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आइपीओः लॉटरी तो नहीं

ऐसे समय में जब अर्थव्यवस्था संकट में घिरी है और शेयर बाजार में भरोसे की कमी है तब चुनिंदा कंपनियों के आइपीओ में बन रहे हैं कमाई के मौके

आइपीओ
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अपडेटेड 30 सितंबर , 2020

मौजूदा वित्त वर्ष में आर्थिक विकास दर के नकारात्मक रहने के अनुमान और शेयर बाजार में मची उथल-पुथल के बीच दिल्ली के करोल बाग निवासी, 40 वर्षीय गिरीश कुमार ने अपने वित्तीय सलाहकार को फोन लगाया. हालात के व्यावहारिक आकलन के बाद उन्होंने सवाल दागा: ''कोरोना कब जाएगा, अर्थव्यवस्था में चीजें कब तक पटरी पर आएंगी, कुछ तय नहीं. बाजार का भी भरोसा नहीं, कब तक टिका है. क्या कहते हैं, म्युचुअल फंड से पैसा निकाल लिया जाए?''  


सवाल इसलिए भी था क्योंकि तेज गिरावट के बाद बीते छह महीने में शेयर बाजार में हुई वापसी ने गिरीश के म्युचुअल फंड पर रिटर्न बेहतर कर दिए थे. मुंबई में बैठे उनके फाइनेंशियल प्लानर ने सुझाया कि म्युचुअल फंड से पैसा निकालिए और उसे बाजार में आए हुए कुछेक आइपीओ (आरंभिक सार्वजनिक निर्गम) में लगाइए. लिस्टिंग के दिन मोटे प्रीमियम पर निकल जाइए. छोटी अवधि में अच्छे रिटर्न का इस समय यह बेहतर तरीका है.

 
इस सलाह पर इन दिनों गिरीश ही नहीं बल्कि लाखों निवेशक अमल कर रहे हैं. यही कारण है कि बाजार में बीते हफ्ते आए तीनों आइपीओ को उस समय निवेशकों ने हाथोहाथ लिया जब बाजार में गिरावट थी और म्युचुअल फंड्स बिकवाली कर रहे थे. 21 से 23 सितंबर के बीच तीन कारोबारी सत्रों में सेंसेक्स 1,176 अंक टूटा और इन्हीं तीन सत्रों में कैम्स के आइपीओ को 47 गुना ज्यादा और कैमकॉन के आइपीओ को 12.65 गुना ज्यादा बोलियां मिलीं. एंजेल ब्रोकिंग का आइपीओ भी दूसरे ही दिन पूरा सब्स्क्राइब हो गया. यानी कंपनी बाजार से जो 600 करोड़ रु. जुटाना चाहती थी उसके लिए निवेशकों की बोलियां मिल गईं. म्युचुअल फंड्स शेयर बाजार में जून से लगातार बिकवाली कर रहे हैं. पहली जून से 16 सितंबर तक म्युचुअल फंड्स की ओर से 25,000 करोड़ रु. से ज्यादा की बिकवाली की जा चुकी है.

फटाफट कमाई का चक्कर
म्युचुअल फंड्स से मुनाफावसूली और आइपीओ को अच्छा रिस्पॉन्स, इस अंतर्विरोध को समझाते हुए शेयर बाजार और आइपीओ विशेषज्ञ अरुण केजरीवाल कहते हैं, इस साल जुलाई से अब तक आए तीनों आइपीओ को देखिए (देखें ग्राफिक्स): वे 70 से 123 फीसदी के प्रीमियम (शेयरों के आवंटन मूल्य से ज्यादा) पर बाजार में सूचीबद्ध हुए. बाजार में आइपीओ के लिस्ट होते ही मुनाफावसूली करनी है तो अधिकतम आठ दिन के लिए निवेशकों की पूंजी लगती है. ''ऐसे वक्त में जब अनिश्चिताओं भरा माहौल हो और आठ दिन में निवेशकों की पूंजी बढ़कर लौटने की उम्मीद हो तो कौन पैसा नहीं लगाएगा?''


केजरीवाल तर्क को आगे बढ़ाते हुए बताते हैं कि हाल ही आए तीनों आइपीओ जिस दिन बाजार में सूचीबद्ध हुए उसी दिन जितने शेयर बेचे जा सकते थे, उनमें से 90 फीसद से ज्यादा शेयरों में बिकवाली हुई. रोजारी बायोटेक के 92 प्रतिशत, हैपिएस्ट माइंड के 93 प्रतिशत और रूट मोबाइल के 98 प्रतिशत शेयरों में मुनाफावसूली हुई. मतलब: केवल खुदार निवेशकों ने ही नहीं बल्कि मोटी पूंजी वाले और बड़े तथा संस्थागत निवेशकों ने भी मुनाफा वसूला. गौरतलब है कि आइपीओ में एंकर निवेशकों के लिए 30 दिन का लॉक-इन पीरियड होता है, यानी वे 30 दिन तक शेयरों की बिकवाली नहीं कर सकते. एंकर निवेशक वे संस्थागत निवेशक होते हैं जो आइपीओ में 10 करोड़ रु. से ज्यादा का निवेश करते हैं और दूसरे निवेशकों को भी लाते हैं.


