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कोरोना काल में अस्पताल बेहाल

कहीं अस्पताल में पुलिस चौकी चल रही, कहीं सालों से उनकी इमारतें अधूरी या बनी पड़ी हैं, कहीं वार्ड में बारिश की बाढ़ है. यूपी के कराहते स्वास्थ्य महकमे ने बढ़ाई महामारी की पीड़ा

पनीली सतह पर इलाज बारिश में जलमग्न महोबा के जिला अस्पताल के वार्ड में मरीज
पनीली सतह पर इलाज बारिश में जलमग्न महोबा के जिला अस्पताल के वार्ड में मरीज
अपडेटेड 31 अगस्त , 2020

जनता के पैसे की बर्बादी कैसे होती है इसका एक छोटा का नमूना कन्नौज जिले में कानपुर जीटी रोड के किनारे मौजूद जिला अस्पताल के भीतर मौजूद ट्रॉमा सेंटर में दिखता है. 15 करोड़ रुपए की लागत से चार वर्ष पहले बनकर तैयार हुए भवन में जब अस्पताल नहीं शुरू हो पाया तो इस पर पुलिस ने कब्जा जमाकर चौकी खोल ली. ट्रॉमा सेंटर के भीतर घुसते ही मरीजों के परीक्षण के लिए बना 'इग्जामिनेशन कक्ष' चौकी इंचार्ज प्रताप सिंह लोधी के दफ्तर में तब्दील हो गया है. इससे आगे बढ़ने पर वार्ड पड़ता है. यहां पर गंभीर मरीजों की भर्ती होनी थी लेकिन पूरे कमरे में पुलिस वालों के बिस्तर पूरी गृहस्थी के सामान समेत बिछे हुए हैं. वार्ड के सामने पोस्ट ऑपरेशन वार्ड है जो निष्प्रयोज्य सामान का गोदाम बन गया है. पहले तल को जाने वाला रैंप मोटरसाइकिल स्टैंड और कपड़ों को सुखाने की जगह के रूप में तब्दील हो गया है.

पहले तल पर जिला अस्पताल की एंबुलेंस के ड्राइवरों ने कब्जा जमा लिया है. ट्रॉमा सेंटर के संचालन के लिए खरीदे गए बिस्तर और दूसरे उपकरण एक्स-रे रूम में बंद किए गए हैं. इस कक्ष के बंद दरवाजे पर लगा शीशा तोड़ा जा चुका है और भीतर रखे सामान को चोरी छिपे ले जाने की छूट का भरपूर फायदा उठाया जा रहा है. अधि‍कारी चुप हैं. सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कन्नौज से सांसद सुब्रत पाठक ट्रॉमा सेंटर के न शुरू होने के पीछे पूर्ववर्ती समाजवादी पार्टी (सपा) की सरकार में जरूरी स्टाफ की तैनाती न किए जाने को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं.

जबकि कन्नौज सदर से सपा विधायक अनिल दोहरे इसके न शुरू होने के पीछे भाजपा सरकार की भेदभाव पूर्ण कार्यप्रणाली का आरोप लगा रहे हैं. आरोप-प्रत्यारोप के बीच हाइवे पर मौजूद ट्रॉमा सेंटर के न संचालित होने की कीमत गंभीर मरीजों को जान गवांकर चुकानी पड़ रही है. हालांकि कन्नौज के मुख्य चिकित्साधि‍कारी (सीएमओ) डॉ. कृष्ण स्वरूप कहते हैं, ''ट्रॉमा सेंटर के संचालन के लिए शासन से पत्राचार किया गया है. जल्द ही स्टाफ की तैनाती होने पर संचालन शुरू कर दिया जाएगा.''


कन्नौज ही नहीं प्रदेश में कई जिलों में बंद पड़े अस्पताल (देखें बॉक्स) कोरोना संक्रमण के खि‍लाफ जंग में स्वास्थ्य सेवाओं को मुंह चिढ़ा रहे हैं. अस्पतालों का निर्माण कराने वाली संस्था राजकीय निर्माण विभाग से सेवानिवृत्त चीफ इंजीनियर रमेश चंद्र गुप्ता बताते हैं, ''ज्यादातर सरकारों का ध्यान केवल अस्पतालों के भवन निर्माण तक ही केंद्रित रहता है. किसी भी सरकार ने अस्पताल के निर्माण के साथ प्राथमिकता के तौर उनमें स्टाफ की तैनाती प्रक्रिया नहीं शुरू की. सत्ता बदलने के बाद दूसरी सरकार भी इन अस्पतालों में स्टाफ की तैनाती पर ज्यादा रुचि नहीं लेती है. नतीजतन, ये अस्पताल महज सफेद हाथी बनकर रह जाते हैं.''


