सरकार ने फ्रांस से 36 राफेल विमानों की खरीद से संबंधित 59,000 करोड़ रु. के सौदे को चुनौती देने वाली याचिका पर 14 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के बाद राहत की सांस ली है. प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अगुआई वाली तीन जजों की पीठ ने वकील प्रशांत भूषण और पूर्व केंद्रीय मंत्रियों अरुण शौरी तथा यशवंत सिन्हा की ओर से दायर याचिका की सुनवाई के दौरान इन विमानों की खरीद की प्रक्रिया में कोई महत्वपूर्ण गड़बड़ी नहीं पाई है.
24 अक्तूबर को अदालत में दायर याचिका में सौदे की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच की मांग करते हुए कहा गया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अप्रैल, 2015 में अपने फ्रांस दौरे के दौरान नियमों को दरकिनार करते हुए घोषणा की थी कि वे फ्रांस से जहाज खरीद रहे हैं. इसके बाद सितंबर, 2016 में फ्रांस के साथ अंतर-सरकारी समझौता (आइजीए) किया गया. याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि इस सौदे में रिलायंस इंडस्ट्रीज को फायदा पहुंचाया गया है, जिसने ऑफसेट (विदेशी हथियार कारोबारियों द्वारा भारत में किया गया निवेश, जो कि अनुमानतः 30,000 करोड़ रु. है) को अमल में लाने के लिए नागपुर में संयुक्त उपक्रम स्थापित किया है, लिहाजा यह सीधे-सीधे राजनेताओं और कारोबारियों की मिलीभगत का मामला है.
रक्षा विश्लेषक और वकील संजय बद्री महाराज कहते हैं, ''आज की प्रक्रिया के मुताबिक इस बात के कोई सबूत नहीं हैं कि सरकार ने किसी तरह की गड़बड़ी की. अगर इस आधार पर जांच होगी तो इसका सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता पर बुरा असर पड़ेगा.''
इससे पहले 31 अक्तूबर को कोर्ट ने कहा था कि वह इन विमानों की उपयुक्तता और उपयोगिता पर विचार नहीं करेगा और उसकी दिलचस्पी सिर्फ इससे संबंधित प्रक्रिया और ऑफसेट से जुड़े मुद्दों में है.
सरकार को तब बड़ी राहत मिली जब कोर्ट ने कहा कि वह विमानों की कीमत का खुलासा नहीं करने जा रहा है. इस सौदे में प्रति राफेल जेट की कीमत सर्वाधिक विवाद का मुद्दा है. अटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने कीमत से संबंधित जानकारी बंद लिफाफे में कोर्ट को सौंपी है. वेणुगोपाल ने कोर्ट को बताया कि आइजीए के मुताबिक कीमत का खुलासा नहीं किया जा सकता.
12 नवंबर को सरकार ने याचिकाकर्ताओं को फ्रांस के साथ आइजीए पर हस्ताक्षर करने से पहले पूरी की गई प्रक्रिया से संबंधित 14 पेज की जानकारी दी. इस दस्तावेज में यह जिक्र नहीं है कि क्या प्रधानमंत्री की घोषणा से पहले भारतीय वायु सेना से कोई सलाह ली गई थी, यह ऐसा मुद्दा है, जिस पर याचिकाकर्ता जोर दे सकते हैं. वेणुगोपाल की स्वीकारोक्ति से एक और मुद्दा उभरा कि सौदे के बारे में भारत को फ्रांस से सॉवरिन लेटर ऑफ गारंटी (गारंटी का संप्रभु पत्र) नहीं मिला, जबकि इसे आम तौर पर आइजीए के साझेदार वित्तीय बाध्यता के रूप में देते हैं. इसके बदले भारत को 'लेटर ऑफ कंफर्ट' मिला, जिसका वैसा महत्व नहीं है.
पांच घंटे की सुनवाई के दौरान बेंच ने, जिसमें जस्टिस के.एम. जोसेफ और एस.के. कौल भी शामिल थे, रक्षा मंत्रालय और भारतीय वायु सेना के अधिकारियों से जानना चाहा कि क्या प्रक्रिया के पालन में कोई गड़बड़ी की गई. सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से एक दिन पहले ही भारत के लिए तैयार किए गए राफेल जेट ने फ्रांस में अपनी पहली उड़ान भरी.
इस्ट्रेस स्थित दासो संयंत्र में न्यूज एजेंसी एनआइए को दिए गए साक्षात्कार में कंपनी के सीईओ एरिक ट्रेपर ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के इस आरोप पर कि वह झूठे हैं, जवाब दिया. ट्रेपर ने कहा, ''मैं झूठ नहीं बोलता. मैंने जो कहा है और मैंने जो बयान दिए हैं, वे सच हैं. मेरी छवि झूठ बोलने वाले की नहीं है. मेरी तरह सीईओ के पद पर आप झूठ नहीं बोल सकते.'' दासो के सीईओ ने कहा कि 36 राफेल विमानों की कीमत पहले के 126 विमानों के सौदे से नौ फीसदी कम है. पहले के करार के मुताबिक, 18 विमान उडऩे की हालत में मिलने वाले थे, जबकि 108 विमानों के कलपुर्जे हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में स्थानीय स्तर पर जोड़े जाने थे.
सर्वोच्च अदालत ने यह रिपोर्ट लिखते समय तक अपना फैसला सुरक्षित रखा था, लेकिन स्पष्ट है कि उसके फैसले का आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में सरकार पर भारी असर होगा, जो कि इस सौदे को लेकर बचाव की मुद्रा में है. या तो सरकार को प्रक्रियाओं को दरकिनार करने का दोषी पाया जाएगा या फिर वह पूरी तरह पाकसाफ निकलेगी.
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