सऊदी अरामको के तेल प्रतिष्ठानों पर 14 सितंबर को यमन के हूती विद्रोहियों के ड्रोन हमलों ने महज दुनिया भर में तेल की आपूर्ति को ही बाधा नहीं पहुंचाई है. उन्होंने इस इलाके में तनाव को भी बढ़ा दिया है—खासकर अमेरिका इन हमलों के पीछे ईरान की तरफ उंगली उठा रहा है—और यह तेल की कीमतों में उछाल का दूसरा कारण बन सकता है.
हमले से एक दिन पहले ब्रेंट कच्चे तेल का दाम 60.22 डॉलर प्रति बैरल चल रहा था. 16 सितंबर को इसकी कीमत छलांग लगाकर 69.02 डॉलर प्रति बैरल हो गई. हालांकि बाद के हक्रते में कीमतों में नरमी आई और कीमत घटकर 63.48 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई, पर दुनिया में तेल के सबसे बड़े आयातकों में से एक भारत को इसकी चुभन महसूस होने लगी. हमले के बाद लगातार सात दिनों तक भारत में तेल की घरेलू कीमतों में इजाफा होता रहा.
मुंबई में 23 सितंबर से शुरू होने वाले हफ्ते में एक लीटर पेट्रोल के दाम 1.88 रुपए बढ़कर 79.55 रुपए पर पहुंच गए, जो 12 महीनों का सबसे ऊंचा दाम था. एक लीटर डीजल की कीमत 1.5 रुपए बढ़कर 70.19 रुपए पर पहुंच गई. विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अरामको अपने दावे के मुताबिक, सितंबर के आखिर तक अपना तेल उत्पादन पहले के स्तर तक बहाल कर पाता है, तो एक बैरल कच्चे तेल का दाम 70 डॉलर के नीचे बना रहेगा.
दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता भारत अपनी 80 फीसद से ज्यादा कच्चे तेल और करीब 40 फीसद प्राकृतिक गैस की जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है. ईंधन सुरक्षा में सुधार की तमाम चर्चाओं के बावजूद भारत में घरेलू तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन हाल के दिनों में धीमा पड़ा है, जिसके नतीजतन तेल के आयात पर देश की निर्भरता और ज्यादा बढ़ गई है. बदतर तो यह कि इस ड्रोन हमले से पहले ही, अमेरिका और ईरान के बीच टकराव से भड़के पश्चिम एशिया के तनाव ने भारत की आयात दुश्वारियों को बढ़ा दिया था.
इस साल मई में भारत को ईरान से तेल आयात रोकने पर मजबूर होना पड़ा—जहां से पिछले वित्तीय साल में भारत ने अपना करीब 10 फीसद तेल आयात किया था. इसलिए क्योंकि अमेरिका ने ईरान से निर्यात पर लगाए गए अपने प्रतिबंधों से भारत सहित आठ देशों को दी गई छूट जारी रखने से इनकार कर दिया था (मई, 2018 में ईरान परमाणु समझौते से बाहर आने के बाद अमेरिका ने ईरान और उसके साथ व्यापार जारी रखने वाले देशों पर कड़ी पाबंदियां लगा दी थीं). हालांकि रिपोट्र्स के मुताबिक, भारत ईरान के साथ एक व्यापार समझौते पर काम कर रहा है जिसमें हार्ड करेंसी में भुगतान को दरकिनार कर दिया जाएगा, जो अमेरिकी पाबंदियों का मुख्य निशाना है.
पाबंदियों से भारत के कच्चे तेल के आयात को पहले ही चोट पहुंची है. इस वित्तीय साल की अप्रैल-जून की अवधि में भारत ने रोज 45 लाख बैरल कच्चे तेल का आयात किया—जो पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 1,50,000 बैरल कम था. केयर रेटिंग्ज की एक रिपोर्ट बताती है कि कच्चे तेल के आयात में इस कमी के बावजूद खपत के आधार पर भारत की आयात पर निर्भरता 83.4 फीसद से बढ़कर 84.9 फीसद हो गई है.
14 सितंबर के हमले के कुछ और प्रतिकूल नतीजे हुए हैं. ईंधन के दाम में वृद्धि सरकार के लिए वैसे भी शुभ संकेत नहीं है—गद्दीनशीन पार्टी महाराष्ट्र और हरियाणा में 21 अक्तूबर को चुनाव का सामना करने जा रही है. इसके अलावा भी ईंधन के ऊंचे दाम सरकार की राजकोषीय घाटे (सरकार के खर्चों के मुकाबले उसकी आमदनी में कमी) की स्थिति को बिगाड़ देंगे. कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की वृद्धि के साथ देश के राजकोषीय घाटे में 10 आधार अंकों (0.1 फीसदी) की वृद्धि होगी.
जिस सरकार ने उद्योग की धारणा में सुधार के लिए कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती की है और 1.45 लाख करोड़ रु. से हाथ धो बैठी है, उसके लिए तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी बुरी खबर ही है. चुनावों से पहले ईंधन के दामों में कमी लाने के लिए अगर केंद्र और राज्य सरकारों को इस पर करों में कटौती करनी पड़ती है, तो उनके रोकड़े पर और ज्यादा दबाव आ जाएगा. ईंधन के दामों में किसी भी वृद्धि से कंपनियों के मुनाफे भी कम होंगे और अगर कीमत में वृद्धि का बोझ उपभोक्ता पर डाला जाता है, तो महंगाई के बढऩे की पूरी संभावना है.
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