यूपी में मार्च से शुरू हुआ कोविड-19 बीमारी का प्रकोप अब खौफनाक रूप धारण करता जा रहा है. प्रदेश में कोरोना संक्रमण के मामले एक लाख केस को पार कर चुके हैं (देखें ग्राफि‍क्स) और 16 अगस्त तक इस महामारी से यहां कुल 2,449 लोगों की मौत हो चुकी थी. जान गंवाने वालों में प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के दो कैबिनेट मंत्री भी शामिल हैं. इसके बावजूद इन बंद पड़े अस्पतालों का कोई उपयोग न किए जाने से महामारी की भयावहता में और इजाफा हुआ है. इंडिया टुडे से जानकारी मिलने के बाद यूपी के स्वास्थ्य महानिदेशक डॉ. डी.एस. नेगी ने बंद पड़े अस्पतालों की सूचना अपने विभाग से मांगी है. डॉ. नेगी कहते हैं ''जरूरत के हिसाब से इन अस्पतालों को क्वारंटीन सेंटर के रूप में तब्दील किया जा सकता है'' (देखें बातचीत).


स्वास्थ्य विभाग के तहत पूरे प्रदेश में जिला अस्पतालों के नेटवर्क के अलावा 853 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), 4,300 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और 21,000 स्वास्थ्य उपकेंद्र संचालित हो रहे हैं. स्वास्थ्य विभाग के बंद अस्पताल ही नहीं, पर्याप्त देखरेख के अभाव में चालू अस्पतालों की सेवाएं भी तकलीफ दे रही हैं. ऐसा ही वाकया प्रदेश के मुख्य सचिव राजेंद्र कुमार तिवारी के गृह जिले महोबा में भी नजर आया जब 25 जुलाई की दोपहर करीब डेढ़ घंटे की बारिश में यहां के जिला अस्पताल में घुटनों तक पानी भर गया. क्या वार्ड, क्या इमरजेंसी और क्या ऑपरेशन थि‍एटर. मुख्य सड़क से नीचे स्थित होने के कारण जरा-सी बारिश पूरे अस्पताल को पानी से लबालब कर देती है. बारिश का गंदा पानी निकलने के बाद मरीज संक्रमण की आशंका के बीच इलाज को विवश रहते हैं. 5 अगस्त को हुई बारिश में भी यह अस्पताल पानी में डूब गया था. महोबा के जिलाधि‍कारी अवधेश तिवारी बताते हैं, ''महोबा जिला अस्पताल में कोविड मरीज नहीं भर्ती होते हैं. यहां पानी भरने की समस्या का स्थाई समाधान किया जा रहा है. अस्पताल के प्लेटफॉर्म को ऊंचा करने के साथ पानी निकासी के लिए मोटर लगाया गया है.''


स्वास्थ्य विभाग की कोरोना से निबटने की गड़बडिय़ों से मुख्य सचिव तिवारी का भी वास्ता पड़ा. तिवारी 11 अगस्त को कानपुर के नगर निगम मुख्यालय में बने कोविड कमान सेंटर में शि‍कायतों का परीक्षण कर रहे थे. उन्होंने शि‍कायत करने वाली महिला से खुद फोन पर बात की. महिला ने बताया कि उसके पति कांशीराम अस्पताल में भर्ती हैं. उनकी हालत गंभीर है. महिला ने बताया कि वह अस्पताल प्रशासन से लगातार अपने पति को हैलट अस्पताल में भर्ती कराने के लिए गुहार लगा रही है लेकिन यहां के डॉक्टर सुन ही नहीं रहे.

इस पर मुख्य सचिव नाराज हुए और उन्होंने तत्काल कानपुर के अपर निदेशक डॉ. आर.पी. यादव को कांशीराम अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक को हटाने के आदेश दिए. इससे पहले 9 अगस्त को कानपुर के कांशीराम अस्पताल में चार कोरोना संक्रमित मरीजों की मौत हो जाने पर जमकर हंगामा हुआ था. इसके अगले दिन कोरोना से मरने वाले एक व्यक्ति के भाई और भाजपा नेता का वीडियो वायरल हुआ जिसमें उसने कांशीराम अस्पताल प्रशासन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था. कोविड मरीजों के इलाज में लापरवाही बरतने के आरोप में आगरा, मथुरा, बुलंदशहर, लखनऊ, अलीगढ़, वाराणसी जिलों के स्वास्थ्य अधि‍कारियों पर कार्रवाई की गई है.


