अखिलेश पांडे
वातावरण ऐसे खिल उठा है, मानो लॉकडाउन उसके लिए वरदान बनकर आया. यकीनन, कोरोना वायरस के प्रकोप की रोकथाम के लिए 24 मार्च से लागू लॉकडाउन गरीब-गुरबों और प्रवासी मजदूरों के लिए आफत बनकर आया है लेकिन इसका एक नतीजा हर तरह के प्रदूषण में भारी कमी के रूप में दिख रहा है. वाकई, यह सुखद एहसास पैदा करता है. मानो प्रकृति अपने मूल स्वरूप में लौट गई है. हवा, पानी अपने शुद्घ-साफ स्वरूप में दिखने लगा है. इसके नजारे उत्तराखंड में सबसे स्पष्ट दिख रहे हैं. देश के प्रमुख तीर्थ स्थल हरिद्वार और ऋषिकेश में गंगा जल एकदम साफ नीला दिखता है और वैज्ञनिक इसे पीने योग्य बता रहे हैं.

वैज्ञानिकों के अनुसार गंगा के साफ पानी की वजह, इसके पानी में घुले डिसॉल्वड सॉलिड की मात्रा में आई 500 प्रतिशत की कमी है. जाहिर है, ऐसा तीर्थनगरी में मौजूद धर्मशाला, होटल-लॉज से आने वाले सीवर और अन्य प्रदूषकों में कमी की वजह से हुआ है. पानी की गुणवत्ता में आया असर साफ दिखाई दे रहा है.
ऋषिकेश में इस पानी को डिसइंफेक्ट कर पिया जा सकता है. हरिद्वार में ये नहाने योग्य है और कुछ ट्रीटमेंट के बाद पीने योग्य भी इसे आसानी से किया जा सकता है. उत्तराखंड पर्यावरण प्रदूषण बोर्ड के अध्ययन भी प्रदूषण में आई गिरावट की पुष्टि कर रहे हैं.
उत्तराखंड के प्रमुख पर्यटन शहर हों या फिर देवभूमि के धार्मिक महत्व के तीर्थ या नगर हर जगह लॉकडाउन के चलते पर्यावरण में बहुत सुधार दिख रहा है. अप्रैल, मई और जून के महीनों में यहां लगभग सभी शहरों-कस्बों में लोगों की भीड़ लगी रहती थी लेकिन इन दिनों सन्नाटा पसरा हुआ है.
झील नगरी नैनीताल समेत भीमताल, नौकुचियाताल, सातताल सभी में झीलों का पानी न केवल पारदर्शी और निर्मल दिखाई दे रहा है, बल्कि इन झीलों की खूबसूरती भी बढ़ गई है. पिछले कई साल से झील के जलस्तर में जो गिरावट दिखती थी, वह भी इस बार नहीं दिख रही.
मछलियां झील की सतह पर आकर अठखेलियां करती दिखती हैं. शहर की सड़कें साफ-सुथरी और चमकदार दिख रही हैं. कुमाऊं विश्वविद्यालय में वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर ललित तिवारी के अनुसार यह सब शहर के होटलों और रेस्तरां के बंद होने का नतीजा है क्योंकि उनसे निकलने वाले कचरे और गंदे पानी में भारी कमी आई है.
लॉकडाउन से पसरा सन्नाटा वन्यजीवों के लिए वरदान बन गया है. इन पर्यटक शहरों में भरी दोपहरी में तेंदुए के शावक सड़कों पर आराम से चहलकदमी करते दिखाई पेलगे हैं. राजाजी टाइगर रिजर्व से लगे हरिद्वार में हर की पैड़ी में गजराज के आ धमके. 7 अप्रैल को सुबह सवेरे गजराज हर की पैड़ी घाट पर पानी में उतर आया, देर तक स्नान किया और फिर मुख्य शहर का फेरा लगाया. लॉकडाउन के चलते ड्यूटी में लगे पुलिसवाले भी दहशत में आ गए. किसी तरह सायरन बजाकर गजराज को विदा किया गया.
वैज्ञानिकों के अनुसार हरिद्वार में हर की पैड़ी घाट पर पानी की गुणवत्ता में 40-50 प्रतिशत सुधार हुआ है. वहां रोज हजारों श्रद्धालुओं का आना-जाना होता था लेकिन लॉकडाउन में आवाजाही बंद है.
बहरहाल, गंगा आज स्वच्छ और शुद्ध होती दिख रही है. जिस स्वच्छता और निर्मलता के लिए सरकारें करोड़ों रुपए खर्च करके परिणाम नहीं ला सकी, वह परिणाम लॉकडाउन से मिल गया. मछली और अन्य जीव पानी में साफ दिखाई देते हैं. घाट पूरी तरह साफ हैं. एक पुजारी ने कहा कि हम गंगा को इसी तरह साफ देखना चाहते हैं, लॉकडाउन के कारण ऐसा हो सका है लेकिन हमें खुशी होगी अगर श्रद्धालुओं के आने के बाद भी गंगा का पानी इसी तरह स्वच्छ रहे.
पर्यावरणीय तौर पर इस कारण हवा भी इतनी शुद्ध है कि शहरों से पहाड़ों की चोटियां साफ दिख रही हैं. उत्तराखंड स्पेस अप्लिकेशन सेंटर के निदेशक डॉ. एमपीएस बिष्ट के अनुसार हिमालय की धवल चोटियां साफ दिखने लगी हैं.
उनके अनुसार गंगा के घाटों में भी रमणीकता दिखाई देने का यही कारण है कि वहां तीर्थयात्रियों की आवाजाही बंद होने से जहां साफ-सफाई बढ़ी है. वहीं गंगा घाटों के मंदिर भी बंद होने से उनके कचरे में स्वयं रोक लगने से जहां गंगा घाट साफ और सुंदर हो गए, गंगा भी निर्मल हो गई.
इतना ही नहीं, स्वच्छता का आलम हर कहीं दिखने लगा है. नीला आसमान हर जगह से दिखने लगा है. बाग बगीचे सुंदर हो गए हैं पक्षियों के मधुर स्वर भी लौट आए हैं. कहीं शोरोगुल नहीं सुनाई दे रहा. चारधाम बर्फ से लदे हुए इतनी चमक बिखेर रहे हैं कि सूर्य की रोशिनी आंखों को चौधिया देती है. यह बेशक महामरी की दहशत की घड़ी है लेकिन इससे हमें सबक भी लेना चाहिए, ताकि प्रकृति भी साफ बनी रहे और हमारा जीवन भी सुरक्षित रहे.
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