करीब 10 साल की लंबी जद्दोजहद के बाद हिमाचल प्रदेश के मनाली में टनल इंजीनियरिंग का बेमिसाल नमूना—एक अद्भुत सुंरग—तैयार है. सामरिक और सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण रोहतांग दर्रे का सीना चीरती यह सुरंग अत्यधिक ऊंचाई (हाइ एल्टीटयूड) में विश्व की सबसे लंबी सड़क सुरंग होगी.
अटल रोहतांग टनल के नाम से जाने जानी वाली करीब 8.8 किलोमीटर लंबी यह सुरंग एक ओर कुल्लू जिले में मनाली तो दूसरी ओर लाहुल-स्पीति जिले को जोड़ेगी. इसे बहुत जल्दी आम आवाजाही के लिए खोला जाएगा. यह सुरंग मनाली-लेह के लिए पूरे साल यातायात बहाल करेगी और हिमाचल का कबायली जिला लाहुल-स्पीति इससे बर्फ के दिनों में भी प्रदेश के अन्य भागों से जुड़ा रहेगा.
हालांकि, दर्रे के नीचे की पहाडिय़ों से निकली इस सुरंग के लिए रास्ता बनाना आसान काम नहीं था. वह भी तब जब साल के करीब छह महीने तक भारी बर्फ से ढका रहने के कारण यह भाग देश-दुनिया से कटा रहता है. ऐसे में न केवल लाहुल के लिए सामान की आवाजाही, बल्कि सैन्य प्रबंधों की दृष्टि से भी अटल रोहतांग टनल खासी महत्वपूर्ण होगी. इतना ही नहीं, लेह तक पहाड़ों को चीर कर करीब चार और सुरंगों की योजना प्रस्तावित है.
इन योजनाओं को केंद्र सरकार की मंजूरी हासिल करने के लिए भेजा जा चुका है. लाचुंग ला तथा तांग लंगला में दो सुरंगें बनेगी, जो लेह से विभिन्न दर्रों के बीच से सुरंग के माध्यम से सालभर के लिए जुड़ी रहेंगी.
बोर्डर रोड ऑर्गेनाइजेशन (बीआरओ), प्रोजेक्ट रोहतांग टनल, के चीफ इंजीनियर कर्नल के.सी. पुरुषोथमन का कहना है कि यह सुरंग सैन्य टुकडिय़ों की आवाजाही को सरल बनाएगी और क्षेत्र के लोगों का भी पूरे साल देश के अन्य हिस्सों से संपर्क बना रहेगा.
कुल्लू जिले में मनाली और दूसरी ओर लाहुल-स्पीति जिले को जोडऩे वाली यह रोहतांग सुरंग नॉर्थ पोर्टल से शुरू होकर दूसरे छोर पर साउथ पोर्टल पर खुलती है. यह 8,802 मीटर लंबी है और इसकी ऊंचाई समुद्र तल से करीब 10,000 फुट या 3,000 मीटर है. 10.5 मीटर चौड़ी इस सिंगल ट्यूब टनल की छत तक ऊंचाई (ओवर हेड) 5.525 मीटर है.
इस बड़ी और मुख्य सुरंग के नीचे एक और समानांतर सुरंग बनाई गई है, जिसमें 3.3 एवं 2.25 मीटर आपातकाल निकासी है. इसमें हर 500 मीटर के अंतराल पर सीढिय़ां हैं जो मुख्य टनल का बचाव मार्ग हैं. अटल रोहतांग सुरंग से प्रति दिन 3,000 पेट्रोल कारें और 1,500 डीजल ट्रक गुजर सकते हैं, जो 80 किमी प्रति घंटा से चल सकेंगे.
दरअसल, करगिल युद्ध के बाद लेह से मनाली के लिए ऑल वेदर मार्ग यानी हर मौसम में संचालित मार्ग की जरूरत ने जोर पकड़ा. तभी सुरंग बनाने और 4.15 किलोमीटर हरित क्षेत्र को निमू-पदम-दारचा तक जोडऩे की योजना बनी. साल 2000 में जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने हरी झंडी दी और कहा कि सुरंग बन सकती है लेकिन साउथ पोर्टल पर चट्टाने अस्थिर हैं.
