साल खत्म होते-होते वैज्ञानिकों ने यह बात रिकॉर्ड में दर्ज कर दी कि यह साल बीते दशक का सबसे गर्म साल रहा है, गर्म हवाओं से हलकान, ऊंचे उठते समुद्री स्तर समेत ज्यादातर आपदाओं की जड़ें जलवायु परिवर्तन में हैं. हर साल तमाम देश जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की रूपरेखा सभा (यूएनएफसीसीसी) के तहत पक्षकारों के सम्मेलन (सीओपी या कॉप) में इकट्ठा होकर इस बात पर चर्चा करते हैं कि जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के लिए वे साथ मिलकर क्या कर सकते हैं. इन समझौता वार्ताओं में कई क्रांतिकारी बदलाव के लम्हे आए हैं, जिनमें आखिरी 2015 का पेरिस जलवायु समझौता था, जिस पर तकरीबन 200 देशों ने दस्तखत किए थे.
इस समझौते के प्रावधानों के 2020 से अमल में आने की उम्मीद की जा रही है, इसलिए पोलैंड के काटोवाइस में आयोजित ताजातरीन कॉप में—जो ऐसी 24वीं बैठक थी—इसके अमल पर ही सबसे ज्यादा ध्यान दिया गया. काटोवाइस में 200 से ज्यादा राष्ट्र (अमेरिका को छोड़कर) पेरिस नियम पुस्तिका के अमल पर राजी हो गए, वहीं यह आम एहसास भी था कि तीन साल पहले लिए गए संकल्प नाकाफी हैं.
पेरिस में उन देशों की चर्चा थी जो राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान के साथ आगे बढ़ रहे हैं ताकि संतुलन को इस तरह झुका सकें कि वैश्विक तापमान की बढ़ोतरी को उद्योगीकरण से पूर्व के स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे बनाए रखें, क्योंकि इसके इससे ऊपर जाने पर नतीजे भारी तबाही ला सकते हैं. वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के लिए तमाम देशों को अपने कार्बन उत्सर्जन को 2030 तक आधा करना होगा. जहां चीन और भारत ने नवीकरणीय या अक्षय ऊर्जा में बड़े पैमाने पर निवेश किया है, वहीं कई दूसरे देश टालमटोल कर रहे हैं.
विज्ञान और पर्यावरण केंद्र के उप-महानिदेशक चंद्र भूषण कहते हैं, "देश अब खुद अपने दम पर जलवायु के प्रभावों का शमन और अनुकूलन कर रहे हैं और इसकी लागत चुका रहे हैं. यूएनएफसीसीसी अब जानकारियां जुटाने और उन्हें काम लायक बनाने का प्लेटफॉर्म है और चर्चा तथा बहस का मंच प्रदान करता है. इसके पास जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करने के लिए दुनिया भर में सामूहिक कार्रवाई चलाने के उपाय नहीं हैं. यूएनएफसीसीसी के उद्देश्य पर सवाल उठाने की जरूरत है.''
2015 में विकासशील देशों ने जलवायु परिवर्तन का शमन और अनुकूलन करने के लिए टेक्नोलॉजी और धन के हस्तांतरण की मांग की थी. विकसित देश जहां जलवायु कोष में 2020 से शुरू करके हर साल मोटे तौर पर 100 अरब अमेरिकी डॉलर डालने के लिए राजी हो गए थे, वहीं वे अभी तक अपने लक्ष्यों से बेहद दूर हैं. काटोवाइस में रोकड़े के मुद्दे को सुलझाना और पैना किया जाना था, पर बदकिस्मती से इस कॉप के बाद और भी कम जवाबदेही नजर आती है. विकसित देश अब कर्ज, अनुदान, सहायता के मिले-जुले साधनों के जरिए अपनी वित्तीय वचनबद्धता को पूरा करना चुन सकते हैं और अगर वे मुकरते या इनकार करने का फैसला करते हैं तब भी उनकी बहुत कम जबावदेही होगी.
अमेरिका, कुवैत, रूस, सऊदी अरब और कुछ दूसरे देशों ने जलवायु परिवर्तन पर अंतरशासकीय समिति (आइपीसीसी) की उस नई रिपोर्ट के भयावह नतीजों को स्वीकार करने से ही मना कर दिया, जो संयुक्त राष्ट्र ने तैयार करवाई है और अक्तूबर में जारी की गई थी. जहां नई रिपोर्ट बताती है कि किस तरह 2 डिग्री सेल्सियस की बजाए 1.5 डिग्री सेल्सियस ही वह बिंदु है जहां छोटा-सा बदलाव भी भयावह हो जाएगा. ये देश इस रिपोर्ट को सम्मेलन में आने ही नहीं देना चाहते थे.
रिपोर्ट ने चेतावनी की घंटी बजा दी है और कहा है कि अब केवल 12 साल का वक्त है जब देशों को और ज्यादा नुक्सान रोकने के लिए कदम उठाने ही होंगे.
भूषण के मुताबिक, "यह कॉप 1.5 डिग्री सेल्सियस पर आइपीसीसी की विशेष रिपोर्ट के नतीजों का संज्ञान नहीं लेने की वजह से विज्ञान विरोधी सम्मेलन के तौर पर याद रखी जाएगी. यह ऐसी नियम पुस्तिका लेकर आने के लिए भी याद की जाएगी जिसने पहले ही कमजोर पेरिस समझौते को और भी ज्यादा कमजोर कर दिया है.''
पक्षकारों का यह सम्मेलन कॉप 24 जलवायु परिवर्तन पर दुनिया भर के देशों और विकास के लालच की बात पर मुहर है. लगता है दिसंबर 2019 में चिली में होने वाली अगली बैठक में लंबी लड़ाई का मंच पहले ही तैयार हो गया है.
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