राफेल लड़ाकू विमान से जुड़े 60,000 करोड़ रु. के सौदे की जांच से संबंधित याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो जाने के हफ्ते भर बाद सरकार फिर से रक्षात्मक मुद्रा में आ गई. 12 दिसंबर को भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने अपने फैसले में लिखा, "इस अदालत को भारत सरकार के 36 राफेल विमान खरीदने के संवेदनशील मुद्दे पर हस्तक्षेप का कोई कारण नहीं मिला.''
वकील मनोहर लाल शर्मा, आम आदमी पार्टी (आप) नेता संजय सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्रियों यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी के अलावा वकील प्रशांत भूषण तथा एक स्वतंत्र नागरिक के तौर पर विनीत ढांडा की ओर से इस मामले में चार याचिकाएं दायर की गई थीं.
फैसले में कहा गया है कि अदालत के सामने पेश खरीद की प्रक्रिया और कीमतों से जुड़े दस्तावेज समेत सभी दस्तावेजों का कोर्ट ने ध्यानपूर्वक अध्ययन किया और ऐसी कोई वजह नजर नहीं आई जिसके कारण इस खरीद प्रक्रिया पर संदेह किया जाए. "हमें प्रक्रिया पर संदेह का कोई आधार नजर नहीं आया और हम इससे संतुष्ट हैं;'' अदालत के समक्ष "कोई पुख्ता साक्ष्य पेश नहीं किया गया जिससे जाहिर होता हो कि सरकार ने यह सौदा किसी पक्ष को व्यावसायिक लाभ प्रदान करने की मंशा से किया है क्योंकि ऑफसेट पार्टनर का निर्धारण भारत सरकार के अधिकार क्षेत्र में नहीं है''. इसलिए यह आरोप कि इस सौदे में उद्योगपति अनिल अंबानी को लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई है, खारिज किया जाता है.
अदालत ने यूपीए और एनडीए सरकारों की तय कीमतों के तुलनात्मक अध्ययन से खुद को किनारे करते हुए स्पष्ट किया कि यह काम अदालत का नहीं है. एक और महत्वपूर्ण बात यह भी कही गई कि "सिर्फ यह धारणा कि आरंभिक आरपीएफ (प्रस्ताव का अनुरोध) यूपीए सरकार के तहत 2007 के टेंडर में, के आधार पर ही सौदे को अंतिम रूप दिया जाना चाहिए था, अर्थहीन है.''
इस बीच कांग्रेस फैसले में उल्लिखित उस विवादास्पद हिस्से (पैराग्राफ 25) को लेकर आक्रामक हो गई है जिसे सरकार की ओर से सीलबंद लिफाफे में दायर हलफनामे पर आधारित माना जा रहा है. इस पैराग्राफ में कहा गया हैः "कीमतों से जुड़ी जानकारियां सीएजी को दी जा चुकी हैं और पीएसी ने सीएजी की रिपोर्ट का अध्ययन कर लिया है. संसद के समक्ष रिपोर्ट का केवल संपादित अंश ही रखा गया था.''
हालांकि सीएजी 2016 के राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद की अभी ऑडिटिंग कर ही रहे हैं और उसके बाद वे लोक लेखा समिति (पीएसी) के सामने रिपोर्ट पेश करेंगे. एक संसदीय समिति पीएसी सरकार के राजस्व और व्यय की ऑडिट करती है और ऑडिट की रिपोर्ट संसद में पेश करती है. अभी तक यह रिपोर्ट पेश ही नहीं हुई है. लेकिन 2019 के चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस ने बहुत आक्रामक रवैया अख्तियार कर रखा है. कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला के अनुसार, अदालत ने अपने फैसले में कांग्रेस के उस रुख का ही समर्थन किया है कि "सुप्रीम कोर्ट संवेदनशील रक्षा सौदों के बारे में निर्णय का सही फोरम नहीं है.''
सरकार ने आदेश में उल्लिखित पैराग्राफ 25 को एक दुर्भाग्यपूर्ण "अनुचित व्याख्या'' माना है. फैसला आने के तीन दिन बाद, 15 दिसंबर को अटॉर्नी जनरल ने अदालत में एक अर्जी देकर पैरा 25 में संशोधन का अनुरोध किया, जिसमें कहा गया है कि मुख्य शब्द "कर लिया है'' और "था'' को बदलकर "किया जाता है'' कर दिया जाए ताकि इसका अर्थ प्रक्रिया की जानकारी देने से लगाया जाए, न कि प्रक्रिया संपन्न होने से.
सौदे को लेकर कई सवाल अब भी बने हुए हैं, खासतौर से जहाजों की संख्या को और सौदे की कीमत को लेकर. पहले 126 जहाज (सात स्क्वॉड्रन) खरीदने की बात चल रही थी, उसे घटाकर 36 (दो स्क्वॉड्रन) क्यों किया गया और सौदा आखिर हुआ कितने में है, क्योंकि सरकार दावा कर रही है कि नया सौदा पूर्व में तय कीमत से 9 प्रतिशत कम दाम पर किया गया है. वायु सेना जहाजों की कमी से जूझ रही है और उसने 110 लड़ाकू जहाजों के लिए प्रस्ताव का अनुरोध (आरपीएफ) दिया है जिसे विदेशी निर्माता किसी भारतीय "सामरिक साझेदार'' के सहयोग से भारत में ही तैयार करेगा. आरएफ या टेंडर तो खरीद का शुरुआती कदम है और इस पर बात 2019 के मध्य से पहले आगे बढऩे की उम्मीद नहीं है.
कांग्रेस सौदे की संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) से जांच की मांग कर रही है. सरकार ने कांग्रेस की मांग ठुकरा दी है जिससे गतिरोध कायम है. पूरी संभावना है कि राफेल सौदा 2019 के चुनावों में एक प्रमुख मुद्दा बनेगा.
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