मार्च की 2 तारीख को युवजन श्रमिक रायथू कांग्रेस (वाइएसआरसी) प्रमुख जगन मोहन रेड्डी हैदराबाद में त्रिदंडी चिन्ना जियार स्वामी से मिले. जाहिर है, उन्होंने आंध्र प्रदेश में होने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी की चुनावी सफलता के लिए आशीर्वाद लिया. दिलचस्प बात यह है कि स्वामी से जगन की मुलाकात के पीछे तेलंगाना के मुख्यमंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) प्रमुख के. चंद्रशेखर राव भूमिका निभा रहे थे.
लेकिन, तेलंगाना के अलग राज्य बनने का विरोध करने वाले जगन और आंध्र प्रदेश में राज्य के बंटवारे के लिए जिम्मेदार माने जाने वाले चंद्रशेखर राव के बीच नजदीकी सपाट राजनीति में फिट नहीं दिख रही. खासकर, तब जब आंध्र प्रदेश में लोकसभा और विधानसभा तथा तेलंगाना में लोकसभा का चुनाव होने में एक महीने से भी कम समय बचा है.
दरअसल, दोनों नेताओं के बीच उभर रहे सियासी समीकरण की डोर हैदराबाद से 1,500 किलोमीटर दूर स्थित दिल्ली से जुड़ी है, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को रोकने के लिए पूरा विपक्ष और एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन रहे दल भी मोदी के खिलाफ एकजुट हो गए हैं. ऐसे में राजग सहयोगियों की लगातार घटती संख्या और बचे हुए सहयोगियों की मुखरता से भाजपा को भरोसेमंद भावी सहयोगियों (चुनाव बाद समर्थन देने वाली पार्टी) की जरूरत का एहसास हो गया है. इसी जरूरत के लिहाज से केसीआर और जगन को राजग खेमा एक-साथ लाने और साधने की कोशिश में है.

दरअसल, 2014 में केंद्र में मोदी के नेतृत्व में राजग सरकार बनने के बाद से इस गठबंधन के 14 दलों ने भाजपा का साथ छोड़ दिया. वैसे, जनता दल (यूनाइटेड) के रूप में बिहार में भाजपा को एक मजबूत सहयोगी जरूर मिला, लेकिन तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के रूप में राजग कुनबे से एक बड़ा घटक (16 सांसद) बाहर चला गया. राजग के जो मौजूदा सहयोगी हैं उनमें शिवसेना, जद (यू), शिरोमणि अकाली दल और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कडगम (अन्नाद्रमुक) प्रभावी तो हैं, लेकिन भाजपा के साथ इनका विश्वास का संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.
भाजपा सूत्रों का कहना है कि महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ भाजपा का पहले जैसा विश्वास अब नहीं रहा. दोनों दलों के रिश्ते इस हद तक बिगड़ चुके थे कि शिवसेना ने पिछले साल पार्टी की कार्यकारिणी में यह प्रस्ताव तक पारित कर दिया था कि वह 2019 का लोकसभा और विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ेगी. हालांकि भाजपा किसी तरह से शिवसेना के साथ गठबंधन बचाने में सफल रही लेकिन दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच वैमनस्य चरम पर पहुंच चुका है.
दोनों दलों में गठबंधन के बावजूद स्थिति यह है कि महाराष्ट्र भाजपा की प्रभारी और महासचिव सरोज पांडे को पार्टी कार्यकर्ता, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के घर जाकर उनसे मिलने से रोकते हैं. महाराष्ट्र भाजपा के एक नेता बताते हैं, ''ठाकरे सिर्फ मोदी और अमित शाह को बराबरी का दर्जा देकर बात करते हैं. भाजपा के अन्य नेता अगर उनके घर जाकर उनसे मिलते हैं तो उन्हें बैठने के लिए छोटी कुर्सी दी जाती है. यह देखकर भाजपा कार्यकर्ता खुद को अपमानित महसूस करते हैं. दोनों दल सिर्फ इस वजह से साथ आए हैं ताकि चुनाव में उन्हें नुक्सान नहीं हो. दोनों दलों में भरोसे की कमी साफ देखी जा सकती है.''
बिहार में ऐसी ही स्थिति है. यहां राजग के पाले में अभी जद (यू) और लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) शामिल हैं लेकिन लोजपा को साधने के लिए भाजपा को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी. हालांकि केंद्रीय राज्यमंत्री गिरिराज सिंह कहते हैं, ''भाजपा मजबूत स्थिति में है, इसलिए राजग में शामिल सभी दलों को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व का लाभ मिलेगा.'' लेकिन वे यह जोडऩा नहीं भूलते, ''अगर भाजपा दमदार नहीं होती या नरेंद्र मोदी का नेतृत्व नहीं होता तो यह कहना मुश्किल है कि कौन साथी कब साथ रहे और कब छोड़ दे.''
