अगर भारत की अर्थव्यवस्था इस कदर चौपट होती जा रही है, तो जरा कश्मीर की आर्थिक हालत की कल्पना कीजिए, जिसे 5 अगस्त को जबरन ठप कर दिया गया और संचार की सुविधाओं के साथ जनजीवन को रोक दिया गया.
कश्मीर के बागबानी उद्योग का सालाना टर्नओवर 8,000 करोड़ रुपए है और यह 35 लाख परिवारों को रोजगार देता है. दक्षिण कश्मीर के सेब उगाने वाले इलाके में शोपियां की फल और सब्जी मंडी सेब तोडऩे के इस सीजन में वीरान पड़ी है. यह घाटी के तीन बड़े बाजारों में से एक है और साल के इन दिनों यहां रोज 4,000 लोगों को आते और फलों से लदे 1,000 ट्रकों को देशभर के बाजारों में जाते देखा जाता रहा है. इसका रोज का टर्नओवर 4 करोड़ रुपए हुआ करता है.
सुरक्षा की हालत और संचार साधनों के बंद होने के बावजूद किसानों ने अपनी उपज दिल्ली की आजादपुर मंडी में भेजने के लिए भाड़ा चुका दिया. मगर सारा माल अचानक एक ही बाजार में आ जाने की वजह से कीमतें गिर गईं. शोपियां में फल उगाने वालों और जमींदारों की एसोसिएशन के प्रेसिडेंट मुश्ताक अहमद मलिक कहते हैं कि पेड़ों से सेब तोडऩे के बाद क्या करें, उन्हें नहीं पता. वे कहते हैं, ''इस साल की बंपर फसल की क्वालिटी को देखते हुए ऊंची कीमतों की उम्मीद थी.''
कई किसानों ने फलों को बगीचों में सडऩे के लिए छोड़ देने का रास्ता चुना. सोपोर के एक किसान और कारोबारी कहते हैं कि अपनी फसल कौडिय़ों के मोल बेचने और 'ज्यादती का शिकार' होने के बजाए वे पूरे साल की कमाई 'कुर्बान' कर देना पसंद करेंगे.
संचार साधनों पर पाबंदी की बुरी मार सूचना प्रौद्योगिकी के फलते-फूलते क्षेत्र को भी झेलनी पड़ी है. इंटरनेट पर पाबंदी बेशक कश्मीर के लिए नई नहीं है. हिंदुस्तान किसी भी दूसरे देश से ज्यादा इंटरनेट बंद करता है और इनमें से सबसे ज्यादा पाबंदियां घाटी में लगाई जाती हैं. आइटी कंपनियां 5 अगस्त से ही घाटा बता रही हैं जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती. कुछ का कहना है कि उनके विदेशी क्लाइंट दूसरी कंपनियों के पास चले गए जो अचानक आने वाली इन रुकावटों के बगैर उनके काम पूरे करके दे सकती हैं.
श्रीनगर के बाहरी छोर पर रंगरेठ के इंडस्ट्रियल इलाके में कारोबारी मुख्यालयों के दरवाजों पर हाथ से लिखे नोटिस चस्पां कर दिए गए हैं, जिनमें कर्मचारियों को हिदायत दी गई है कि जब इंटरनेट बंद है तो काम के लिए आकर 'अनावश्यक रूप से' 'खतरे' का जोखिम न उठाएं. हर हफ्ता गुजरने के साथ कंपनियां अपना आकार घटाने को मजबूर होती जा रही हैं. एक आइटी कंपनी के डायरेक्टर अफसोस के साथ कहते हैं, ''हमने वर्षों स्टाफ को प्रशिक्षित किया और अब उन्हें हमें जाने देना पड़ रहा है क्योंकि यहां बिजनेस कर पाने की कोई गारंटी नहीं है. असल में, हम कारोबार से बाहर होने के कगार पर हैं.'' यहां तक कि जिन कंपनियों में स्टाफ को बनाए रखा गया है, वहां भी छंटनी की आशंका मंडरा रही है, क्योंकि हालात सामान्य होने की कोई सूरत नजर नहीं आ रही.
अनुच्छेद 370 को खत्म करने और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के फैसले से पहले होटल और हाउसबोट जाहिरा तौर पर 80 फीसद भरे रहते थे. घरेलू और विदेशी सैलानी लगातार ज्यादा से ज्यादा तादाद में आ रहे थे, अमरनाथ यात्रा को अब तक की सबसे कामयाब यात्रा बताया जा रहा था. अब लगता है कि वे नौ दिन चले और अढाई कोस पहुंचे. पर्यटन के डायरेक्टर निसार अहमद वानी कहते हैं कि 95 फीसद होटलों और हाउसबोट के मालिकों ने अपने स्टाफ में कटौती कर दी है.
कश्मीर चैंबर्स ऑफ कॉमर्स के वाइस-प्रेसिडेंट नसीर हामिद खान कहते हैं कि जहां कारोबारों को कटौतियां और घाटा सहना पड़ रहा है, वहीं बैंकों ने कर्जों और उधारियों पर ब्याज वसूलना जारी रखा है. वे कहते हैं, ''फिलहाल हमारा पूरा ध्यान हालांकि मानवीय और राजनैतिक पहलुओं पर है. कटुता बढ़ रही है.'' बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल से आने वाले कुशल और अकुशल मजदूरों पर निर्भर कारोबार तकलीफ झेल रहे हैं क्योंकि ये मजदूर अपना सामान बांधकर जा चुके हैं.
प्रशासन की विकास योजनाएं भी ठप पड़ी हैं. स्कूलों, कॉलेजों और पुलों का काम भी रुक गया है. पब्लिक हेल्थ इंजीनियरिंग महकमे के एक चीफ इंजीनियर अब्दुल वाहिद कहते हैं कि 1,400 करोड़ रुपए की 750 जल परियोजनाएं, जो पूरी होने के करीब थीं, अधर में लटक गई हैं.
विडंबना यह है कि कश्मीर वैश्विक निवेश शिखर सम्मेलन की मेजबानी की तैयारी कर रहा है जिसमें सरकार के अफसरों का दावा है कि 10,000 करोड़ रुपए के करीब निवेश आ सकता है, जबकि घाटी के प्रमुख कारोबारी हिरासत में हैं. उनके परिवारों को न तो उनकी गिरफ्तारी की वजह बताई गई और न ही रिहाई की तारीख. बाकी कश्मीर की तरह उन्हें भी इंतजार करना होगा.
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