सबरीमाला मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट के 28 सितंबर को आए फैसले को तीन हफ्ते बीत चुके हैं. ऐसा लगता है, बाढ़ से बर्बाद केरल में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर विरोध अब घट रहा है. सबरीमाला को लेकर तनाव की शुरुआत 14 अक्तूबर को हुई, जब अदालत के निर्देशों को लागू करने के विरोध में पंडालम से तिरुअनंतपुरम तक एक विशाल जनप्रदर्शन करने की घोषणा की गई.
मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने राहत की सांस ली होगी, जब अंतरराष्ट्रीय हिंदू परिषद के प्रमुख प्रवीण तोगडिय़ा के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों को उनके आधिकारिक निवास से सिर्फ 100 मीटर दूरी पर रोक लिया गया. इस बहुप्रचारित 'यात्रा' में 5 लाख भक्तों के शामिल होने का दावा था. लेकिन उसमें महज कुछ सौ लोग ही जुटे क्योंकि भाजपा और आरएसएस के नेताओं ने तोगडिय़ा और उनके हिंदुत्व से दूरी बना ली.
इसके पहले राज्य के खुफिया विभाग ने सरकार को हिंसा की आशंका को लेकर चेतावनी दी थी. तोगडिय़ा वैसे तो राज्य और केंद्र सरकार के खिलाफ आग उगलते रहे, लेकिन वे केरल के बेहद कट्टर हिंदू भक्तों को प्रभावित नहीं कर पाए.
इस आयोजन की सबसे पहले आलोचना केरल कांग्रेस के प्रमुख मुल्लापल्ली रामचंद्रन ने की. उन्होंने कहा, ''हम सबरीमाला को अयोध्या बनाने का प्रयास सफल नहीं होने देंगे.'' उन्होंने पंडालम के शाही परिवार की इस बात के लिए तारीफ भी की कि उन्होंने राजनैतिक दलों से भक्तों के प्रदर्शन से दूर रहने की अपील की है.
दिलचस्प यह है कि इसके पहले कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष के. सुधाकरन ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ जलीकट्टू जैसा प्रदर्शन करने का आह्वान किया था. विपक्ष के नेता रमेश चेन्निथला ने भी पंडालम के शाही परिवार और सबरीमाला के मुख्य पुजारी को अपना समर्थन दिया था. हालांकि, मुल्लापल्ली ने साफतौर से यह आशंका जताई थी कि इस विरोध प्रदर्शन में शामिल होने से कांग्रेस की 'सेकुलर' छवि को नुक्सान पहुंचेगा. पहले कांग्रेस और भाजपा, दोनों पार्टियों के नेता चुनावी रूप से महत्वपूर्ण नायर समुदाय को खुश करने की होड़ लगाए हुए थे, जिसका यह मानना है कि कोर्ट का फैसला उनकी परंपराओं के खिलाफ है.
सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) ने भगवा दल और कांग्रेस के नेतृत्व पर आरोप लगाया है कि वे ''सबरीमाला फैसले पर केरल का सांप्रदायिक विभाजन करने की कोशिश कर रहे हैं.'' एलडीएफ समन्वय समिति के संयोजक ए. विजयराघवन ने कहा कि वाम दल विपक्ष के संदिग्ध खेल का भंडाफोड़ करेंगे.
फैसले के खिलाफ उठे तूफान पर काबू पाने के लिए एलडीएफ ने दो महीने लंबा अभियान शुरू किया है. 16 अक्तूबर से शुरू हुए इस अभियान में विजयन कई रैलियों का आयोजन करेंगे.
किसी हिंदू एकता के मंच को उभरने देने से रोकने के लिए माकपा कार्यकर्ताओं ने घर-घर जाकर इस फैसले के बारे में जागरूकता पैदा करने और गलत जानकारियों को रोकने का अभियान शुरू किया है. माकपा के राज्य सचिव कोडियेरी बालाकृष्णन का यह मानना है कि इन विरोध प्रदर्शनों के शांत होने से उनकी पार्टी को राजनैतिक फायदा होगा. हालांकि, कोडियेरी ने सरकार और पार्टी नेताओं को चेतावनी दी है कि वे किसी भी तरह के भड़काऊ बयान जारी करने या विरोध प्रदर्शन करने वाले भक्तों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई का आदेश देने से बचें.
इस बीच, त्रावणकोर देवस्वम बोर्ड ने मामले को शांत करने के लिए सबरीमाला मंदिर के संरक्षकों से बातचीत शुरू की है. और लगता है कि आखिरकार मुख्यमंत्री की चिंता दूर होने वाली है.
सबरीमाला मसले ने केरल के एनडीए में भी विभाजन पैदा कर दिया है. इझावा संगठन श्री नारायण धर्म परिपालन योगम भाजपा से कन्नी काटते हुए इस मामले में राज्य सरकार का समर्थन कर रहा है. एक और घटक, सी.के.जानू के नेतृत्व वाला जनअतिथिपथ्य राष्ट्रीय सभा 14 अक्तूबर को एनडीए से बाहर हो गया. फायरब्रांड आदिवासी नेता जानू ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया और उन्होंने यह मांग की कि सबरीमाला में महिलाओं को पुजारी बनाया जाए.
विपक्ष की दोहरी नीति और बदलते रुख का हवाला देते हुए विजयन ने यह कहने में देर नहीं लगाई कि उनकी सरकार अपने इस रुख पर कायम है कि मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं को प्रवेश की इजाजत होनी चाहिए. उन्होंने कहा, ''यह एक प्रगतिशील कदम है और केरल को बदलने वाले महान सामाजिक सुधार आंदोलनों की भावना के अनुरूप है.'' उन्होंने राज्य के लोगों को यह भी याद दिलाया कि सबरीमाला मंदिर की कानूनी लड़ाई एलडीएफ सरकार ने नहीं शुरू की थी.
5 लाख भक्तों के प्रदर्शन में शामिल होने का दावा किया गया था जबकि कुछ सौ लोग ही आए
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