scorecardresearch

महंगाईः नया साल, नई चुनौती

खाद्य वस्तुओं की कीमतों में तेजी जारी है. इसके लंबे समय तक टिकने की आशंका है. सुस्त अर्थव्यवस्था के बीच महंगाई का बढऩा अच्छा संकेत नहीं

राजवंत रावत
राजवंत रावत
अपडेटेड 31 दिसंबर , 2019

फल, सब्जी, दाल, दूध, खाद्य तेल आदि की बढ़ी कीमतों से अगर आपकी रसोई का बजट बिगड़ गया है तो इसके जल्द सुधरने के आसार नजर नहीं आ रहे. खाद्य महंगाई दर नवंबर में 10 फीसद के पार निकल गई, जो बीते करीब छह वर्ष का उच्चतम स्तर है. ग्रामीण भारत में खाद्य महंगाई की दर 8.8 फीसद रही जबकि शहरी इलाकों में यह 12.3 फीसद रही. इस उछाल का सबसे बड़ा कारण प्याज की कीमत में आई तेजी है, जो नवंबर में 145 फीसद और अक्तूबर में 98 फीसद बढ़ी.

केयर रेटिंग्स का अनुमान है कि अगले कुछ महीने महंगाई ऊपरी स्तर पर ही रहेगी. इसकी मुख्य वजह खाद्य वस्तुओं की कीमत में तेजी है. हालांकि मॉनसून के देरी से जाने के कारण जलाशयों में पर्याप्त पानी है, जिससे रबी फसल की बुआई के अच्छा रहने की उम्मीद है. इससे महंगाई पर काबू पाने में मदद मिल सकती है.

लंबी चलेगी महंगाई 

कृषि नीतियों के विशेषज्ञ विजय सरदाना कहते हैं, ''बीते छह वर्षों में सरकार की ओर से एग्रीकल्चर मार्केटिंग या टेक्नोलॉजी की दिशा में कोई बड़े सुधार नहीं किए गए, इसी का नतीजा है कि अब खाद्य महंगाई वापस लौट आई है.'' एनडीए सरकार के पहले कार्यकाल (जून 2014 से मई 2019) के दौरान खाद्य महंगाई औसतन 3 से 3.5 फीसद सालाना की दर से बढ़ी. सरकार ने कई मौकों पर इसे अपनी सफलता के तौर पर रेखांकित किया. लेकिन सरदाना मानते हैं, ''महंगाई में यह कमी भी एक भम्र था और ग्रामीण इलाकों में वर्तमान संकट इसी का नतीजा है.'' यह नोटबंदी, समर्थन मूल्य पर पैदावार का न बिकना और अपर्याप्त कर्ज का नतीजा था कि किसान अपनी पैदावार को किसी भी भाव पर बेचने के लिए मजबूर थे. सरकार इस ग्रामीण संकट को महंगाई में गिरावट के रूप में आंककर खुश हो रही थी.

सरदाना यह भी कहते हैं, ''खेती की जमीन लगातार घट रही है और जनसंख्या हर साल 2 करोड़ बढ़ रही है. सूखा, बाढ़, बेसौमस बारिश से पैदा हुई महंगाई धीरे-धीरे भले कम हो जाए लेकिन किसान की बढ़ती लागत (बीज, दवा, डीजल और मजदूरी) और मांग-आपूर्ति का संतुलन बिगडऩे से पैदा होने वाली महंगाई की प्रकृति स्थायी होती है.'' मिसाल के तौर पर आलू के दाम नई फसल के बाजार में आने के बाद कम हो सकते हैं लेकिन दूध के भाव में बढ़ोतरी स्थायी है.  

गांवों में असर ज्यादा

नवंबर में खुदरा महंगाई दर 5.5 फीसद के स्तर पर पहुंच गई. खुदरा महंगाई सूचकांक में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी (39.06 फीसद) खाद्य वस्तुओं की है.

शहरी इलाकों के खुदरा सूचकांक में खाद्य वस्तुओं की हिस्सेदारी (वेटेज) 29.62 फीसद है जबकि ग्रामीण इलाकों में यह 47.25 फीसद है. यानी गांवों में रहने वाले लोग शहरी आबादी की तुलना में अपनी आय का ज्यादा हिस्सा खाद्य वस्तुओं पर खर्च करते हैं. ऐसे में अगर खाद्य महंगाई ऊपरी स्तर पर रहेगी तो गांवों में इसका असर गहरा होना लाजमी है.

अर्थव्यवस्था में छाई सुस्ती के बीच महंगाई बढऩे का समाचार अच्छा नहीं है. राष्ट्रीय लोक वित्त एवं नीति संस्थान की सलाहकार और अर्थशास्त्री राधिका पांडे कहती हैं, ''खाद्य महंगाई का बढऩा निश्चित तौर पर खपत को प्रभावित करेगा.''

दूध, दालें, खाद्य तेल ऐसी चीजें हैं जिनकी मांग स्थिर है और इसे कम नहीं किया जा सकता. ऐसे में अगर जरूरी चीजों पर उपभोक्ता का खर्च बढ़ जाएगा तो गैर जरूरी वस्तुओं पर इसका असर पडऩा लाजिमी है. यानी महंगाई लंबी खिंची तो खपत और टूटेगी जिसका अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ेगा.

***

Advertisement
Advertisement