गिनी चुनी कंपनियां ही बाजार में
साल 2020 (जनवरी से दिसंबर) की पहली छमाही में केवल एक एसबीआइ कार्ड का आइपीओ बाजार में आया. आइपीओ के लिहाज से यह बीते एक दशक की सबसे खराब छमाही साबित हुई. प्राइम डेटाबेस के प्रबंध निदेशक प्रणव हल्दिया कहते हैं, ''इस साल बाजार में जिन कंपनियों के आइपीओ आए वे ऐसे व्यापार से जुड़ी कंपनियां हैं जिनपर कोविड 19 के कारण लगे लॉकडाउन का खास असर नहीं पड़ा.'' आगे भी यह ट्रेंड जारी रह सकता है. बजाज एनर्जी, होम फर्स्ट फाइनेंस, श्रीराम प्रॉपर्टीज, सामही होटल्स, पुराणिक बिल्डर्स, बर्गर किंग, यूटीआइ एएमसी समेत 28 ऐसी कंपनियां हैं जिनके आइपीओ की मंजूरी है. लेकिन एक के बाद एक आइपीओ बाजार में आएंगे, इस पर गहरा अंदेशा है.


प्रणव समझाते हैं, ''प्राइमरी मार्केट (आइपीओ बाजार) को दिशा सेकेंडरी मार्केट (शेयर बाजार) से ही मिलती है. जब तक कोविड-19 की भरोसेमंद वैक्सीन या दवा बाजार में नहीं आ जाती, अनिश्चितता बनी रहेगी. निवेशकों का भरोसा अर्थव्यवस्था और बाजार में नहीं होगा.'' बाजार में उतार-चढ़ाव बना रहेगा और यह आइपीओ के लिहाज से अच्छा माहौल नहीं माना जाता. इसके अलावा कोविड का असर खत्म होने तक कई व्यापार ऐसे हैं जिनमें पूरी तरह वापसी मुश्किल है.


वे पुराणिक बिल्डर्स की मिसाल देते हैं, ''अभी रियल एस्टेट सेक्टर के जैसे हालात हैं, ऐसे में कंपनी आइपीओ शायद ही लाए. आया भी तो उसे अच्छा रिस्पॉन्स मिलेगा, कहना मुश्किल है.'' मोटी बात यही कि अभी वही कंपनियां बाजार में आइपीओ ला सकती हैं जो लॉकडाउन से कम प्रभावित हुईं और जिनके व्यापार को लॉकडाउन से बढ़ावा मिला. जैसे ऑनलाइन सर्विस आदि. प्रणव की मानें तो आइपीओ बाजार में रौनक लौटने में अभी लंबा वक्त लगेगा. और शेयर बाजार में किसी भी कारण बड़ा उतार-चढ़ाव आया तो जो कंपनियां आइपीओ लाने की तैयारी कर रही हैं वे पीछे हटते नहीं हिचकिचाएंगी. आइपीओ बाजार में जल्द किसी तेजी की भी उम्मीद नहीं. इसका संकेत आइपीओ लाने के लिए सेबी के पास आई चार ही कंपनियों की अर्जी से भी लगाया जा सकता है.

बाजार की तेजी का ईंधन
अर्थव्यवस्था में वापसी के संकेत भले अभी न मिले हों लेकिन शेयर बाजार के प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स और निफ्टी में जबरदस्त वापसी देखने को मिली. अर्थव्यवस्था का आईना कहे जाने वाले शेयर बाजार की हालिया तेजी पर एस्कॉर्ट्स सिक्योरिटीज के हेड रिसर्च आसिफ इकबाल कहते हैं, ''बाजार की तेजी का एक मात्र कारण नकदी है और यह पैसा भी पूरे बाजार में निवेश न होकर निफ्टी की चुनिंदा कंपनियों में लग रहा है.'' यही कारण है कि सेंसेक्स और निफ्टी भले बीते छह महीनों में निचले स्तर से 30 फीसद वापसी कर चुके हों लेकिन छोटे और मझौले शेयरों में यह तेजी नहीं दिखती.


अपनी बात को समझाते हुए आसिफ कहते हैं, ''रोजगार, मांग, औद्योगिक उत्पादन किसी भी आंकड़े को देखिए अर्थव्यवस्था में साफ मंदी के संकेत दिखाई देते हैं. लेकिन इसके बाद भी विदेशों से आ रही सस्ती पूंजी के बल पर शेयर बाजार चढ़ रहे हैं. विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफपीआइ) ने अगस्त के महीने में कुल 37,846 करोड़ रुपए की शुद्ध खरीदारी की. अप्रैल से अब तक एफपीआइ भारतीय बाजारों में लगातार खरीदार बने हुए हैं. सितंबर महीने की 22 तारीख तक विदेशी निवेशकों की ओर से 3,889 करोड़ रुपए की खरीदारी की जा चुकी है. आसिफ कहते हैं, ''बाजार में चौतरफा खरीदारी तभी दिखेगी जब वाकई अर्थव्यवस्था में वापसी के संकेत मिलने लगेंगे और इसमें अभी लंबा वक्त लगेगा.''

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