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बिहारः चिराग का हौसला

युवा पासवान क्षेत्रीय राजनीति में अपनी जगह बनाना चाहते हैं और नीतीश तथा जद (यू) के लिए लोजपा के हिस्से की सीटों को छोडऩे के लिए कतई तैयार नहीं.

मैं भी हूं यहां चिराग पासवान ने मोर्चा खोलने और अपनी मौजूदगी जताने का फैसला लिया
मैं भी हूं यहां चिराग पासवान ने मोर्चा खोलने और अपनी मौजूदगी जताने का फैसला लिया
अपडेटेड 30 सितंबर , 2020

अमिताभ श्रीवास्तव

पटना में 12 सितंबर को जाहिरा तौर पर सीटों के बंटवारे को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की मुलाकात हुई. इसके तीन दिन बाद लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के प्रमुख चिराग पासवान भी नड्डा के साथ 'देर रात बैठक’ के लिए नई दिल्ली में मिले. माना जा रहा है कि चिराग ने भाजपा अध्यक्ष से कहा कि लोजपा को उन सभी 42 सीटों पर चुनाव लडऩे दिया जाए जिन पर उसने 2015 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के तहत चुनाव लड़ा था.

लेकिन नीतीश कुमार का जनता दल (यूनाइटेड) यानी जद (यू) 2017 में राजग के पाले में लौट आया था. ऐसे में चिराग यह पक्का करना चाहते हैं कि 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा के आगामी चुनाव में जद (यू) को जगह देने के लिए उनकी पार्टी की सीटों में कतरब्योंत न की जाए. 

चिराग यहीं नहीं थमे और 20 सितंबर को उन्होंने लोजपा के कार्यकर्ताओं को एक चिट्ठी लिखी. इससे दो दिन पहले 18 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार में कई रेल परियोजनाओं का उद्घाटन करते वक्त नीतीश का अनुमोदन करते हुए कहा, ‘‘नीतीशजी जैसा सहयोगी हो तो क्या कुछ संभव नहीं है.’’ चिराग ने कार्यकर्ताओं को चिट्ठी में लिखा कि बिहार को जद (यू) के उस 'सात निश्चय’ कार्यक्रम के अनुसार चलाया जा रहा है जो 2015 में लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस के साथ महागठबंधन के तहत विकसित किया गया था.

यह भी कि चिराग राज्य में विकास के 'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ मॉडल पर काम कर रहे हैं. यह कार्यकर्ताओं से भावुक अपील थी, ऐसे वक्त जब उनके पिता और राज्य के सबसे बड़े दलित नेता रामविलास पासवान दिल्ली के अस्पताल में इंटेंसिव केयर में थे. वैसे, कहा यही गया कि वे 'रूटीन हेल्थ चेकअप’ लिए भर्ती हैं.

साफ है कि युवा पासवान अपने राज्य के विधानसभा चुनाव में छाप छोडऩे को उत्सुक हैं. जमुई से दो-बार के सांसद 38 वर्षीय चिराग का पूरा ध्यान अब अपने गृह राज्य पर है और वे राजद के तेजस्वी यादव के बरअक्स खुद को बिहार के सबसे प्रमुख युवा नेता के तौर पर उभारने में लगे हैं.

वे राज्य की नीतीश कुमार की सरकार के खिलाफ न केवल हमले करने लगे हैं बल्कि हाल में उनका स्वर ज्यादा तल्ख भी हो गया है, जिसने जद (यू) को जवाब देने के लिए मजबूर कर दिया. फरवरी में उन्होंने 'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट’ यात्रा आरंभ की थी जो कोरोना वायरस महामारी की वजह से उन्हें बीच में छोडऩी पड़ी.

लेकिन युवा पासवान में क्या वह ताब है जिसके बल पर वे अपने नामवर पिता की छाया से बाहर आ सकें और अपने दम पर अहम नेता बन सकें? राजनीति में उनका उत्थान अब तक अपने पिता और राज्य के मतदाताओं में 4.5 फीसद की हिस्सेदारी रखने वाले पासवान समुदाय की बदौलत हुआ है. भले ही लोकसभा में लोजपा के छह सांसद और उनके पिता केंद्रीय मंत्री हों, पर बिहार में पार्टी के महज दो विधायक हैं. अपने हिस्से के लिए मोल-तोल करते हुए क्या वे अपनी ताकत से बढ़कर हाथ-पैर मार रहे हैं?

