अमेरिकी लेखक जॉन मैक्सवेल ने लिखा है, ''निराशावादी हवा के विपरीत रुख को देख बेचैन हो उठते हैं जबकि आशावादी उसमें भी बदलाव की उम्मीद देखता है और नेता हवा के रुख की ओर पाल लगाकर नाव आगे बढ़ा लेता है.'' दुनियाभर के नेताओं के प्रबंधन कौशल की आज परीक्षा हो रही है कि वे मानव जाति के अस्तित्व को खतरे में डाल रहे कोविड-19 की इस नई हवा का रुख पलटने के लिए कैसी योजनाओं के साथ सामने आते हैं.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, कोरोना वायरस महामारी मानव अस्तित्व के सामने सबसे बड़े संकट के रूप में उभरी है. इस घातक वायरस के प्रकोप को रोकने के लिए जो एकमात्र उपाय सोशल डिस्टेंसिंग या सामाजिक मेलजोल से दूर रहना बताया जा रहा है, वह मनुष्य की बुनियादी प्रवृत्ति से एकदम अलग है. इसका असर केवल मनोवैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि माली या वित्तीय हालत के लिए कहीं अधिक विनाशकारी है. अलग-थलग रहने की इस रणनीति के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में तीन सप्ताह के लिए लॉकडाउन की घोषणा की थी.
देश संघीय गणराज्य है और इसके विकास का वास्तविक इंजन राज्यों में स्थित है. इसलिए तीन हक्रते के लॉकडाउन में सामाजिक और आर्थिक स्थितियां सामान्य बनी रहें और उसके आर्थिक नतीजों की चुनौतियों से निपटने की योजना तैयार करने की जिम्मेदारी मुख्य रूप से राज्य के मुख्यमंत्रियों पर ही आ पड़ी. उनमें से कई मुख्यमंत्री दशकों का अनुभव रखने वाले दिग्गज नेता हैं लेकिन वे भी इस संकट के पैमाने को देखते हुए विचलित हैं.
तैयारी की कोई सीमा नहीं है और चूक की गुंजाइश न के बराबर है. कोविड-19 का प्रकोप तेजी से बढ़ रहा है और मुख्यमंत्रियों को न सिर्फ स्वास्थ्य ढांचे को दुरुस्त करना है, बल्कि राहत पहुंचाने के लिए भी हर वक्त चौकस रहना है. उन्हें तेजी से रणनीतियों में बदलाव की जरूरत बनी रहते है. वे जानते हैं कि जीवन बचाने के इस तात्कालिक कार्य के बाद उनके सामने एक बड़ी चुनौती आर्थिक बदहाली को रोकने की होगी.
इस असाधारण समय में, इन राज्य प्रमुख की व्यक्तिगत सक्रियता ने कोविड-19 के विरुद्ध भारत के युद्ध को एक नया आयाम दिया है. राजनीति पीछे चली गई है, सामूहिक जनकल्याण ही अब सबका प्राथमिक लक्ष्य है. हर बार ऐसी चुनौतियों ने मानव सभ्यता को नए सबक दिए हैं. संकट के इन काले बादलों में शायद यहीं से रोशनी फूटेगी जो आने वाले वक्त में दुनियाभर को रोशन कर दे.
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