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कुपोषणः अंडे का चुनावी फंडा

मध्य प्रदेश की महिला और बाल विकास मंत्री इमरती देवी आगामी उपचुनावों से पहले इसे 'दलित बनाम शेष' मुद्दा बनाने में सक्षम होती हैं तो इससे उन्हें और भाजपा को फायदा होगा

पोषण पाने का अधिकार रांची में एक सरकारी स्कूल में मिड डे मील के तहत बच्चों को अंडे परोसे गए
पोषण पाने का अधिकार रांची में एक सरकारी स्कूल में मिड डे मील के तहत बच्चों को अंडे परोसे गए
अपडेटेड 17 सितंबर , 2020

सितंबर की शुरुआत में मध्य प्रदेश की महिला और बाल विकास मंत्री इमरती देवी कि इस घोषणा ने कि वे सरकारी स्कूलों में संचालित दोपहर का भोजन योजना और एकीकृत बाल विकास योजना के तहत चलने वाली आंगनवाड़ियों में (स्थानीय शिशु देखभाल केंद्र) में अंडे दिए जाने के पक्ष में हैं, एक नई बहस को जन्म दे दिया है. इस पोषक तत्व के लाभार्थियों में छह वर्ष से कम उम्र के बच्चे और छह महीने तक के बच्चों को स्तनपान कराने वाली माताएं शामिल हैं. कुपोषण की समस्या से बुरी तरह प्रभावित एक राज्य में अगर इस फैसले को स्वास्थ्य समस्या से लड़ने के कदम के तौर पर देखा जाए तो यह अच्छा हस्तक्षेप ही कहा जाएगा लेकिन इसके राजनैतिक संदर्भ और निहितार्थ भी हैं. देश की अधिकांश भाजपा सरकारों (असम, उत्तराखंड और कर्नाटक को छोड़कर, मानचित्र देखें: अंडे की सियासत) की ओर से शाकाहार पर जोर के अलावा एक और वजह है जिसके कारण इमरती देवी की घोषणा चर्चा में है. वह कारण है—जिन 27 विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव होने हैं, उनमें मंत्री का अपना निर्वाचन क्षेत्र भी शामिल है.


सिर्फ यह बात मामले को अधिक पेचीदा नहीं बनाती कि इमरती देवी का रुख उनकी वर्तमान पार्टी की सोच से इतर है, बल्कि मंत्री का हालिया राजनैतिक इतिहास भी इसमें तड़का लगा देता है. इमरती देवी पिछली कमलनाथ सरकार में भी मंत्री रह चुकी हैं और नई सरकार में भी उनके पास वही मंत्रालय है जो पहले था. वे ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रति निष्ठावान हैं और मार्च में उन्होंने सिंधिया के साथ भाजपा की सदस्यता ले ली थी. हालांकि कमलनाथ सरकार ने वित्त वर्ष 2020 की शुरुआत से राज्य के 89 आदिवासी विकास खंडों की आंगनवाड़ी में दिए जाने वाले आहार में अंडे को शामिल करने का फैसला किया था, लेकिन ऐसा होने से एक सप्ताह पहले ही सिंधिया के दलबदल के कारण उनकी सरकार गिर गई. पिछले 15 वर्षों में मध्य प्रदेश में अपनी सत्ता के दौरान भाजपा ने आंगनवाड़ी भोजन में अंडे को शामिल करने से इनकार कर दिया था और कमलनाथ सरकार की ओर से अंडे के शामिल करने के फैसले का जमकर विरोध किया था.


कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इमरती देवी की यह घोषणा आगामी उपचुनावों में वोट हासिल करने की एक चाल है. जिन 27 सीटों पर उपचुनाव होने हैं उनमें से 10 अनुसूचित जाति (एससी) के लिए आरक्षित हैं, जबकि तीन अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए हैं. (मंत्री स्वयं डबरा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती रही हैं, जो एससी के लिए आरक्षित है). इसके साथ ही 27 सीटों में से 16 ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में स्थित हैं, जहां अनुसूचित जाति की आबादी का प्रतिशत राज्य के बाकी हिस्सों की तुलना में अधिक है. मध्य प्रदेश में, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति समुदाय में अन्य समूहों की तुलना में कुपोषण का स्तर अधिक है. क्या इमरती देवी की इस घोषणा से इन समुदायों के वोटों को आकर्षित करने में मदद मिलेगी? हालांकि चुनावी पंडितों का कहना है कि यह एक रणनीति है और इसका फायदा मिलने की उम्मीद तो की ही जा सकती है.


