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पंचायत की चुनावी बिसात

राज्य के पंचायत चुनावों के जरिए भाजपा फिर अपनी ताकत दिखाना चाहती है, जबकि कांग्रेस को सरकार की गलतियों से उम्मीद

अमित साह
अमित साह
अपडेटेड 7 अक्टूबर , 2019

उत्तराखंड में पंचायत चुनावों का बिगुल बज चुका है. हरिद्वार जिले को छोड़कर राज्य के बाकी 12 जिलों के त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में तीन चरणों में चुनाव होने हैं. इन जिलों में कुल वोटरों की संख्या 43,11,423 है. ये वोटर जिला पंचायत, क्षेत्र पंचायत और ग्राम पंचायत के कुल 66,399 पदों के लिए मतदान करेंगे. इनमें ये मतदाता ग्राम प्रधान, ग्राम पंचायत सदस्य, क्षेत्र पंचायत सदस्य और जिला पंचायत सदस्य का चुनाव सीधे करेंगे.

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की राज्य सरकार ने इन चुनावों को लेकर पेश पंचायती राज संशोधन अधिनियम पारित कराकर दो से अधिक बच्चों के माता-पिता को चुनाव लडऩे से रोकने का प्रबंध किया था. लेकिन नैनीताल हाइकोर्ट ने इसे ग्राम प्रधान के चुनाव के लिए अमान्य कर दिया. इस निर्णय को विशेष अनुमति याचिका के जरिए भाजपा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहां भी कोई राहत नहीं मिली. सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया.

ये चुनाव सूबे के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं हैं. 2017 के विधानसभा चुनावों से लगातार जीत का परचम लहरा रही भाजपा के लिए इन त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में यह सिलसिला बरकरार रखने की चुनौती होगी. इन चुनावों के परिणाम को मुख्यमंत्री के ढ़ाई साल के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड भी माना जाएगा. इस दौरान हुए स्थानीय निकाय, नगर निगम चुनाव, सहकारिता चुनाव से लेकर उपचुनाव और लोकसभा चुनाव में भी भाजपा ने जीत हासिल की और मुख्यमंत्री ने इन्हें अपने कार्यकाल पर जनता की मुहर के रूप में भुनाया. हालांकि, यह भी हकीकत है कि अमूमन सत्तारूढ़ पार्टी ही सूबे में पंचायत चुनाव जीतती रही है.

जिन बारह जिलों में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव होने हैं, उनमें छह जिले जिला पंचायत और ग्राम प्रधान की सीटों के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं. इसी कारण राज्य के राजनैतिक दलों का ध्यान इन छह जिलों में सबसे ज्यादा है. ये छह जिले हैं—अल्मोड़ा, टिहरी, पिथौरागढ़, पौड़ी, देहरादून और ऊधमसिंह नगर. इनमें जिला पंचायत सदस्यों की 30 से ज्यादा सीटें हैं. अल्मोड़ा और टिहरी जैसे पर्वतीय जिलों में जिला पंचायत सदस्यों की सीटें देहरादून और ऊधमसिंह नगर से भी ज्यादा हैं. इन दोनों ही जगहों पर जिला पंचायत सदस्यों की सीटें 45-45 हैं, जबकि देहरादून में 30 और ऊधमसिंह नगर से 35 जिला पंचायत सदस्य चुनकर आते हैं. वहीं, चंपावत जैसे जिले भी हैं, जहां सिर्फ 15 जिला पंचायत सीटें हैं.

भाजपा ने जहां प्रदेश में मजबूत संगठन खड़ा किया है, वहीं राज्य के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के संगठन का हाल यह है कि प्रदेश अध्यक्ष चुने गए प्रीतम सिंह अभी तक नई कार्यकारिणी तक नहीं बना सके हैं. ऐसे में कांग्रेस संगठन की कमजोर स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. यही कारण है कि इन चुनावों से ठीक पहले भी कई कांग्रेसी नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में चले गए हैं.

कांग्रेस अपने संगठन को मजबूत करने के बजाए सरकार की गलतियों के आधार पर त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव जीतने का दावा कर रही है. राजनैतिक प्रेक्षकों के मुताबिक, ये चुनाव कांग्रेस के लिए इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले होने वाले ये आखिरी चुनाव हैं. इन चुनावों में प्राप्त सीटों से राजनैतिक दलों को राज्य में अपना जनाधार दिखाने का मौका मिलेगा. इसी कारण भाजपा का संगठन इन चुनावों को गंभीरता से लेता नजर आ रहा है.

इसके बावजूद, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह का दावा है कि प्रदेश की जनता भाजपा की सरकार की कथनी और करनी से संतुष्ट नहीं है. उनका कहना है, ''जनता के बीच आक्रोश बढ़ता जा रहा है, इसका सीधा लाभ कांग्रेस को मिलेगा. पार्टी चुनावों के लिए निश्चित रणनीति के तहत आगे बढ़ रही है. इसके नतीजे बता देंगे कि भाजपा की जमीनी हकीकत क्या है.''

वहीं, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट कहते हैं, ''केंद्र में मोदी सरकार और प्रदेश में त्रिवेंद्र सरकार की नीतियों के प्रति जनता आशान्वित है. चुनावी रणनीति के तहत वरिष्ठ पदाधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई है. इस बार चुनाव में पार्टी की बंपर जीत तय है.'' जाहिर है, पंचायत चुनावों के बहाने राज्य में सियासी बिसात एक बार फिर सज गई है.

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