तलैवा के नाम से लोकप्रिय सुपरस्टार रजनीकांत 12 दिसंबर को 70 वर्ष के हो गए और शायद यह भांपकर कि समय बीता जा रहा है, उन्होंने घोषणा की कि नए साल की पूर्व संध्या पर वे तमिलनाडु के राजनैतिक मंच पर अपना बहुप्रतीक्षित आगाज करेंगे. विधानसभा चुनाव में बमुश्किल चार महीने शेष हैं लेकिन किसी फिल्म की रिलीज से पहले टीजर की तरह कई रहस्यमय ट्वीट में उन्होंने व्यापक बदलाव का वादा किया है.
''इट्स नाउ ऑर नेवर... वी विल चेंज एवरीथिंग (अभी नहीं तो कभी नहीं, हम सब कुछ बदल देंगे)'' हैशटैग के साथ उन्होंने ट्वीट किया, ''हम निश्चित रूप से विधानसभा चुनाव जीतेंगे और लोगों को भ्रष्टाचार-मुक्त, पारदर्शी, धर्मनिरपेक्ष और आध्यात्मिक राजनीति देंगे. एक चमत्कार और आश्चर्य यकीनन होकर रहेगा.'' लगभग तीन साल पहले जब उन्होंने रजनी मक्कल मंद्रम (आरएमएम) की घोषणा की थी, तबसे उनके प्रशंसक बेसब्री से इस बड़े दिन की प्रतीक्षा कर रहे थे. दरअसल, तलैवा ने पहले ही अपने प्रशंसकों को चुनाव बूथ कमेटियों में बांट दिया है, ताकि उनकी लोकप्रियता वोट में तब्दील हो सके.
तो, फिर इतना रहस्य क्यों? उन्हें पार्टी के ऐलान से क्या रोक रहा है, इस कदर कि प्रशंसकों की मांग के बावजूद अपनी पार्टी का नाम तक जाहिर नहीं किया. उन्होंने एनटीआर (एन.टी. रामराव) जैसा क्यों नहीं किया, जिन्होंने तेलुगु देशम पार्टी शुरू की और 1983 में सत्ता में धमाके के साथ पहुंच गए.
खैर, एक वजह तो यह है कि तमिलनाडु का माहौल अलग है. वहां द्रविड़ मुनेत्र कडगम (द्रमुक) और अखिल भारतीय द्रविड़ मुनेत्र कडगम (अन्नाद्रमुक) जैसे दलों ने मजबूती से अपनी पैठ बना रखी है और पांच दशकों से ये दल बारी-बारी सत्ता में रहे हैं. कद्दावर नेताओं के नेतृत्व में ये कैडर आधारित दलों के रूप में विकसित हुए हैं. लेकिन एम. करुणानिधि (द्रमुक) और जे. जयललिता (अन्नाद्रमुक) के निधन के बाद एक अवसर खुला है. फिर भी दोनों दलों के समर्पित कार्यकर्ताओं को देखते हुए अभी भी यह बड़ी चुनौती है.
और यह नहीं भूलना चाहिए कि पार्टी की नीतियों और कार्यक्रमों की बात तो दूर, रजनी ने अभी पार्टी के नाम तक की घोषणा नहीं की है. मेगास्टार रजनीकांत अपना हश्र, विजयकांत और उनकी पार्टी देसीय मुरपोक्कु द्रविड़ कडगम (डीएमडीके) जैसा नहीं होने देना चाहेंगे. डीएमडीके को अपने लॉन्च के एक साल बाद 2006 के विधानसभा चुनाव में 10 फीसद वोट मिले थे, लेकिन आज यह बिना किसी मजबूत आधार वाली छोटी-सी वोट कटवा पार्टी भर रह गई है.
रजनीकांत सिर्फ खेल बिगाड़ू बनकर संतुष्ट नहीं होंगे. राजनैतिक टिप्पणीकार, आरएसएस के विचारक और उनके मित्र एस. गुरुमूर्ति का मानना है कि वे राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकते हैं. भाजपा कई वर्षों से उन पर डोरे डाल रही है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों का समर्थन करने के बावजूद, रजनीकांत ने अपनी स्वतंत्र छवि बनाए रखी है. 2014 में मोदी के साथ उनकी एक मुलाकात से अटकलें उठी थीं, लेकिन वह हवा हो गई. भाजपा ने तब से ही उन्हें राज्य की राजनीति में सक्रिय करने के प्रयास तेज कर दिए लेकिन तलैवा ने कदम आगे नहीं बढ़ाए.
अतीत से यही संकेत मिलता है कि रजनी शायद आखिरी समय तक अपने पत्ते न खोलें. इसी अनिश्चितता के कारण केंद्रीय गृह मंत्री तथा भाजपा के मुख्य रणनीतिकार अमित शाह ने नवंबर के अंत में अपनी चेन्नै यात्रा के दौरान राज्य के नेताओं से कहा कि पार्टी को फिल्मी सितारों पर आश्रित नहीं होना चाहिए और अपनी विचारधारा के आधार पर राजनैतिक ताकत बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए. सूत्रों के मुताबिक, अन्नाद्रमुक और छोटे क्षेत्रीय दलों के साथ भाजपा के मौजूदा गठबंधन में यह रजामंदी बनी है कि अन्नाद्रमुक सबसे अधिक सीटों—लगभग 165—पर चुनाव लड़ेगी और 234 सीटों वाली विधानसभा के लिए शेष सीटों का बंटवारा भाजपा और अन्य क्षेत्रीय सहयोगी दलों के बीच होगा. बदले में, भाजपा को 2024 के लोकसभा चुनाव में राज्य की 39 सीटों में बड़ा हिस्सा मिलेगा.
