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परिवर्तन के पहिए

भारुलता कांबले पहली महिला हैं जिन्होंने आर्कटिक धु्रव पर तिरंगा लहराया और अपनी यात्राओं को एक मकसद से जोड़ दिया

रफ्तार भारूलता कांबले ने आर्कटिक पर तिरंगा लहराया है
रफ्तार भारूलता कांबले ने आर्कटिक पर तिरंगा लहराया है
अपडेटेड 17 अक्टूबर , 2018

भारूलता पटेल-कांबले भारतीय मूल की पहली महिला हैं जिन्होंने आर्कटिक ध्रुव पर भारत का झंडा फहराया. उन्होंने कार ड्राइव के जरिए कई विश्व रिकॉर्ड अपने नाम किए हैं. ड्राइविंग का उनका शौक महज रिकॉर्ड बनाने के लिए ही नहीं है बल्कि इसमें एक बेहद अहम मकसद भी है. उनके अभियान में शामिल हैं- बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, प्लास्टिक मुक्त विश्व और कैंसर मुक्त महिलाएं. वे कार ड्राइविंग के दौरान जागरूकता फैलाती हैं. इस साल 20 जनवरी को जब राष्ट्रपति ने अपने क्षेत्र में पहला स्थान बनाने वाली देश की 112 महिलाओं को सम्मानित किया तो उसमें भारूलता भी शामिल थीं.

मूल रूप से गुजरात के नवसारी जिले की 45 वर्षीया भारूलता परिवार के साथ इंग्लैंड में रहती हैं. इंग्लैंड में रहते हुए भी उन्हें अपने देश और अपनी मिट्टी से बेहद प्यार है. अपने नए अभियान पर जाने से पहले वे मुंबई आई थीं और नई ऊर्जा से भरपूर हो गई थीं. वे कहती हैं, "13 अक्तूबर से 20 दिनों के अभियान में पहली बार मेरे दोनों बेटे साथ रहेंगे. एक मां और दो बेटों के साथ कार ड्राइविंग का भी एक विश्व रिकॉर्ड बनेगा. इस अभियान में हमारा ज्यादा फोकस कैंसर को लेकर रहेगा.'' वे आगे बताती हैं, "पिछले ही साल मुझे ब्रेस्ट कैंसर हो गया था जिसकी वजह से मेरा दाहिना हाथ काम नहीं कर रहा था.

लेकिन इलाज और अपनी आंतरिक ताकत की वजह से हाथ को काफी ठीक कर लिया है. कैंसर की वजह से मेरे बच्चे भी चिंचित रहते हैं. बेटों के साथ अभियान पर निकलने का आइडिया वहीं से आया.'' 20 दिनों की इस यात्रा में 14 देश शामिल हैं और 10,000 किमी की दूरी तय करनी है. यात्रा इंग्लैंड से शुरू होकर फ्रांस, बेल्जियम, डेनमार्क, स्वीडन, पोलैंड होते हुए वापसी जर्मनी, फ्रांस होकर इंग्लैंड की है. अगले साल के मध्य तक उनका 50 देशों की यात्रा पूरी करने का लक्ष्य है.

शादी से पहले से ही कार ड्राइविंग का शौक पालने वाली भारूलता ने 1997 में इंग्लैंड में ही 600 किमी की यात्रा की थी. वे बताती हैं, "मैंने अपने इस शौक को मकसद में बदल दिया.'' उनका मानना है कि किसी मकसद से किया गया कार्य औरों को न सिर्फ प्रभावित करता है बल्कि देश, समाज और इनसान को कुछ लाभ भी मिलते हैं. बकौल भारूलता, मकसद वाले अभियान को शुरू करने के लिए उन्हें सबसे ज्यादा उनके काका की उन कटु बातों ने उत्तेजित किया जिसमें उन्होंने कहा था कि लड़कियां और रास्ते के पत्थर में कोई फर्क नहीं होता जिसे कोई भी ठोकर मार देता है.

भारूलता के चाचा ने यह बात तब कही जब वे महज पांच-छह साल की थीं और उनके पिता का देहांत हो गया था. चाचा ने उनको बोझ समझकर साथ रखने के इनकार कर दिया था. बाद में वे अपने नाना के साथ रहीं. वे कहती हैं, "काका की यह बात मेरे जेहन से आज भी नहीं निकली है. सुई की तरह चुभती है. लेकिन मैंने संघर्ष करते हुए पढ़ाई पूरी की. आज मैंने जो मुकाम हासिल किया है उससे मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि लड़कियां रास्ते का पत्थर नहीं होती हैं.'' वे बताती हैं कि उन्होंने बचपन में ही लिंगभेद का दर्द महसूस किया है इसीलिए उनका जोर बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के लिए जागरूकता अभियान पर रहता है.

भारूलता ने 2016 में आर्कटिक सर्कल में 2,792 किमी की दूरी सिर्फ 39 घंटों में पूरी करके विश्व रिकार्ड बनाया. उन्होंने बिना किसी बैकअप वाहन या बैकअप चालक दल के 2 महाद्वीप, 32 देश, भारत के 12 राज्य और 35,383 किमी की दूरी तय की. पहाड़ों में 5,500 किमी की दूरी, समुद्री तल से 14,000 फीट की ऊंचाई, रेगिस्तान में 2,500 किमी ड्राइविंड केसाथ 9 पर्वत शृंखलाएं भी पार की हैं. भारूलता ने अपने साहसिक अभियानों के बाद एक नारा दियाः साहसिक बनो और बदलाव लाओ.

उनकी रुचि कला और संगीत में भी है. भारूलता ने यूके में गुरु सूर्य कुमारी से भरत नाट्यम सीखा है. उन्होंने लोनर लेक और सावित्रीबाई फुले पर डॉक्यूमेंटरी भी बनाई. वे एक मां, एक पत्नी, एक कैंसर पीड़िता, पेशे से वकील और ब्रिटिश सरकार की पूर्व नौकरशाह हैं. महाराष्ट्र के रायगढ जिले के महाड के यूरोलॉजिस्ट और रोबोटिक सर्जन सुबोध कांबले से उन्होंने प्रेम विवाह किया. भारूलता कहती हैं कि कार यात्रा अभियान में उनके पति और बच्चों का पूरा सहयोग मिल रहा है.

अपनी कार यात्रा पर जाने से पहले भारूलता ने कार की तकनीकी जानकारी ली ताकि कार खराब होने पर उनकी यात्रा बाधित न हो. उनकी कार यात्रा को प्रायोजक भी मिले हुए हैं जिससे उन्हें आर्थिक परेशानी नहीं होती. दुनिया के जिन देशों में वे गईं वहां के लोगों से उन्हें सकारात्मक रिस्पांस मिला. उनकी तहसील में 179 गांव हैं जहां के सरपंचों ने शपथ ली कि गांव की हर बेटी को पढ़ाएंगे और 18 साल से कम उम्र में विवाह होने नहीं देंगे.

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