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उत्तराखंडः जंगल का कानून

उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश) जमींदारी उन्मूलन अधिनियम की भू-उपयोग से जुड़ी धारा 143 और कृषि भूमि की क्रय सीमा से जुड़ी धारा 154 मात्र ऐसे अवरोध थे जिनसे उत्तराखंड की, विशेषकर पहाड़ की, जमीनों को बेरोकटोक नहीं खरीदा जा सकता था

रामेश्वर गौड़
रामेश्वर गौड़
अपडेटेड 25 दिसंबर , 2019

अखिलेश पांडे

उत्तराखंड के जंगलों पर घिर आया खतरा फिलहाल टल गया है. 5 दिसंबर को केंद्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय ने उत्तराखंड सरकार की डीम्ड फॉरेस्ट की परिभाषा खारिज कर दी. 21 नवंबर को उत्तराखंड सरकार की अधिसूचना में डीम्ड फॉरेस्ट की नई परिभाषा दी गई थी. इसके मुताबिक, राज्य के राजस्व दस्तावेजों में दर्ज 10 हेक्टेयर क्षेत्र या उससे अधिक क्षेत्र के 60 फीसद से अधिक कैनोपी घनत्व वाले इलाके को ही जंगल माना जाएगा. साथ ही यह भी कहा गया कि इनमें 75 फीसद पेड़-पौधे स्थानीय नस्लों के होने चाहिए. डीम्ड फॉरेस्ट की इस नई परिभाषा से पर्यावरणविदों में भी चिंता छा गई थी. राज्य के रिजर्व और संरक्षित वनों में भी 60 फीसदी कैनोपी घनत्व वाले जंगल गिने-चुने ही हैं. ऐसे में राजस्व दस्तावेजों में दर्ज भूमि पर मौजूद जंगलों के अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा था.

राज्य सरकार का जंगलों को नए तरीके से परिभाषित करने वाला यह शासनादेश विवादों में आ गया. वह भी उस वक्त जबकि 4 और 7 मई, 2019 को बीरेन्द्र सिंह बनाम पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा था कि 23 साल पहले दिए गए दिशा-निर्देश पर उसने अब तक क्या किया? गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में कहा था कि जहां भी नैसर्गिक रूप से पेड़ उगे हों, उसे वन माना जाए.

5 दिसंबर के इस आदेश को वन कानूनों की समझ रखने वाले नैनीताल के अवकाश प्राप्त वनाधिकारी विनोद कुमार पांडे ने उत्तराखंड हाइकोर्ट में एक याचिका दायर कर चुनौती दी है. याचिका में कहा गया है कि यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के 1996 में टी.एन. गोडाबर्मन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले मे दिए गए निर्णय का उल्लंघन है.

विनोद कुमार पांडे ने अपनी याचिका में यह भी पूछा है कि क्या राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट की दी गई वनों की परिभाषा को मात्र एक आदेश से बदल सकती हैं? वनाधिकारों के लिए संघर्षरत सामाजिक कार्यकर्ता इस मामले को ग्रामीण समाज के हक-हुकूकों के लिए नए आसन्न खतरे के रूप मे देख रहे है. उन्हें अंदेशा है कि अदालती लड़ाई में वनों की परिभाषा कहीं ग्राम समाज की बची-खुची जमीनें भी न लील ले.

असल में, उत्तराखंड सरकार के इस आदेश में विशेष क्षेत्र को वन या डीम्ड फॉरेस्ट के रूप मे नए ढंग से परिभाषित करते हुए किसी भी आकार और प्रजातियों के बाग और फलों वाले क्षेत्र को छोड़कर 10 हेक्टेयर या उससे अधिक के ऐसे सघन क्षेत्र को, जिसमें 75 फीसद से ज्यादा स्थानीय वृक्ष प्रजातियां हों, भी वन की श्रेणी में शामिल करने का निर्णय लिया गया है. वनों की इस नई परिभाषा से साफ है कि 60 प्रतिशत से कम केनोपी और 10 हेक्टेयर से कम क्षेत्रफल वाले इलाके के साथ-साथ ऐसे सघन क्षेत्रों, जिसमें 75 प्रतिशत से कम स्थानीय वृक्ष प्रजातियां हों, को भी वन नहीं माना जाएगा. ऐसी वनभूमि को गैरवनीय कार्यों के लिए उपयोग में लाया जा सकता है.

वनप्रेमियों और पर्यावरणविदों के अनुसार उत्तराखंड में आरक्षित वन, संरक्षित वन, सिविल सोयम (सामाजिक वानिकी) वन, ग्राम वन, निजी वनों के अलावा ऐसी वन भूमि भी है जिसे अवर्गीकृत श्रेणी में रखा गया है. एक अनुमान के मुताबिक उत्तराखंड में वन विभाग के अधीन लगभग 55.407 वर्ग किमी अवर्गीकृत और अन्य अवर्गीकृत श्रेणी के अंतर्गत 1,444 वर्ग किमी क्षेत्र आता है. ऐसे में वन प्रेमियों और पर्यावरणविदों को अंदेशा है कि आरक्षित वनभूमि की श्रेणी में न आने वाले वृक्षरेखा से ऊपर के प्रचुर जैव विविधता वाले उच्च हिमालयी इलाके और बुग्याल क्षेत्र इस आदेश की गलत व्याख्या का शिकार हो सकते हैं क्योंकि यहां 60 फीसद कैनोपी घनत्व का मानक पूरा नहीं होगा. जानकारों का यह भी मानना है कि इसके पीछे वन संरक्षण अधिनियम, 1980 को कमजोर करना भी मकसद हो सकता है.

पूर्व राजस्व अधिकारी रहे सुरेंद्र सिंह पांगती कहते हैं, ''उत्तराखंड (उत्तर प्रदेश) जमींदारी उन्मूलन अधिनियम की भू-उपयोग से जुड़ी धारा 143 और कृषि भूमि की क्रय सीमा से जुड़ी धारा 154 मात्र ऐसे अवरोध थे जिनसे उत्तराखंड की, विशेषकर पहाड़ की, जमीनों को बेरोकटोक नहीं खरीदा जा सकता था.'' उद्योग खड़ा करने के नाम पर जमीन की खरीद-फरोख्त करने वाले लोगों को यह पसंद नहीं था और वनों की नई परिभाषा शायद उसी अवरोध को हटाने की कवायद थी.

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