नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2019 पर लोकसभा में बहस में भाग लेते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था, ''मान कर चलिए एनआरसी आने वाला है.'' इससे पहले अपने झारखंड दौरे के दौरान वे एनआरसी के लिए वर्ष 2024 की समय सीमा निर्धारित करने की घोषणा कर चुके थे. फिर भी, 22 दिसंबर को दिल्ली में एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि उनकी सरकार ने पूरे देश के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) पर कभी कोई चर्चा नहीं की. एनआरसी से खुद को अलग करने की मोदी की कोशिश ने कई लोगों को हैरान कर दिया, क्योंकि इस विषय पर न सिर्फ उनके डिप्टी शाह ने समर्थन जताया है, बल्कि यह भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में भी शामिल है. यह फर्क साफ जताता है कि सरकार एनआरसी पर जनता के भारी विरोध के कारण नागरिकता (संशोधन) अधिनियम या सीएए पर काफी दबाव में आ चुकी है.
सीएए पाकिस्तान, अफगानिस्तान या बांग्लादेश से 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत आए हिंदू, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिख और पारसी आप्रवासियों को (जो पांच साल से भारत में निवास कर रहे हैं) भारत का नागरिक बनने की पात्रता देता है. पर इसमें मुस्लिम आप्रवासियों को शामिल नहीं किया गया है. इससे कई लोगों ने चिंता जताई है कि जब एनआरसी पेश होगा तो सभी गैर-मुस्लिम आप्रवासियों को तो नागरिकता मिल जाएगी, पर मुस्लिम प्रवासियों को अलग कर दिया जाएगा. सियासी विश्लेषकों का मानना है कि सीएए और एनआरसी के लिए इस हड़बड़ी का लक्ष्य असम और पश्चिम बंगाल हैं. दोनों राज्यों में 2021 में चुनाव होना है और भाजपा की चुनावी रणनीति अवैध मुस्लिम आप्रवासियों का डर दिखाकर हिंदू वोटों को इकट्ठा करना है.
लेकिन असम के लोग भाजपा के चुनावी गणित को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं, इसलिए वे विरोध में सड़कों पर उतर आए. उन्होंने आशंका जताई है कि बांग्लादेश से आए बांग्लाभाषी हिंदू प्रवासियों को दी जाने वाली नागरिकता उनकी भाषा और संस्कृति के लिए खतरा है. इधर, देश की राजधानी में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र भी विरोध का झंडा लहरा रहे हैं कि सीएए में मुस्लिम प्रवासियों को बाहर रखना भेदभावपूर्ण और भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वभाव का उल्लंघन है. विरोध हिंसक हो गया और दिल्ली पुलिस ने जामिया परिसर में घुस कर छात्रों के साथ क्रूरतापूर्ण तरीके से मारपीट की. देश भर के कई शिक्षण संस्थानों के छात्रों ने जामिया के छात्रों के साथ एकजुटता दिखाई और सीएए के खिलाफ विरोध दर्ज किया है.
यह आंदोलन देखते ही देखते पूरे देश में फैल गया और सभी लोग-अभिनेता, शिक्षाविद्, कार्यकर्ता और राजनीतिक—इसमें शामिल होने लगे. भाजपा शासित ज्यादातर राज्यों की पुलिस ने विरोध को दबाने के लिए बड़े कदम भी उठाए—इतिहासकार रामचंद्र गुहा को बेंगलूरू में हिरासत में लिया गया. दिल्ली और उत्तर प्रदेश में कुछ जगहों पर बेकाबू प्रदर्शनकारी हिंसक हो उठे और सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट कर दिया, पुलिस पर पथराव किया और उसकी चैकियों को भी जला दिया. बदले में पुलिस ने भी बंदूकें दागना शुरू कर दिया, जिससे असम में पांच और यूपी में 16 लोग मारे गए (हालांकि यूपी पुलिस ने गोलियां चलाने से इनकार किया है).
कहा नहीं जा सकता कि सीएए मोदी सरकार का सबसे विवादास्पद फैसला है. अनुच्छेद 370 का खात्मा और तीन तलाक को गैरकानूनी ठहराने जैसे फैसलों ने बड़ी संख्या में नागरिकों को सीधे तौर पर प्रभावित किया है. फिर भी, उन फैसलों पर मामूली विरोध उभरा. लिहाजा, सरकार निश्चिंत थी कि इस बार भी कुछ खास नहीं होगा. पर इस बार ऐसा ज्वार उठा कि सरकार परेशान हो गई.
सीएए पर दुनिया की सवालिया निगाहें भी उठने लगीं. सरकार पहले ही अनुच्छेद 370 खत्म करने के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवालों का सामना कर रही है. अमेरिका और ब्रिटेन में सैलानियों को भारत के अशांत माहौल के बारे में आगाह करने की खबरें मोदी की नींद उड़ा सकती हैं, क्योंकि मुश्किलों का सामना कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए पर्यटकों की संख्या में गिरावट चिंता का सबब होगी. मोदी सरकार राजस्व पैदा करने वाले इस क्षेत्र को डगमगाते नहीं देख सकती.
भाजपा के लिए घरेलू सियासी हालात भी अच्छे नहीं हैं. मोदी लहर ने मई में लोकसभा चुनावों में अच्छी बढ़त दी, पर राज्यों में इसका प्रभाव सीमित रहा—भाजपा के पाले से पिछले साल पांच राज्य निकल गए. हैरानी नहीं कि एनआरसी के बारे में मोदी का बयान भाजपा के झारखंड में हारने से एक दिन पहले आया.
प्रधानमंत्री के संबोधन का उद्देश्य जनता के गुस्से को शांत करना था, पर लोगों को संतोष नहीं हुआ. मोदी ने लोगों को भ्रमित करने के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि एनआरसी कांग्रेस सरकार ने असम में शुरू किया था. (असम एनआरसी के मूल में दो कारक हैं—1985 का असम समझौता और 2009 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका.) मोदी ने विपक्ष के इस आरोप को खारिज किया कि एनआरसी और सीएए के जरिए भाजपा सरकार हिंदू देश की वकालत कर रही है और उन्होंने रैली में भीड़ के समक्ष नारा लगाया: ''विविधता में एकता भारत की विशिष्टता है.''
भाजपा नेताओं को लगता है कि मोदी का यह आह्वान दरअसल अस्थायी तौर पर पीछे हटना है. भाजपा के एक नेता के मुताबिक, प्रधानमंत्री ने कहा है कि एनआरसी पर कोई चर्चा नहीं हुई है—लेकिन ऐसा तो नहीं कहा कि भविष्य में ऐसा नहीं होगा.
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