अकेले नोएडा में इस साल जनवरी से अगस्त तक आत्महत्या के 195 मामले सामने आए जिनमें से 70 फीसद से ज्यादा कोरोना लॉकडाउन के दौर के हैं. हिमाचल प्रदेश में सितंबर के पहले हफ्ते में शुरू हुए विधानसभा सत्र में विपक्ष के नेता मुकेश अग्निहोत्री ने बताया कि कोरोना लॉकडाउन के दौरान राज्य में आत्महत्या की 600 घटनाएं हुईं.
ऑक्सफोर्ड की तरफ से इस साल 30 जून को प्रकाशित शोध द इम्पैक्ट ऑफ कोविड-19 पैंडेमिक ऑन सुइसाइड रेट्स में कहा गया है कि आर्थिक अनिश्चितताएं आत्महत्या की दर को बढ़ा देती हैं. दुनिया में जब-जब महामारी और आर्थिक संकट आए हैं आत्महत्या की दर बढ़ गई है. 2003 में सार्स की वजह से हांगकांग में 65 साल से ऊपर के लोगों में मनोवैज्ञानिक कारणों से आत्महत्या की दर बढ़ गई थी.
कोविड के चलते हुए लॉकडाउन से देश में आर्थिक गतिविधियां ठप हो गई हैं और लोगों का रोजगार चला गया है. विशेषज्ञ कहते हैं कि समाज से कटना और आर्थिक अनिश्चितता निराशा को बढ़ाते हैं. 2020 में कितने लोगों ने आत्महत्या की इसके आंकड़े तो अभी नहीं आए हैं पर 2019 के आंकड़े नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो ने हाल ही में जारी किए हैं.
भारत में हर साल सवा लाख से ज्यादा लोग आत्महत्या करते हैं और उनकी आर्थिक-सामाजिक-शैक्षणिक पृष्ठभूमि से आत्महत्या की वजह समझी जा सकती है. खेती से जुड़े 10,281 लोगों ने साल 2019 में खुदकुशी की. पर हैरानी की बात ये है कि इनमें बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तराखंड, मणिपुर, दिल्ली का एक भी शख्स न था.
दैनिक औसत निकालें तो 2019 में रोज 381 लोगों ने खुदकुशी की. मौजूदा हालात को देखते हुए यह साल और खराब आंकड़ों की ओर इशारा करता है.