हड़बड़ी में नौजवान
शुरुआत में करियर के रूप में चिराग ने बॉलीवुड को चुना था. बुंदेलखंड विश्वविद्यालय से कंप्यूटर साइंस में ग्रेजुएट चिराग ने 2011 में मिले ना मिले हम फिल्म से रुपहले परदे पर पदार्पण किया था. वह फिल्म डूब गई तो वे राजनीति में आ गए. रामविलास पासवान 2014 में नरेंद्र मोदी के खेमे में शामिल होने के पार्टी के फैसले का श्रेय चिराग की सूझ-बूझ को देते हैं. इसकी वजह से लोजपा ने 2014 के चुनाव में लोकसभा में अपनी सबसे ज्यादा सीटें जीतीं, वहीं 2009 में उसका सूपड़ा साफ था. खुद चिराग ने भी 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव जीते.

अलबत्ता, अपने पिता के उलट चिराग अपनी सीमित उपलब्धियों से संतुष्ट होने के लिए तैयार नहीं हैं. वे अपने पिता से ज्यादा महत्वाकांक्षी हैं. उनके पिता अपना पहला विधानसभा चुनाव, लालू या नीतीश से बहुत पहले, 1969 में ही जीतने के बावजूद कभी खुद को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर पेश नहीं कर पाए.

इसके बजाए उन्होंने राजनैतिक हवा का रुख भांप लेने की अपनी हैरतअंगेज महारत पर भरोसा किया और छह प्रधामंत्रियों के मातहत केंद्रीय मंत्री रहे. सुलह-शांति के उनके रवैये की बदौलत विभिन्न पार्टियों और खेमों में उनके शानदार रिश्ते रहे और इसके बल पर वे निर्विघ्न पाला बदलते रहे. राजग और संप्रग (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन), दोनों में ही उनका स्वागत किया जाता रहा.

दूसरी तरफ, चिराग टकराव के लिए तैयार रहते हैं. इसकी झलक उस लड़ाकूपन से भी मिलती है जो उन्होंने लोजपा के कार्यकर्ताओं की रग-रग में उतार दिया है. जो मिल गया उसे खामोशी से स्वीकार कर लेने के बजाए वे अपने हक के लिए लड़ने को भी तैयार हैं. यही वजह है कि आगामी चुनाव में अपनी पार्टी की सीटों की संख्या को लेकर वे अपनी बात पर मजबूती से डटे हैं. लेकिन हर कोई यह सवाल पूछ रहा है: चिराग जो मांग रहे हैं क्या वे उसके हकदार हैं?

लोजपा का स्कोरकार्ड
पिछले तीन विधानसभा चुनावों में लोजपा के रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है कि वे शेखी बघार सके. 2010 में पार्टी ने राजद के साथ गठबंधन में 75 सीटों पर चुनाव लड़ा, मगर जीती केवल तीन सीटें. 6.7 फीसद वोट हासिल करने के बावजूद उसने कुल जितनी सीटें लड़ीं उनमें से 26, यानी एक तिहाई से ज्यादा, सीटों पर जमानत गंवाई.

पांच साल बाद 2015 में लोजपा ने भाजपा के साथ जुड़कर 42 सीटों पर उम्मीदवार उतारे. इस बार भी वह महज 2 सीट जीत सकी. उसकी वोट हिस्सेदारी भी 4.8 फीसद हो गई. अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित 38 सीटों में से एक भी लोजपा नहीं जीत सकी, जबकि राजद ने 14, जद (यू) ने 10 और कांग्रेस तथा भाजपा ने 5-5 सीटें जीतीं. आखिरी बार लोजपा ने 2005 के विधानसभा चुनाव में कुछ अच्छा प्रदर्शन किया था.

उसमें वह 178 सीटों पर लड़ी और 12.6 फीसद वोटों के साथ 29 सीटें जीतीं. पर उस वक्त संप्रग-1 सरकार में मंत्री रामविलास पासवान ने किसी को समर्थन देने से मना करके विधानसभा भंग करने को मजबूर कर दिया. उसी साल अक्तूबर में फिर चुनाव हुए तो लोजपा की सीटें घटकर 10 हो गईं. फिर हैरानी क्या कि पार्टी लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन दिखाना ज्यादा पसंद करती है. 2014 के लोकसभा चुनाव में छह सीटें और 2019 में भी ऐसा ही प्रदर्शन ज्यादा प्रशंसनीय नजर आता है.