जानकारों में इसको लेकर संदेह है कि तमिल राजनीति में रजनीकांत का कितना असर डाल पाएंगे. उनका कहना है कि वफादार फैन क्लब और ऐसे आम लोगों के बीच बड़ा फर्क है जो उन्हें राजनैतिक ताकत के रूप में नहीं देखते हैं. राजनैतिक टिप्पणीकार एन. सत्यमूर्ति कहते हैं, ''बेशक रजनीकांत राज्य की राजनीति में कुछ लहरें पैदा कर सकते हैं, लेकिन बड़े उलटफेर के लिए 30-35 फीसद वोटों की जरूरत होगी, जिसे हासिल करना फिलहाल तो असंभव-सा दिखता है. कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में उनकी पार्टी द्रविड़ गठबंधनों, खासकर अन्नाद्रमुक की हार का कारण बन सकती है.''
इसलिए, रजनीकांत को किसी एक द्रविड़ पार्टी के साथ मिलकर विजयी गठजोड़ का हिस्सा बनना होगा. उनकी भावी पार्टी के अन्नाद्रमुक-भाजपा गठबंधन के साथ हाथ मिलाने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा रहा है. अन्नाद्रमुक के नेता, उप-मुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम जैसे कुछ लोगों ने हाल के महीनों में भी इस तरह की संभावना का स्वागत किया है. लेकिन अभी तक यह साफ नहीं है कि रजनीकांत किसी प्रमुख द्रविड़ पार्टी के साथ जाना चाहेंगे या फिर कई छोटे क्षेत्रीय लोगों को एक साथ जोड़कर 'गठबंधन धर्म' निभाएंगे. भ्रष्टाचार को लेकर अपने सख्त रुख से भी उन्हें समझौता करना पड़ सकता है. अन्नाद्रमुक के नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण, उसके साथ कोई भी गठबंधन रजनीकांत की उस साख पर प्रश्नचिह्न लगा सकता है जो उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ मुखर होकर बनाई है.
मूर्ति कहते हैं, ''अगर रजनीकांत अन्नाद्रमुक और भाजपा के साथ हाथ मिलाते हैं तो बेशक इससे गठबंधन को बड़ी ताकत मिलेगी. लेकिन रजनीकांत अब तक राज्य में भ्रष्ट द्रविड़ पार्टियों को खत्म करने की बातें करते आए हैं और द्रविड़ पार्टी से गठबंधन करके वे अपनी विश्वसनीयता दांव पर लगा सकते हैं. वे अकेले भाजपा के साथ जाते हैं, तो जीतने के लिए द्रमुक और अन्नाद्रमुक नेताओं के खिलाफ टैक्स छापे और उन्हें अदालतों में घसीटने भर से काम नहीं चलेगा, और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है.'' मूर्ति याद दिलाते हैं, ''आरएमएम राजनैतिक आकांक्षाओं वाले युवा प्रशंसकों से बना है, लेकिन उसके पास राजनैतिक और चुनावी प्रबंधन कौशल का पूरी तरह अभाव है. भाजपा और आरएसएस के कार्यकर्ता रजनीकांत को बढ़त दिला सकते हैं.''
सुपरस्टार ने अपनी राजनीति के बारे में जो संकेत दिया है, वह आध्यात्मिकता की वकालत करता है और भ्रष्टाचार को लेकर बहुत सख्त है. मद्रास विश्वविद्यालय में राजनीति और सार्वजनिक प्रशासन विभाग के प्रमुख प्रो. रामू मणिवक्कन कहते हैं, ''हो सकता है कि कुछ बुजुर्ग नेता और कुछ हताश शख्सियतें खुद को सुर्खियों में रखने के लिए उनके साथ आ जाएं लेकिन यह संभव नहीं है कि वे द्रमुक या अन्नाद्रमुक के समर्पित वोटों में सेंध लगा सकें. उनके वोट बैंक को अब तक परखा नहीं गया है. उनकी 'आध्यात्मिक राजनीति' को इस कसौटी पर कसा जाएगा कि सभी धर्मों के लोगों को एक राजनैतिक विचारधारा के साथ जोड़कर रखने की उनकी संकल्पना दरअसल कैसी है, साथ-साथ अल्पसंख्यकों की उस पर कैसी प्रतिक्रिया रहती है.'' लेकिन अन्नाद्रमुक के चेन्नै के पूर्व महापौर सैदै दुरैसामी जैसों ने भी रजनीकांत के फैसले का स्वागत किया है.
भाजपा यह सोच कर चल रही है कि रजनीकांत भले अकेले चुनाव लड़ें और द्रविड़ पार्टियों का विरोध करने वालों का समर्थन हासिल करें, आगे चलकर भगवा पार्टी को ही इसका फायदा होगा और 2024 के लोकसभा चुनाव में वह इसका लाभ उठा सकेगी. मणिवक्कन कहते हैं, ''जब बात भाजपा के साथ राजनैतिक तालमेल की आती है तो रजनीकांत अपनी सोच कमल की पंखुड़ी पर पड़ी पानी की बूंदों की तरह रखते हैं, जो पास भी हैं और दूर भी. उनकी आध्यात्मिक राजनीति और भाजपा के सांप्रदायिक एजेंडे के बीच बहुत महीन अंतर है.

