैमाने पर वोटों का जनाधार इधर से उधर हो सकता है.

इस बीच, हरियाणा में, भाजपा की अगुआई वाली गठबंधन सरकार भी आंदोलन की तपिश महसूस करने लगी है. कृषि कानूनों पर अदालत के फैसले से उसे थोड़ी राहत मिली है. इसने आंदोलन को लेकर बगावत पर उतारू, गठबंधन की सहयोगी जननायक जनता पार्टी (जजपा) के 10 में से सात विधायकों को समझाने का एक मौका मुहैया करा दिया. प्रदर्शनकारी किसानों का समर्थन करने वालों में पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा नेता बीरेंद्र सिंह भी शामिल हैं.

मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर के नायब और जजपा नेता दुष्यंत चौटाला, बाढड़ा से विधायक उनकी मां नैना चौटाला और मंत्री अनूप धानक ही हैं जो सरकार की टेक का समर्थन कर रहे हैं पर फसलों पर एमएसपी को वे भी कानूनी जामा दिए जाने के पैरोकार हैं. खट्टर की अल्पमत सरकार से दो निर्दलीय विधायक बलराज कुंडू और सोमवीर सांगवान पहले ही समर्थन वापस ले चुके हैं. यह स्थिति खट्टर के लिए मुसीबतें पैदा कर सकती है, खासकर ऐसे समय में जब पूर्व मुक्चयमंत्री और कांग्रेस नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा जाटबहुल इलाकों में अपने वर्चस्व को फिर से स्थापित करने की फिराक में हैं.

—साथ में सुजीत ठाकुर

कोई उम्मीद नहीं दिखती
बातचीत के आठ दौर हो चुके हैं. सरकार की तरफ से कुछ रियायतों की बात हुई लेकिन कानून वापस लेने पर चर्चा तक से ही दूरी बनी हुई

पहला दौर, 14 अक्तबर: पंजाब के 31 किसान संगठन कृषि सचिव संजय अग्रवाल के साथ बातचीत की मेज से यह कहकर उठ गए कि वे बात करेंगे तो राजनैतिक नेतृत्व के साथ.

दूसरा दौर, 13 नवंबर: केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने कृषि कानूनों पर एक प्रेजेंटेशन दिया. किसानों ने उस पर अपनी आशंकाएं जाहिर कीं. किसान पंजाब में रेलवे पटरियों पर जारी विरोध प्रदर्शन समाप्त करने को राजी हुए.

तीसरा दौर, 1 दिसंबर: केंद्रीय मंत्री तोमर, पीयूष गोयल और सोम प्रकाश ने किसानों की आपत्तियों पर गौर करने के लिए पांच सदस्यीय समिति बनाने का प्रस्ताव रखा. बीकेयू के अलग हुए धड़े के नेता राकेश टिकैत, एआइकेएस और माकपा नेता हन्नान मुल्ला, मध्य प्रदेश के शिव कुमार और योगेंद्र यादव ने परामर्शों में बराबरी की मांग की. संगठनों ने मांगो की सूची बनाई: तीन कृषि कानूनों के अलावा दिल्ली-एनसीआर में वायु गुणवत्ता प्रबंधन पर नया लागू अध्यादेश और बिजली बिल 2020 की वापसी.

चौथा दौर, 5 दिसंबर: तोमर ने नए कानूनों पर प्रेजेंटेशन दिया, वादा किया कि उचित चिंताओं का समाधान होगा. संगठन कानून वापसी पर अड़े.

पांचवां दौर, 8 दिसंबर: गृहमंत्री अमित शाह सामने आए, कृषि कानूनों में अधिकतर कमियां मानी और एमएसपी पर लिखित आश्वासन और बिजली बिल और वायु प्रदूषण नियंत्रण अध्यादेश में सुधार समेत कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव रखा. किसानों ने प्रस्ताव ठुकराया, कहा कानून वापस लेना ही होगा

छठा दौर, 31 दिसंबर: केंद्र दो मांगों पर सहमत हुआ, पराली जलाने पर जुर्माना हटाने और बिजली बिल संशोधन पर रोक.

सातवां दौर, 4 जनवरी: तोमर कृषि कानूनों पर उपबंधों के हिसाब से चर्चा चाहते थे, किसान कानून हटाने पर अड़े.

आठवां दौर, 8 जनवरी: मंत्रियों ने कृषि कानून हटाने से इनकार किया, कहा किसान नेता इसे चुनौती देने सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं. किसान संगठनों ने कानून वापस लेने की मांग दोहराई, लेकिन 15 जनवरी को फिर बैठक के लिए माने.

‘‘कई किसान संगठनों ने अपनी सहमति की चिट्ठियां हमें दी हैं लेकिन इस मामले में सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसला देगा, हम उसे लागू करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.’’ 
नरेंद्र सिंह तोमर, केंद्रीय कृषि मंत्री

''सुप्रीम कोर्ट में दायर किए गए मामले में हम कहीं से कोई पार्टी नहीं हैं और न ही हम किसी कमेटी वगैरह के सामने पेश होने जा रहे. इन कानूनों को रद्द किया ही जाना चाहिए.’’ 
दर्शन सिंह राजेवाल, बीकेयू, राजेवाल

‘‘सिख्स फॉर जस्टिस जैसे खालिस्तान समर्थक समूह इन विरोध प्रदर्शनों में आ घुसे हैं. इस पर हम एक शपथपत्र के साथ खुफिया ब्यूरो (आइबी) की रिपोर्ट भी कोर्ट में पेश करने जा रहे हैं.’’ 
के.के. वेणुगोपाल, अटॉर्नी जनरल

क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट का आदेश
कृषि कानूनों को लागू करने पर रोक लगाई. प्रदर्शनकारी किसानों ने इसका स्वागत किया लेकिन वे कानून रद्द किए जाने पर अड़े.

किसान संगठनों की शिकायतें सुनने के लिए उसने चार सदस्यीय समिति बनाई और उससे दो महीने के भीतर अपनी रिपोर्ट देने को कहा.

अगले आदेश तक न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की व्यवस्था लागू रहेगी.

कृषि जोतें सुरक्षित रहेंगी; नए कृषि कानूनों के तहत उठाए गए किसी कदम के जरिए किसी भी किसान की जमीन छीनी नहीं जा सकेगी.

Advertisement
Advertisement