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टेलीकॉम कंपनियों का बकायाः पूरे सेक्टर का संकट

टेलीकॉम कंपनियों को राहत नहीं मिली और वोडाफोन को कारोबार समेटना पड़ा तो दो कंपनियों का एकाधिकार हो जाएगा

इलस्ट्रेशनः सिद्धांत जुमडे
इलस्ट्रेशनः सिद्धांत जुमडे
अपडेटेड 29 जनवरी , 2020

सुप्रीम कोर्ट ने 16 जनवरी को भारतीय टेलीफोन कंपनियों की उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें टेलीकॉम विभाग (डीओटी) के समायोजित सकल राजस्व (एडजस्टेड ग्रास रेवेन्यू-एजीआर) की परिभाषा बरकरार रखने के उसके 24 अक्तूबर के फैसले की समीक्षा की अपील की गई थी. भारतीय टेलीकॉम ऑपरेटरों की ओर से टेलीकॉम विभाग के प्रति देय लाइसेंस शुल्क के निर्धारण के लिए यह परिभाषा ही मुख्य आधार है.

नतीजतन सभी टेलीफोन कंपनियों को कुल मिलाकर 1.33 लाख करोड़ रु. देने होंगे. इस रकम में से 1.02 लाख करोड़ रु. तीन कंपनियों—भारती एयरटेल, वोडाफोन आइडिया और टाटा टेलीसर्विसेज को चुकाने होंगे. इन कंपनियों की मुसीबत तब और बढ़ गई जब सुप्रीम कोर्ट ने यह रकम चुकाने के लिए तीन महीने की मियाद तय कर दी जो 23 जनवरी, 2020 को समाप्त हो रही है. 16 जनवरी को पुनर्विचार याचिका के खारिज होने के बाद अब कम से कम एक कंपनी—वोडाफोन आइडिया—का अंत लगभग तय लग रहा है. इस कंपनी को अकेले ही 54,200 करोड़ रु. चुकाने हैं.

लेकिन 21 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट टेलीफोन कंपनियों की ओर से दाखिल संशोधन की याचिका पर सुनवाई करने के लिए राजी हो गया जिसमें कोर्ट से भुगतान की दीर्घकालिक समय-सारिणी दिए जाने की अपील की गई थी. यह अपील पिछले साल 20 नवंबर को कैबिनेट के एक फैसले के बाद की गई थी जिसमें टेलीफोन कंपनियों को भुगतान के लिए दो साल के विलंब की इजाजत दी गई थी. लेकिन सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने भुगतान के लिए 14 साल देने की मांग की है.

वोडाफोन इंडिया की किस्मत पर इसका गंभीर असर पड़ेगा जो पहले ही चेतावनी दे चुकी है कि अदालत से अगर उसे कोई राहत नहीं मिली तो वह अपना ''कारोबार तुरंत बंद'' कर देगी. करीब 98,000 करोड़ रु. के कर्ज में दबी और ग्राहकों की घटती संक्चया से परेशान इस कंपनी के लिए भारत में अपना कारोबार चलाना मुश्किल हो गया है, जबकि अगस्त 2018 में आइडिया सेल्युलर के साथ इसका विलय भी हो गया था. इस बीच एयरटेल, जिस पर 1 लाख करोड़ रु. से ज्यादा का कर्ज है, को लाइसेंस फीस के तौर पर 21,682 करोड़ रु. देने हैं.

इस सेक्टर में हमेशा से ही भारी प्रतिस्पर्धा रही है, जो सितंबर 2016 में रिलायंस जियो के कदम रखने के बाद और भी तेज हो गई थी. इसके आने से पहले से मौजूद कंपनियों पर गंभीर असर पड़ा. जियो की तरफ से शुरू कीमत की लड़ाई से पहले से ही कर्ज में दबी टेलीफोन कंपनियों की हालत खस्ता हो गई. वोडाफोन आइडिया और भारती एयरटेल ने एजीआर के रूप में देय क्रमश: 25,680 करोड़ रु. और 28,450 करोड़ रु. की देनदारी के बाद मौजूदा वित्त वर्ष में भारी नुक्सान उठाया. और पिछले साल 1 दिसंबर को रिलायंस जियो, वोडाफोन आइडिया व भारती एयरटेल ने अपनी दरों में बढ़ोतरी करने की घोषणा की.

वोडाफोन आइडिया और एयरटेल की ओर से पांच वर्षों में यह पहली बढ़ोतरी थी जिसका असर ग्राहकों की जेब पर पड़ा लेकिन इस बढ़ोतरी से कंपनियों की सेहत में जरूर थोड़ा सुधार हुआ. हालांकि उनकी समस्या को देखते हुए यह सुधार मामूली था. अगर टेलीफोन कंपनियों को इस मुद्दे पर राहत नहीं मिलती और वोडाफोन आइडिया को मजबूरन कारोबार बंद करना पड़ता है तो टेलीकॉम सेक्टर पर केवल दो कंपनियों का अधिकार रह जाएगा जो ग्राहकों के लिए अच्छी खबर नहीं है.

रेटिंग एजेंसियों का कहना है कि शुल्क की दरों में इजाफा और दो साल का भुगतान विलंब पर्याप्त नहीं होगा. एक्यूट रेटिंग ऐंड रिसर्च का कहना है कि देश में 5जी के आगमन में देरी हो सकती है जो 2022 से भी आगे जा सकती है क्योंकि टेलीकॉम कंपनियों के पास नए स्पेक्ट्रम के लिए बोली लगाने के लिए पर्याप्त क्षमता नहीं है.

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