जनवरी की 31 तारीख की दोपहर पड़ोसी राजस्थान में अलवर जिले के रामगढ़ के उपचुनाव में कांग्रेस की सफिया खान के जीतने की खबर आने पर थोड़ी देर के लिए हरियाणा के भाजपाई सकपका गए थे. दरअसल, उस समय जींद उपचुनाव के तीसरे राउंड का परिणाम आया था और जननायक जनता पार्टी (जजपा) प्रत्याशी दिग्विजय चौटाला सभी प्रत्याशियों से आगे चल रहे थे. मगर दोपहर बाद शहरी बूथों की ईवीएम खुलते ही तस्वीर बदल गई. भाजपा चैटाला परिवार के सात दशक पुराने गढ़, जींद को भेद कर विजय पताका फहराने में सफल रही. भाजपा प्रत्याशी डॉ. कृष्ण मिड्ढा ने 50,566 वोट हासिल करके दिग्विजय को 12,935 वोटों से हराया.
जींद सीट पर कांटे का मुकाबला था और मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर ने चुनाव में पूरी ताकत लगा दी थी. इस जीत से खट्टर का मनोबल ऊंचा हुआ है, वहीं कांग्रेस, इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) तथा लोकतंत्र सुरक्षा पार्टी के मुखिया और भाजपा के बागी सांसद राजकुमार सैनी के लिए चिंता बढ़ी है. यहां कांग्रेस ने बड़ा दांव खेलते हुए रणदीप सुरजेवाला को मैदान में उतारा था, जो तीसरे नंबर पर रहे. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा कहते हैं, ''उपचुनाव में सत्तारूढ़ दल को फायदा होता है.
रामगढ़ और जींद के नतीजे इसका अपवाद नहीं हैं.'' मगर माना जा रहा है कि उपचुनाव में मिली शिकस्त का प्रभाव आगामी आम और विधानसभा चुनावों पर पड़ेगा. उपचुनाव में अपने ही गढ़ में पांचवें नंबर पर रही इनेलो के लिए यह खतरे की घंटी है. बसपा से गठबंधन के बाद भी उसका प्रदर्शन बेहतर नहीं हो रहा. इनेलो टूट कर बनी जजपा के दिग्विजय का दावा है कि इनेलो ने अंदरखाने भाजपा से हाथ नहीं मिलाया होता तो जजपा जीत जाती.
वहीं रामगढ़ उपचुनाव की जीत ने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का मनोबल भी बढ़ाया है. सरकार गठन के तुरंत बाद हुआ यह उपचुनाव गहलोत के लिए परीक्षा थी. विधानसभा की 200 सीटों वाले राजस्थान में कांग्रेस की 100 सीटें हो गई हैं.
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