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ताकतवर-रसूखदारः रचनात्मक प्रतिरोध

वसीम बरेलवी बरेली की हिंदू-मुसलमान मिश्रित आबादी वाली बस्तियों में बरसों से चिकित्सा शिविर इस मकसद से लगवा रहे हैं कि ''दोनों संप्रदाय की महिलाएं इलाज और जांच वगैरह के बहाने 8-10 घंटे साथ गुजारें और उनमें अपनापा बढ़े, एक-दूसरे को जानें.

वसीम बरेलवी
वसीम बरेलवी
अपडेटेड 23 अक्टूबर , 2019

कुछ लोगों के लिए संघर्ष सिर्फ मुश्किलों का नाम नहीं बल्कि तजुर्बों की ऐसी दास्तान होती है, जो उन्हें अलहदा तेवर देती है. साहित्य, कला और संस्कृति जगत में दिग्गजों की फेहरिस्त में ऐसी शख्सियतें शामिल हैं जिन्होंने अपनी जिद और कुछ कर गुजरने के जुनून से बहुत कुछ सहा और फिर हासिल भी किया. चलन से बाहर उनके बागी तेवरों ने उन्हें शोहरत भी बख्शी और कीमत भी

वसीम बरेलवी

79 वर्ष शायर

क्योंकि वे अपनी शायरी में हिंदुस्तानी तहजीब को गहरी समझ के साथ आसान लफ्जों में कुछ इस तरह से बयान करते हैं कि वे हिंदुस्तान की रूह के प्रवक्ता बन गए हैं

क्योंकि रोजमर्रा की विडंबनाओं को गिरफ्त में लेने वाले उनके शेर संसद, विधानसभाओं, फिल्मों, कथा पंडालों से लेकर चौक-चौराहों पर कभी भी आपको सुनने को मिल सकते हैं

क्योंकि मुशायरों में श्रोता उन्हें सुनने की आस में सब्र के साथ अंत तक बैठे रहते हैं

क्योंकि अपने शहर बरेली में दंगों के बाद कर्फ्यू में भी वे शांति मार्च निकालकर हजारों लोगों को साथ जोड़ लेने का माद्दा रखते हैं

क्योंकि राष्ट्रभक्ति के उफान वाले इस दौर में वे थोड़े-से फायदे के लिए खाने-पीने की चीजों तक में जानलेवा मिलावट करने वालों को असली देशद्रोही कहने का साहस रखते हैं

दूर की सोच

बरेली की हिंदू-मुसलमान मिश्रित आबादी वाली बस्तियों में बरसों से चिकित्सा शिविर इस मकसद से लगवा रहे हैं कि ''दोनों संप्रदाय की महिलाएं इलाज और जांच वगैरह के बहाने 8-10 घंटे साथ गुजारें और उनमें अपनापा बढ़े, एक-दूसरे को जानें. यह प्रयोग कई दूसरे शहर भी अपना रहे हैं''.

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