अखिलेश पांडे
उत्तराखंड हाइकोर्ट के एक आदेश ने राज्य सरकार को असहज कर डाला. उसने भ्रष्टाचार से जुड़े एक आरोप में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ सीबीआइ जांच के आदेश दिए हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उसके आदेश पर स्टे लगा दिया. इसके बावजूद हाइकोर्ट के आदेश ने प्रदेश से लेकर दिल्ली तक राजनैतिक बवंडर उठ गया है. झूठी खबरें प्रकाशित कर सरकार को अस्थिर करने के आरोप में देहरादून की पुलिस ने डिफेंस कॉलोनी निवासी डॉ. हरेंद्र सिंह रावत की शिकायत पर जुलाई, 2020 में एक निजी चैनल के सीईओ उमेश कुमार शर्मा समेत चार लोगों पर मुकदमा दर्ज किया था.
मुकदमे में डॉ. हरेंद्र ने कहा था कि शर्मा ने सोशल मीडिया में खबर चलाई कि वे और उनकी पत्नी डॉ. सविता रावत के खाते में नोटबंदी के दौरान झारखंड के अमृतेश चौहान नामक व्यक्ति ने पैसे जमा किए और यह पैसे मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत को देने को कहा. आरोप लगाया गया था कि ये पैसे गो सेवा आयोग का अध्यक्ष बनाने के नाम पर बतौर घूस दिए गए. उस खबर की वीडियो में डॉ. सविता रावत को मुख्यमंत्री की पत्नी की सगी बहन बताया गया था. डॉ. हरेंद्र ने इन आरोपों को झूठा करार दिया था.
शर्मा फिर हाइकोर्ट चले गए. उनका कहना था कि भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने की वजह से उन्हें झूठे मामले में फंसाया जा रहा है. उन्होंने अपनी याचिका में मामले की जांच सीबीआइ से कराने और अपने ऊपर दर्ज प्राथमिकी निरस्त करने की मांग की थी.
हाइकोर्ट में न्यायमूर्ति रविंद्र मैठाणी की एकलपीठ ने 27 अक्तूबर को शर्मा के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमों को निरस्त करने का आदेश दिया. साथ ही शर्मा की याचिका में लगाए आरोपों के आधार पर सीबीआइ को एफआइआर दर्ज करने का आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि मुख्यमंत्री के खिलाफ लगे आरोपों को देखते हुए यह सही होगा कि सच सामने आए और यह राज्य-हित में होगा कि संदेहों का निवारण हो.
इस फैसले के सामने आते ही प्रदेश में राजनीति तेज हो गई. पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह और नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश ने संयुक्त रूप से प्रेस कॉन्फ्रेंस की. तीनों नेताओं ने मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग करते हुए राजभवन का दरवाजा खटखटाने की बात कही. हरीश रावत ने कहा कि वे इस मुद्दे पर राज्यपाल से मिलकर सीएम के इस्तीफे की मांग करेंगे.
हालांकि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने कहा कि वे न्यायालय के फैसले का सम्मान करते हैं और किसी भी एजेंसी से जांच के लिए तैयार हैं. पर भाजपा समेत सरकार भी इस फैसले से असहज दिखी. इस आदेश को त्रुटिपूर्ण बताते हुए सत्तारूढ़ भाजपा के मुख्य प्रवक्ता मुन्ना चौहान ने कहा कि वे हाइकोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं, लेकिन फैसले से संतुष्ट नहीं हैं. 29 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की विशेष अनुमति याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि इस मामले में मुख्यमंत्री पार्टी नहीं थे. सर्वोच्च अदालत ने हाइकोर्ट के आदेश पर स्थगनादेश लगाते हुए मुख्यमंत्री को राहत दे दी. लेकिन तब तक हाइकोर्ट के फैसले ने मुख्यमंत्री समेत उनकी पार्टी की भी किरकिरी करा दी.