जद (यू) के एक बड़े नेता कहते हैं, ‘‘फरवरी 2005 के चुनाव में त्रिशंकू नतीजा देने के बाद बिहार के मतदाताओं ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों में हमेशा निर्णायक फैसला दिया है. उन्होंने दो मजबूत शक्चिसयतों—विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार और लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी—का समर्थन किया है.’’ लोकसभा में लोजपा को जो कामयाबियां मिलीं, वे मोदी लहर पर सवार होने की वजह से मिलीं.

साल 2009 में पार्टी ने लालू के साथ गठबंधन किया था और लोकसभा की एक भी सीट नहीं जीत सकी थी. वहीं विधानसभा चुनावों में लोजपा इसलिए कभी जीत नहीं सकी क्योंकि वह हमेशा नीतीश विरोधी खेमे में रही, जबकि 2005 से ही राज्य के चुनावी अफसाने में नीतीश का बोलबाला रहा है. जद (यू) के नेता कहते हैं, ''अगर वे नीतीश के साथ होते तो विधानसभा चुनाव में भी उनका मुकद्दर अलहदा होता.’’

बिहार में दलित समीकरण
बिहार के मतदाताओं में अनुसूचित जातियों का हिस्सा 16 फीसद है. यह राज्य के सबसे बड़े जाति समूह यादवों से ज्यादा है जो 14 फीसद हैं. अलबत्ता, जैसा कि बिहार में जाति और चुनावी राजनीति पर राजनीति की जाति नामक पुस्तक लिखने वाले बीरेंद्र यादव बताते हैं, राज्य में अनुसूचित जातियों में आने वाली 22 उप-जातियां एकजुट होकर वोट नहीं डालतीं.

रामविलास पासवान को राज्य का सबसे बड़ा दलित नेता माना जाता है, पर उनका प्रभाव पासवान समुदाय तक सीमित है. पासवानों की तरह रविदास समुदाय भी राज्य के मतदाताओं का 4.5 फीसद है, पर इसकी वैसी सियासी मौजूदगी नहीं रही है. बाकी 7 फीसद वोट अन्य जातियों में बंटे हैं. इनमें मुसहर भी शामिल हैं जो पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी का समर्थन करते हैं.

नीतीश ने बीते वर्षों में ईबीसी (अत्यंत पिछड़ी वर्ग) और महादलितों के बीच अपना अहम आधार तैयार किया है. उन्होंने लालू के शुरुआती दबदबे वाले मंडल आधार से ईबीसी को और रामविलास पासवान के दबदबे वाले दलित आधार से महादलितों को तोड़ा. आवास, लोककार्य, खाद्य, शिक्षा और वित्तीय सहायता की योजनाएं शुरू करने के लिए उन्होंने 2007 में महादलित आयोग का गठन किया.

महादलित में शुरुआत में केवल 18 जातियां शामिल की गई थीं, बाद में नीतीश ने इसका दायरा बढ़ाकर पासवान सहित सभी 22 जातियों को शामिल कर लिया. यह कोशिश रंग लाई. आज 30 फीसद ईसीबी और 16 फीसद महादलितों को जद (यू) अपनी ताकत का मूल केंद्र मानती है. अब जब चिराग अपनी ताकत जता रहे हैं, जद (यू) ने जरा देर नहीं की और दलित नेता मांझी और उनकी हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा पार्टी को अपने पाले में ले आई.

चिराग के इस दावे को कोई गंभीरता से नहीं ले रहा कि उनकी पार्टी ने 143 उक्वमीदवारों की सूची तैयार कर ली है. इसके जरिए वे अकेले अपने दम पर चुनाव में उतरने का संकेत दे रहे थे. सीटों के बंटवारे पर कोई समझौता फिलहाल अधर में है, लेकिन जद (यू) के सूत्र कहते हैं कि वह केवल आधी सीटों पर चुनाव लडऩे के सुझाव को मान सकती है. वे यह भी कहते हैं, ''लेकिन भाजपा को अपने हिस्से में से लोजपा को सीटें देनी होंगी, जबकि मांझी और उनकी टीम का क्चयाल जद (यू) रख लेगा.’’

