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पहलू खानः इंसाफ की लंबी लड़ाई

पहलू खान को लेकर ज्यादातर दोष जांच अधिकारियों के मत्थे मढ़ा जा रहा है क्योंकि वे अदालत में पुख्ता मामला पेश नहीं कर पाए. जाहिर है, खान के परिवार की इंसाफ की आस अब एसआइटी के भरोसे है.

पहलू खान की पीट-पीट कर हत्या के बाद नई दिल्ली में धरना-प्रदर्शन करते उनके परिजन
पहलू खान की पीट-पीट कर हत्या के बाद नई दिल्ली में धरना-प्रदर्शन करते उनके परिजन
अपडेटेड 26 अगस्त , 2019

हरियाणा के डेयरी किसान पहलू खान को 2017 में पीट-पीटकर मार देने के आरोपी छह लोग अदालत से बरी हो गए. अलवर की अपर जिला और सत्र न्यायाधीश सरिता स्वामी ने 14 अगस्त को अपने फैसले में पुलिस जांच की लापरवाहियां गिनाते हुए उस पर सवाल उठाए. बचाव पक्ष के वकील ने रिपोर्टरों से कहा कि पुलिस ने 'कई खामियां' छोड़ दी थीं, जिनमें एक यह थी कि अभियुक्तों की पहचान करने वाले वीडियो को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा ही नहीं गया.

दिसंबर, 2018 में भाजपा की जगह सत्ता संभालने वाली कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने खामियों की जांच और सुधार के लिए विशेष जांच दल (एसआइटी) गठित कर दिया है. खान के बेटे इरशाद ने कहा कि उनके परिवार को धक्का लगा है पर वे मामले को ऊपरी अदालतों में जरूर ले जाएंगे. गहलोत सरकार ने फैसले के खिलाफ अपील करने का संकेत भी दिया है.

हालांकि, जांच पर नजर रखने वाले किसी भी शख्स को पुलिस की कोशिशों को लेकर अदालत की तीखी आलोचना से कोई हैरानी नहीं हुई. शुरुआत से ही राजनैतिक लॉबियां, दबाव समूह और एक्टिविस्ट पुलिस की जांच पर कड़ी नजर रखे हुए थे. खान की पीट-पीटकर हत्या और उनके हाथों संभवत: गाय की तस्करी के मामलों में एक साथ जांच शुरू कर दी गई थी.

खान ने जैसा बताया था, उन्हें करीब 200 लोगों की भीड़ ने जयपुर-दिल्ली हाइवे पर राजस्थान के बहरोड़ के नजदीक 1 अप्रैल, 2017 को रोक लिया था और उनकी पिटाई की थी. खान के मुताबिक, एक मेले से वैध तरीके से खरीदे मवेशियों को साथ लेकर वे अपने गृहनगर लौट रहे थे. उनकी बेरहम पिटाई में शामिल जो लोग वीडियो में देखे गए, उनमें कथित तौर पर 19 वर्षीय 'छात्र नेता' विपिन यादव भी था. उसका नाम मूल प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआइआर) में नहीं था. इसी एफआइआर में खान ने, जो अस्पताल में भर्ती और लहूलुहान थे, भीड़ में शामिल छह लोगों के नाम बताए. सेलफोन के डेटा के आधार पर यह बताकर कि ये सभी छह लोग घटनास्थाल पर मौजूद नहीं थे, पुलिस ने सितंबर 2017 में उन्हें क्लीनचिट दे दी थी.

जांच करने वाले पुलिसकर्मियों ने मीडिया के सामने हैरानी जताई थी कि खान के लिए वह इलाका जाना-पहचाना नहीं था, ऐसे में उन्होंने छह लोगों के नाम कैसे लिए. वैसे खान ने जिन लोगों के नाम लिए, उनके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल कर दिया गया. पुलिस ने खान के खिलाफ भी आरोप दायर किए, क्योंकि उन्हें इसके कोई सबूत नहीं मिले कि उनके ट्रक में मिले मवेशी उन्होंने खरीदे थे. खान के बेटे दावा करते हैं कि मवेशियों की खरीद के कागजात भी कथित गोरक्षकों ने तहस-नहस कर दिए. मारपीट के दो दिन बाद अस्पताल में भर्ती खान ने डॉक्टरों से पूछा कि क्या वे घर जा सकते हैं.

डॉक्टरों ने मना कर दिया था. कुछ घंटों बाद खान की मौत हो गई. डॉक्टरों का कहना था कि उन्हें दिल का दौरा पड़ा था और 1 अप्रैल, 2017 को उन्हें दिल के विशेषज्ञ डॉक्टर के पास ले जाया गया था. पर ऑटोप्सी रिपोर्ट में मौत का कारण टूटी हुई पसलियों से अंदरूनी तौर पर बहुत ज्यादा खून का बहना बताया गया; उनकी फेफड़ों और सीने की मांसपेशियां भी टूट-फूट गई थीं.

खान की मौत को लेकर देश भर में कोहराम मच गया और पुलिस पर दोषियों को पकडऩे का दबाव बन गया. शुरुआती जांच में शामिल एक पुलिस अफसर ने यहां तक दावा किया कि 'वामपंथी कार्यकर्ताओं' ने खान को भाजपा और आरएसएस के नजदीक माने जाने वाले स्थानीय गोरक्षकों को नामजद करने की 'पट्टी पढ़ाई' होगी. ये भी कयास लगाए गए कि एक पुलिस अफसर ने खान के दस्तखत वाले सादे कागज पर ये छह नाम जोड़ दिए. अदालत ने कहा कि पुलिस यह पता लगाने की जरा भी कोशिश करती नहीं दिखाई दी कि ये छह नाम एफआइआर में कैसे आए. अक्तूबर, 2017 में यादव और तीन नाबालिगों सहित नौ लोगों के नाम एक नई एफआइआर में डाल दिए गए. उनकी पहचान घटनास्थल के सेलफोन फुटेज के आधार पर की गई.

अलवर की अदालत की जज ने कहा कि इस फुटेज पर इतने दाग-धब्बे थे कि उससे यह पूरी तरह साबित नहीं होता कि आरोपित शख्स वही थे जिन्होंने खान को पीटा. जज ने एक टीवी पत्रकार का वह गोपनीय वीडियो भी सबूत के तौर पर स्वीकार करने से मना कर दिया, जिसमें यादव ने कथित तौर पर घटना में अपने शामिल होने की डींग हांकी थी. वहीं जिस मोबाइल फोन से घटना का वीडियो बनाया गया था, उसके मालिक को अदालत में पेश नहीं किया गया. अदालत के सामने यह बात भी साफ नहीं हुई कि मोबाइल फोन के फुटेज को सत्यापन के लिए फॉरेंसिक लैब को भेजा गया या नहीं.

अदालत को पुलिस की प्रक्रिया को लेकर भी संदेह था, खासकर तब जब नए आरोपियों की पहचान के लिए न तो परेड करवाई गई और न ही इरशाद आरोपियों को अदालत में पहचान सके. यही नहीं, पुलिस ने कहा कि पिछले सितंबर में अदालत आते वक्त इरशाद और उनके साथियों के ऊपर गोली चलाए जाने का कोई सबूत नहीं था. ज्यादातर दोष जांच अधिकारियों के मत्थे मढ़ा जा रहा है क्योंकि वे अदालत में पुख्ता मामला पेश नहीं कर पाए. जाहिर है, खान के परिवार की इंसाफ की आस अब एसआइटी के भरोसे है.

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