फिर साल 2002 में ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने सुरंग बनाने के निर्देश दिए. बीआरओ ने अपनी निगरानी में कुछ निजी क्षेत्र के सहयोग से काम शुरू कर दिया.
अटल रोहतांग सुरंग का निर्माण 4 मार्च 2010 को शुरू हुआ. प्रदेश की पीर पंजाल पहाडिय़ों पर यह काम चुनौती भरा था क्योंकि साल के छह महीने तो यहां सिर्फ बर्फ जमी रहती है. सुरंग का साउथ पोर्टल क्षेत्र मनाली से 25 किलोमीटर दूर है जिसकी ऊंचाई 360 मीटर है. वहीं, नार्थ पोर्टल लाहुल घाटी में तेलिंग गांव के सिसू में 3,071 मीटर ऊंचाई पर है. घोड़े के पैर के आकार की यह सुरंग 8 मीटर चौड़ी है.
इलाके में अत्यधिक बर्फ पडऩे की वजह से इस सुरंग परियोजना को खासी चुनौतियों से जूझना पड़ा. जब साउथ पोर्टल के समीप कार्य बढ़ा तो सेरी नाला का पानी और पहाड़ों की गाद थमने का नाम नहीं ले रही थी. इसी नाले ने कार्य पेचीदा कर दिया. फिर तकनीकी तौर पर पानी की निकासी अलग करके गाद को रोका गया.
सुरंग को बनाने में करीब 4,000 करोड़ रुपए खर्च हुए हैं. 8.8 किमी लंबी सुरंग में हवा का व्यापक प्रबंध है और आग से बचने के लिए हर 50 मीटर पर उपकरण लगे हैं. जाहिर है, कड़ी चुनौतियों को पार करते हुए तैयार किया गया यह सुरंग सामरिक क्षेत्र में नई इबारत लिखने को तैयार है.
ल्होयुल (देवदेश)
यहां के स्थानीय निवासी नवांग उपासक का कहना है कि यहां बौद्ध और हिंदू, दोनों धर्मों के लोग रहते हैं. तिब्बती भाषा में ल्होयुल दक्षिण प्रदेश को कहते हैं. यह नाम लद्दाखियों ने दिया था. 620 ई. तक लाहुल पर लद्दाखियों का अधिकार था तो दक्षिण दिशा में स्थित होने पर उन्होंने इसे ल्होयुल नाम दिया.
इसे लोग दर्रों का देश भी मानते हैं. तब इसे ला-युल भी कहा जाता है. लाहुल के पूर्व में कुंजम दर्रा दक्षिण-पश्चिम में रोहतांग, उत्तर में बारालाचा और दक्षिण में साच दर्रा है. ये लाहुल से एक-दूसरे को जोड़ते हैं. यहां लोग चंद्र और भाग का अलग-अलग जगहों से उद्गम होने तथा फिर मिल कर चंद्रभागा नदी बनने पर इसे पवित्र मानते हैं.
उपरोक्त वर्णित चार दर्रे लद्दाख, स्पीति, कुल्लू और चंबा को लाहुल से जोड़ते हैं. जून-जुलाई में इन्हीं दर्रों से लोग मवेशियों पर सामान लादकर देश के मुख्य भाग से जुड़ते थे. उच्च दर्रे होने के कारण यहां आक्सीजन की मात्रा कम है. इसलिए रोहतांग दर्रे से चीरकर निकली सुरंग पहला पड़ाव है. यह इस समय महत्वपूर्ण बन जाता है क्योंकि क्षेत्र के लोगों ने साल 1964 तक कोई गाड़ी तक नहीं देखी थी.
‘‘रोहतांग सुरंग को बनाना अटल जी का लाहुल के लोगों को बड़ा तोहफा है. यहां के लिए यह सुरंग जीवन दायिनी बन गई है. हिमाचल प्रदेश भारत सरकार का हमेशा आभारी रहेगा’’
जयराम ठाकुर,
मुख्यमंत्री, हिमाचल प्रदेश
खुल गई राह
पहाड़ों को चीरकर बनाई गई अटल रोहतांग सुरंग के अंदर का दृश्य
8.8 किलोमीटर लंबी सुरंग
3,000 कारें और 1,500 ट्रक प्रति दिन गुजर सकते हैं
46 किलोमीटर दूरी कम होगी