पीठ पीछे भाजपा?
बिहार में सरकार राजग की है और भाजपा के सुशील मोदी उपमुख्यमंत्री हैं, पर चिराग ने हमले के लिए नीतीश कुमार को ही चुना. वे भाजपा की तो तारीफ करते हैं और कहते हैं कि वह जो भी फैसला करेगी वे मानेंगे. जद (यू) का कोई भी नेता खुलकर सामने आने को राजी नहीं है, लेकिन उनमें से कई नीतीश कुमार के खिलाफ चिराग के हमलों के पीछे भाजपा का हाथ देखते हैं. केंद्र या राज्य का कोई भी भाजपा नेता चिराग के हमलों के खिलाफ नीतीश कुमार के बचाव में आगे नहीं आया.

इससे सियासी हलकों में इस बात को बल मिला कि भाजपा का एक तबका गठबंधन में जद (यू) को ताकतवर हिस्सेदार बनने से रोकने के लिए चिराग को बढ़ावा दे रहा है. नाम न छापने की शर्त पर जद (यू) के एक नेता ने कहा, ''इससे चीजें साफ हो जाती हैं. भाजपा में एक तबका जरूर है जो चिराग के जुबानी हमलों का समर्थन कर रहा है और ये हमले वे केवल सीटों के बंटवारे में ज्यादा बड़े हिस्से की मांग के लिए ही नहीं बल्कि नीतीश सरकार को बदनाम करने के लिए भी कर रहे हैं.’’

राज्य में राजग के घटकों के बीच सीटों के बंटवारे का ऐलान अक्तूबर के पहले हक्रते तक होने की संभावना है. सारे हालिया हो-हल्ले के बावजूद, संभावना यही है कि राजनैतिक तकाजे के मुताबिक, लोजपा और जद (यू) दोनों राजग के छत्र तले ही आगामी विधानसभा चुनाव लड़ेंगे. यह अलग बात है कि जब वे ऐसा करेंगे, बिहार में दोनों के बीच कोई प्रेम बचा नहीं रह गया होगा.

यह पार्टी साल 2000 में अस्तित्व में आई, जब इसके संस्थापक रामविलास पासवान, नीतीश कुमार के जद (यू) से अलग हो गए

 फरवरी, 2005 के विधानसभा चुनावों में लोजपा को 29 सीटें मिलीं, तब संप्रग-1 में मंत्री रामविलास पासवान ने किसी को समर्थन देने से मना कर दिया, जिससे विधानसभा भंग हो गई. उसके बाद के चुनाव में इसे सिर्फ 10 सीटें मिलीं

 साल 2005 के त्रिशंकु नतीजे के बाद से बिहार के वोटरों ने निर्णायक तौर पर दो शख्सियतों के पक्ष में वोट दिया है— विधानसभा चुनावों में नीतीश और लोकसभा चुनावों में मोदी 

 इस तरह लोजपा ने राज्य के चुनावों में नीतीश के खिलाफ बहुत खराब प्रदर्शन किया है, जबकि मोदी लहर पर सवार होकर लोकसभा चुनावों में बढिय़ा प्रदर्शन किया है

चुनावी मिलाप   
हिंदुस्तान अवाम मोर्चा के मुसहर नेता जीतन राम मांझी के साथ नीतीश कुमार
बिहार का दलित समीकरण
 बिहार में कुल वोटरों में अनुसूचित जाति (एससी) 16 फीसद हैं. राज्य की कुल 243 विधानसभा सीटों में से 38 एससी के लिए आरक्षित हैं 

 यहां एससी वर्ग के तहत २२ उप-जातियां हैं, पर वे अलग-अलग तरीके से वोट करती हैं, इसलिए 14 फीसद हिस्सेदारी वाले यादव जाति की तरह वे ताकतवर मतदाता समूह नहीं हैं

 जहां 4.5 फीसद पासवान में अधिकतर लोजपा समर्थक हैं, अन्य एससी समूह की अलग-अलग निष्ठा है. ऐसे में 2015 में लोजपा एक भी एससी आरक्षित सीट नहीं जीत सकी जबकि राजद 14, जद (यू) 10 और कांग्रेस व भाजपा पांच-पांच सीट जीते

 नीतीश ने लालू के मंडल समूह से ईबीसी और रामविलास के प्रभाव से महादलितों को खींचा. कल्याण योजनाओं ने नीतीश के समर्पित समर्थक तैयार किए और दलितों में भी लोकप्रिय गैर-दलित नेता बनाया

 चिराग दावा जता रहे हैं तो जद (यू) ने भी जीतन राम मांझी को साधने में देर नहीं की

• वहीं दलित नेता श्याम रजक जद (यू) से राजद में आ गए हैं

— अमिताभ श्रीवास्तव

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