स्वास्थ्य विभाग ने सेवानिवृत्त अतिरिक्त निदेशक डॉ. रमेश कुमार बताते हैं, ''अनलॉक के दौरान यूपी में कोरोना की रोकथाम में लगे विभागों में आपसी तालमेल गड़बड़ा गया है. अधि‍कारी एक दूसरे को नीचा दिखा रहे हैं. कई जिलों में जिलाधि‍कारी और स्वास्थ्य विभाग के अधि‍कारियों में खींचतान चल रही है. इसने भी कोविड-19 से निबटने के प्रयासों को कमजेार किया है.'' वाराणसी में तैनात एक डिप्टी कलेक्टर पर मानसिक प्रताडऩा का आरोप लगाते हुए शहर के 24 और ग्रामीण क्षेत्र के आठ स्वास्थ्य केंद्र प्रभारियों ने 12 अगस्त को अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. बाद में वाराणसी के जिलाधि‍कारी कौशलराज शर्मा ने एक आदेश जारी कर प्रशासनिक अधि‍कारियों को जिले के स्वास्थ्य अधि‍कारियों के साथ समन्वय बनाते हुए काम करने को कहा. इसके बाद ही मामला शांत हुआ. इसी तरह का एक मामला लखनऊ में भी आया जब हज हाउस में बने क्वारंटीन सेंटर को लेकर पूर्व सीएमओ डॉ. नरेंद्र अग्रवाल और एक डिप्टी कलेक्टर आमने-सामने आ गए थे. प्रशासनिक अधि‍कारियों की लामबंदी के कारण डॉ. अग्रवाल को सीएमओ पद से हटना पड़ा.


स्वास्थ्य विभाग ने कोरोना काल को भ्रष्टाचार के अवसर में तब्दील कर दिया है. अलीगढ़ में स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी सैंपल लेते समय लोगों के नाम, पते और मोबाइल नंबर गलत दर्ज कर रहे हैं. अलीगढ़ के एडिशनल सिटी मजिस्ट्रेट रंजीत सिंह की जांच में जिले के दीनदयाल संयुक्त चिकित्सालय में इस खेल की पुष्टि हुई है. अलीगढ़ जिला प्रशासन ने दोषी कर्मचारियों पर कार्रवाई की है. कोरोना जांच को लेकर स्वास्थ्य विभाग इस कदर लापरवाह है कि उसने इलाहाबाद से भाजपा सांसद और यूपी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहीं रीता बहुगुणा जोशी को भी सांसत में डाल दिया. हुआ यूं कि रीता के पति पूरनचंद का ऐंटीजन टेस्ट 15 अगस्त की शाम हुआ था. जांच के लिए स्वास्थ्य विभाग की टीम उनके घर आई थी. ऐंटीजन टेस्ट में पूरनचंद की रिपोर्ट निगेटिव थी जिसकी जानकारी उन्हें फौरन दे दी गई थी. लेकिन स्वास्थ्य विभाग की ओर से बाद में जो सूची जारी हुई, उसमें पूरनचंद को पॉजिटिव बता दिया गया. संक्रमितों की सूची में पति का नाम आने पर रीता बहुगुणा जोशी के घर में हड़कंप मच गया. रीता ने जब इस बारे में पूछताछ की तो पता चला कि उनके पति की आरटीपीसीआर जांच रिपोर्ट अभी आई ही नहीं है. प्रयागराज के सीएमओ मेजर डॉ. जी.एस. बाजपेयी ने बताया कि गलती से पूरनचंद का नाम संक्रमितों की सूची में आ गया था, यह एक मानवीय त्रुटि थी जिसे बाद में ठीक करा लिया गया था. हालांकि इस मामले में स्वास्थ्य विभाग ने किसी की जिम्मेदारी तय नहीं की.


कोरोना संक्रमण से निबटने के प्रयासों को और तेज करने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 20 जून को प्रशासनिक ड्यूटी में लगे डॉक्टरों को कोविड मरीजों के उपचार में लगाने का आदेश दिया था. मुख्यमंत्री के आदेश की धज्जि‍यां लखनऊ में स्वास्थ्य महानिदेशालय में भी उड़ जाती हैं जहां 60 से ज्यादा डॉक्टर बाबूगीरी कर रहे हैं. यहीं से कुछ दूरी पर मौजूद मुख्य चिकित्साधि‍कारी दफ्तर में दो नेत्ररोग सर्जन बतौर डिप्टी सीएमओ, कैंसर विशेषज्ञ और नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉक्टर बतौर एडिशनल सीएमओ प्रशासनिक ड्यूटी में व्यस्त हैं. जाहिर है, कोरोना महामारी के बीच स्वास्थ्य विभाग का 'इलाज' मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सामने एक बड़ी चुनौती है.

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