राज्य के अन्य समुदायों ने उनके निर्णय का विरोध किया है. उदाहरण के लिए, जैन समुदाय खुलकर विरोध कर रहा है. भोपाल में दिगंबर जैन मुनि संघ सेवा समिति के अध्यक्ष मनोहर लाल तोंगिया ने कहा, ''केवल उन लोगों को ही अगले चुनाव में इमरती देवी को वोट देना चाहिए जो अपने बच्चों को अंडे खिलाना चाहते हैं. पूरी शाकाहारी बिरादरी को चाहिए कि वह शाकाहार की ताकत दिखाए और चुनाव में इमरती देवी की हार सुनिश्चित करे.'' उनकी घोषणा के बारे में पूछे जाने पर, मंत्री ने कहा, ''मैंने अभी तक अंडे देने पर निर्णय नहीं लिया है, लेकिन इस पर मेरी पार्टी के विरोध का कोई सवाल ही नहीं है. मेरा उद्देश्य कुपोषण से लडऩा है और मैं इसके बारे में मुख्यमंत्री से बात करूंगी. जो अंडे नहीं चाहते हैं, उन्हें इसके बदले फल दिए जाएंगे. मैं विशेषज्ञों से परामर्श करूंगी और उनकी सलाह का अनुसरण करूंगी. मैं विभाग की मंत्री हूं और यह मेरा व्यक्तिगत रुख नहीं है.''


नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-4 (एनएफएचएस-4) के अनुसार, झारखंड और बिहार के बाद, मध्य प्रदेश में देश में तीसरे सबसे कम वजन के बच्चे हैं. कुल मिलाकर, राज्य में 42.8 प्रतिशत बच्चों का वजन कम पाया गया और 42 प्रतिशत बच्चे अविकसित पाए गए. आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि कुपोषण के मामले उन समुदायों में सबसे कम थी जो मंत्री की इस घोषणा का विरोध कर रहे हैं और इसका समर्थन करने वालों में कुपोषण सबसे ज्यादा पाया गया है. कम वजन वाले बच्चे सबसे अधिक जनजातीय समुदायों में है.

एसटी समुदाय के 51.5 प्रतिशत बचे तो एससी समुदाय के 45.9 प्रतिशत बच्चों का वजन कम पाया गया. 43.2 फीसद हिंदू बच्चे कम वजन के पाए गए जबकि मुस्लिम और जैन बच्चों में यह आंकड़ा क्रमश: 39.9 फीसदी और 18.7 फीसद था. इसी तरह, जैन बच्चों में से केवल 17 प्रतिशत बच्चे ही अविकसित पाए गए जबकि हिंदू और मुस्लिम बच्चों में से क्रमश: 42.3 प्रतिशत और 39.6 प्रतिशत बच्चे अवकिसत थे. एससी और एसटी समुदायों के लिए यह आंकड़ा क्रमश: 47.6 फीसद और 48.2 फीसद था.


सामाजिक संगठन विकास संवाद के निदेशक सचिन जैन कहते हैं, ''आंकड़े बताते हैं कि कुपोषण से एससी और एसटी समुदाय सबसे ज्यादा प्रभावित हैं. विशेषज्ञों ने कई बार एक पूर्ण भोजन के रूप में अंडे के लाभों को इंगित किया है. मंत्री की घोषणा को एक प्रशासनिक मुद्दे के रूप में लिया जाना चाहिए—जो लोग अंडे नहीं खाना चाहते हैं उन्हें आहार का विकल्प दिया जाना चाहिए.'' व्यापार भी इस घोषणा का एक अन्य पहलू है. आंगनवाड़ियों की ओर से आपूर्ति किए गए भोजन में बदलाव से ऐसे केंद्रों पर चल रही मौजूदा 'गर्म पका हुआ भोजन' और 'घर के लिए राशन' की योजनाओं में बदलाव आ जाएगा, जो 1,900 करोड़ रुपए का व्यवसाय है. माना जाता है कि मौजूदा अनुबंधों से लाभान्वित समूह, यथास्थिति में किसी भी तरह के बदलाव का जमकर विरोध कर रहे हैं.


राजनैतिक मोर्चे पर विशेषज्ञ इसके संभावित चुनावी लाभ की ओर इशारा करते हैं. वरिष्ठ पत्रकार और माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति दीपक तिवारी कहते हैं, ''अगर इमरती देवी आगामी उपचुनावों से पहले इसे 'दलित बनाम शेष' मुद्दा बनाने में सक्षम होती हैं तो इससे उन्हें और भाजपा को फायदा होगा.'' भाजपा ने अभी तक इस मुद्दे पर आधिकारिक बयान नहीं दिया है जबकि कांग्रेस सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को हवा दे रही है.

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