भगवान का अपना देश' कहे जाने वाला राज्य लंबे समय से भगवा ताकतों का प्रतिरोध करता रहा है. भाजपा ने जब अधिकांश उत्तरी हिस्सों में विजय प्राप्त कर ली और पूर्वी हिस्सों में भी जगह बना ली तब भी कर्नाटक को छोड़ कर दक्षिण के अन्य राज्यों में जमीन तलाश पाना उसके लिए कठिन बना रहा. वामपंथियों के हिंदू-बहुल गढ़ केरल ने कांग्रेस को तो जगह दी, लेकिन उस पार्टी को कभी नहीं घुसने दिया जो हिंदुओं की पैरोकार होने का दावा करती है.
यहां तक कि जब भाजपा ने सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे को भुनाने की कोशिश की तो इसका लाभ कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को मिला जिसने राज्य की 20 लोकसभा सीटों में से 19 जीतीं और माकपा को अलप्पुझा की एक सीट से संतोष करना पड़ा. 2016 के विधानसभा चुनाव में नेमोम क्षेत्र से ओ. राजगोपाल की जीत से राज्य में चुनावी खाता खोलने वाली पार्टी की जीत की उम्मीदें धरी रह गईं.
लेकिन विरोध का यह ज्वार अब पलट सकता है. राज्य में वामपंथियों की दुर्दशा के बाद अब भारतीय जनता पार्टी के आक्रामक सदस्यता अभियान के दौरान मलयाली लोग पार्टी में शामिल हो रहे हैं. इनमें अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्य भी हैं. एक टोल-फ्री नंबर पर मिस्ड कॉल से सदस्यता ग्रहण करने के जून में शुरू हुए अभियान से लगभग 60,000 लोगों ने भगवा पार्टी में प्रवेश किया है.
पार्टी की राज्य इकाई के अध्यक्ष पी. एस. श्रीधरन पिल्लै का दावा है, ''जून से अब तक भाजपा में लगभग सात लाख नए सदस्य शामिल हो चुके हैं और अब हमारे 23 लाख सदस्य हैं.'' वे यह भी कहते हैं, ''हमने सदस्यता अभियान का पहला चरण अगस्त में पूरा कर लिया है. हम अभियान को अगले दिसंबर तक जारी रखकर केरल में सदस्य संख्या 35 लाख पहुंचाएंगे.'' मालूम हो कि केरल में विधानसभा चुनाव 2021 में होने हैं.
इस बीच, 1 सितंबर को मोदी सरकार ने आरिफ मोहम्मद खान को केरल का राज्यपाल नियुक्त किया. शाहबानो मामले पर राजीव गांधी की कैबिनेट छोडऩे वाले पूर्व केंद्रीय मंत्री खान तीन तलाक और मुस्लिम समुदाय में सुधारों पर भाजपा का मुखर समर्थन करते हैं.
पिल्लै कहते हैं, ''केरल ने भाजपा-विरोधी रुख छोड़ दिया है और लोग नरेंद्र मोदी के विकास के एजेंडे की ओर झुक रहे हैं.'' राष्ट्रीय स्तर पर बनी हवा ने भी केरल के लोगों को भाजपा की ओर मोडऩे में भूमिका निभाई है. अनुच्छेद 370 के तहत कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने और इस पर विपक्ष की कमजोर प्रतिक्रिया ने शिक्षित युवा वर्ग के बीच भी पार्टी के प्रति समर्थन पैदा किया है. वरिष्ठ नेता ओ. राजगोपाल का कहना है, ''अब भाजपा को रोकने वाला कोई नहीं है.''
उधर, माकपा ने राज्य में नई कार्य योजना बनाई है. माकपा के राज्य सचिव के. बालाकृष्णन ने इंडिया टुडे को बताया, ''लोकसभा चुनाव के बाद लोगों का मिजाज समझने के लिए हमने महीने भर तक घर-घर जाकर लोगों से मुलाकात की. प्रतिक्रियाओं के आधार पर संगठनात्मक स्तर पर बड़े बदलाव करने और नेताओं-कार्यकर्ताओं के लिए आचार संहिता जारी करने का निर्णय लिया है.''
भाजपा का दावा है कि उसने जून में शुरू किए सदस्यता अभियान से अब तक सात लाख नए सदस्यों को जोड़ा है.
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