गिरिराज के इस नजरिए को बिहार भाजपा के एक वरिष्ठ नेता व्यावहारिक मानते हैं. उनका कहना है, ''वैचारिक रूप से भाजपा से भिन्न मत रखने वाले दल तभी तक भाजपा के साथ हैं जब तक उन्हें चुनावी जीत के लिए भाजपा की जरूरत महसूस होती है. चुनाव के बाद कौन-सी पार्टी कहां जाएगी, यह कहना मुश्किल है.'' बिहार से ताल्लुक रखने वाले एक केंद्रीय राज्यमंत्री कहते हैं, ''2014 में उपेंद्र कुशवाहा हमारे साथ थे. इस बार वे राजद के साथ चले गए क्योंकि वहां उन्हें अधिक फायदा दिख रहा है. यह कहना मुश्किल है कि कल कोई और दल साथ छोड़ दे या साथ आ जाए.''
भाजपा नेता यह भी मानकर चल रहे हैं कि जब तक सीटों पर तालमेल नहीं बन जाता तब तक गठबंधन के दलों में विरोधाभासी स्वर सुनाई देंगे. बिहार और महाराष्ट्र में किस सीट पर कौन लड़ेगा, राजग में यह अभी तक तय नहीं हो सका है. चुनाव की तारीख घोषित हो गई है, इसलिए सहयोगी दलों की ओर से भाजपा पर सीटों के तालमेल को लेकर दबाव बढ़ता जा रहा है. भाजपा नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि लोकसभा चुनाव के बाद राजग एक नए रूप में सामने आएगा. जाहिर है, पार्टी इस बात से भी इनकार नहीं कर रही है कि कुछ मौजूदा साथी बाहर जा सकते हैं और कुछ नए साथी पार्टी के साथ आ रहे हैं. ऐसे हालात में भाजपा को राजग का कुनबा बढ़ाने की जरूरत महसूस हो रही है.
हालांकि भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद जी.वी.एल. नरसिम्हा राव कहते हैं, ''2019 में भाजपा अपने दम पर 300 से ज्यादा सीट जीतेगी, इसलिए राजग में और दलों की जरूरत नहीं है. जो हमारे साथ हैं हम उन्हीं के साथ चुनाव में जाएंगे.'' उनके इस दावे के बाद भी पार्टी के वरिष्ठ नेता यह स्वीकार करते हैं कि नए साथियों के लिए भाजपा का दरवाजा खुला हुआ है. जाहिर है, सियासी जरूरतों की वजह से कई दल चुनाव पूर्व गठबंधन में शामिल नहीं होते हैं, लेकिन चुनाव बाद ऐसे दल साथ नहीं आएंगे, यह जरूरी नहीं.
वित्त मंत्री अरुण जेटली कहते हैं, ''सहयोगी दलों का मतलब हमेशा सरकार या गठबंधन में शामिल दल ही नहीं होते. संसद में या संसद के बाहर भी सरकार को उन दलों का मुद्दा आधारित समर्थन भी मिलता है जो किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं होते हैं. कई बार तो विरोधी गठबंधन में शामिल दलों में से भी कुछ दल सरकार को मुद्दा आधारित समर्थन देते रहे हैं.''
इस सियासी जरूरत को समझते हुए ही भाजपा गठबंधन को लेकर प्लान बी पर भी काम कर रही है. प्लान बी के तहत पार्टी उन दलों को साधने में लगी है, जो 2019 के चुनाव के बाद भाजपा के लिए मुफीद साबित हो सकते हैं. हालांकि पार्टी इस मामले में फूंक-फूंककर कदम रख रही है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''अगर किसी वजह से भाजपा के मौजूदा साथी दलों का प्रदर्शन चुनाव में बेहतर नहीं रहा तो फिर हमारे पास आगे का विकल्प क्या होगा?
इसके लिए जरूरी है कि ऐसे दलों के साथ तालमेल जारी रखा जाए या नए सिरे से तालमेल किया जाए, जो फिलहाल न तो भाजपा के खेमे में हैं और न ही कांग्रेस के खेमे में.'' चूंकि गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस गठबंधन में शामिल दलों ने अपने-अपने सियासी पत्ते साफ कर दिए हैं, इसलिए अब स्पष्ट है कि तेलंगाना में टीआरएस, आंध्र में वाइएसआरसी और ओडिशा में बीजू जनता दल 2019 लोकसभा चुनाव के बाद राजग के नए साथी बन सकते हैं.
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